भारत -नेपाल में उभरती कटुता 

 संतोष कुमार, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, कानपुर      

Santosh Kumar , associate professor Kanpur

 भारत -नेपाल सम्बन्धों की जब भी बात होती है, इनमे एक वैशिष्ट्य का बोध होता है। एक ऐसी सहजता का आभास होता है जो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अनेक प्रचलित सिद्धांतों से परे चली जाती है। दोनों देशों के संबंधों की एक प्रमुख विशेषता एक भावनात्मक सूत्रबद्धता है जो इसे एक अलग स्वरुप प्रदान करती है। यह वास्तव में अद्वितीय है और समकालीन विश्व में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती है। पृथ्वी नारायण शाह जोकि आधुनिक नेपाल के वास्तुकार माने जाते हैं ने एक बार नेपाल की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि उनका देश दो चट्टानों के मध्य खिले हुए एक सुन्दर पुष्प के सामान है। उन्होंने आगे कहा  कि उनके देश को दोनों सशक्त पड़ोसी राज्यों से मधुर सम्बन्ध बना के रखना चाहिए। इसी मार्ग से नेपाल अपने हितों की अभिवृद्धि कर सकता है। किन्तु एक बात इसमें और शामिल है कि उन्होंने दक्षिण के राज्य अर्थात भारत से सतर्क रहने की  बात भी कही थी। यदि हम भारत – नेपाल के संबंधों के इतिहास का अवलोकन करें तो स्पष्ट हो  जाता है कि दोनों देशों के संबंधों में यही विरोधाभास भी उतना ही शामिल रहा है जितना कि दोनों के मध्य संबंधों में प्रगाढ़ता की गहराई। यह विरोधाभास अक्सर दोनों के बीच कभी तनाव तो कभी गंभीर स्तर तक उपजते अविश्वास के तौर पर प्रकट होता है।

वर्ष 1950 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने नेपाल के प्रति भारत की सोच को स्पष्ट किया था। उन्होंने कहा था कि भारत और नेपाल भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से इतने महत्वपूर्ण देश हैं कि भारत नेपाल को नेपथ्य में कभी नहीं रख सकता। नेपाल पर आसन्न कोई भी खतरा भारत के लिए भी संकट होगा। वर्ष 1956 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने जब नेपाल की यात्रा की थी तो उन्होंने भी लगभग यही भावनाएं व्यक्त की थीं कि नेपाल भारत के रणनीतिक हितों के लिए अति -महत्वपूर्ण देश है और भारत, नेपाल के सुरक्षा हितों को अपनी सुरक्षा से अलग रखकर नहीं देख सकता।  इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आधुनिक भारत का नेतृत्व आरम्भ से ही नेपाल और भारत के मध्य रचनात्मक संबंधों को लेकर बहुत गंभीर रहा है।

भारत की स्वतंत्रतता के पश्चात जो नयी अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ जन्मी उन्होंने भारत -नेपाल संबंधों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। शीत युद्ध के कारण जहाँ महाशक्तियां अपना प्रभाव बढ़ाने में लगी हुई थीं तो नव स्वतंत्र देश अपनी सम्प्रभुता और अखंडता को लेकर सतर्क थे। चीन ने जब तिब्बत पर हमला करके उस पर अधिकार कर लिया तो चीन की सीमायें नेपाल तक जा पहुंची थीं। साम्यवादी देश होने के कारण चीन के इस साम्राज्य विस्तार को अमेरिका और यूरोपीय देशों ने गंभीर घटनाक्रम माना। इस कारण से शीत युद्ध भी नेपाल की देहरी तक आ पहुंचा। दोनों महाशक्तियों की रूचि का विषय होने के कारण नेपाल  वैश्विक राजनीति का एक नया केंद्र बनने जा रहा था। इस वातावरण में भारत के लिए गंभीर चुनौती उपजी कि वह न केवल नेपाल बल्कि स्वयं के हितों का संवर्धन करे। इसी के चलते भारत ने नेपाल को हर संभव सहायता प्रदान की जिससे वह देश  राजनीतिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सके। भारत जहाँ नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था को मज़बूत करना चाहता था, वहीँ नेपाल की राजशाही इसे अपने प्रतिकूल मानती थी। इसी के चलते इस देश में भारत के प्रति अनेक शंकाएं उत्पन होती चली गयीं। भारत ने वहां राणा शाही के अंत का स्वागत किया और वहां लोकतंत्र की स्थापना को नेपाल का महान कार्य बताया।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में नेपाल की सदस्यता को ज़ोरदार समर्थन किया। वर्ष 1955 में जब नेपाल को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्राप्त हुई तो नेपाल  ने आधिकारिक तौर पर कहा कि वह  भारत के प्रति इस योगदान के लिए कृतज्ञ है और वह किसी भी मूल्य पर भारत के विरुद्ध नहीं जायेगा। पंडित नेहरू ने भी इस अवसर पर कहा था कि नेपाल में होने वाले घटना क्रम का भारत पर अवश्य ही प्रभाव पड़ता है। ऐसे में भारत इस मामले में उदासीन नहीं रह सकता किन्तु निश्चित रूप से इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि भारत नेपाल के आतंरिक विषयों में हस्तक्षेप करे। किन्तु नेपाल में भारत -विरोधी भावनाएं उभारी जाती रहीं और इसमें बाह्य ताकतें भी शामिल रहीं थीं। इस प्रकार से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत नेहरू युग से आज तक नेपाल में राजनीतिक और आर्थिक सुदृढ़ता देखना चाहता है जबकि वहां भारत -विरोध के तत्व भी तभी से मौजूद रहे हैं। आज सीमा को लेकर जो विवाद जन्मा है उसके मूल में यह ऐतिहासिक जटिलता भी है।

गत आठ मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड को मानसरोवर से जोड़ने वाले मार्ग का उद्घाटन किया था। यह सड़क लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरती है। वृहद रूप से यह वह क्षेत्र है जो तीन देशों की सीमाओं का ट्राईजंक्शन भी है। नेपाल इस मार्ग का यह कहते हुए विरोध कर रहा है कि यह क्षेत्र उसका है जबकि भारत नेपाल के ऐसे किसी भी दावे को अस्वीकार करता है। महाकाली नदी जो  दोनों देशों की सीमारेखा के रूप में जानी जाती है, के समीप के क्षेत्र को लेकर नेपाल अपनी सम्प्रभुता का समय -समय पर दावा करता रहा है। इसमें कालापानी प्रमुख है जिसको लेकर नेपाल आक्रामक दृष्टिकोण अपनाये हुए है। नेपाल की आक्रामकता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल ने सीमा पर सशस्त्र  बलों को तैनात किया है। इसके अलावा उसने अपनी आवश्यकता के अनुसार अन्य चौकियां भी स्थापित की हैं। हालांकि भारत -नेपाल संबंधों में उतार -चढ़ाव कोई नयी बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से तेजी और आक्रामकता नेपाल ने अपनी प्रतिक्रिया में दिखाई है, वह ज़रूर अप्रत्याशित लग रही है। इनमें  सशस्त्र बलों की सीमा पर तैनाती है। नेपाल, भारत द्वारा जारी मानचित्र से असहमत है और और कई भारतीय क्षेत्र जैसे लिपुलेख, लिम्पियाधुरा, कालापानी  पर अपना दावा करता रहा है। जब भारत ने लिपुलेख में एक सड़क मार्ग का उद्धघाटन किया तो नेपाल में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। ये प्रदर्शन न केवल भारत बल्कि उनकी अपनी सरकार के विरोध में भी थे। यह भारी दबाव ही था जिसके कारण नेपाल की सरकार भारत के प्रति आक्रामक नज़र आयी।

नेपाल में भारत विरोधी जनभावनाएं भड़काने और तिल को ताड़ बनाकर प्रस्तुत करने की परिस्थितियाँ लम्बे समय से मौजूद रही हैं। लेकिन सवाल यही उठता है कि एक देश में जिसके साथ भारत के बेहद मज़बूत रिश्ते रहे हैं, ऐसी परिस्थितियां क्यों उपजीं? इसके अनेक कारण हो सकते हैं। सबसे प्रमुख है नेपाल की भू- राजनीतिक स्थिति। नेपाल,  भारत और चीन जैसे दो ताकतवर देशों के मध्य स्थित एक भू – आवेष्ठित देश है जिसकी सीमाएं समुद्र तटों से मीलों दूर हैं। ऊपर से हिमालय की मौजूदगी इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। रणनीतिकार मानते हैं कि नेपाल की हिमालयीय उचाईयां महाशक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। यही वजह है कि चीन, नेपाल में अपनी पकड़ मज़बूत करके न सिर्फ भारत बल्कि अमेरिका से बेहतर रणनीतिक स्थिति प्राप्त करना चाहता है। नैसर्गिक रूप से नेपाल का भारत से लगने वाला क्षेत्र भौगोलिक रूप से कम जटिल है जबकि चीन से लगी सीमा मुश्किलों से भरी पड़ी है। ऐसे में भारत से नेपाल अधिक भौगोलिक सहजता अनुभव करता है। किन्तु विकसित प्रौद्योगिकी ने चीन की राह आसान कर दी है। यही वजह है कि चीन अपनी अवसंरचना को सुदृढ़ करते हुए नेपाल तक जा पहुंचा है। तिब्बत के चीन में ज़बरदस्ती मिलाये जाने के बाद तो नेपाल का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

चीन ने स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स या मोतियों की माला रणनीति बनायीं है। इसके अंतर्गत वह भारत के पड़ोसियों से साम , दाम, दंड , भेद के आधार पर अपने मज़बूत सम्बन्ध बना रहा है।  इसमें उसका एक ही उद्देश्य है कि भारत को उसके ही क्षेत्र में अलग – थलग कर दिया जाये। चीन, नेपाल के रास्ते भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करना चाहता है। उसने पाकिस्तान को आसानी से इसके ज़रिये अपने उद्देश्यों के लिए भरपूर प्रयोग किया है जबकि नेपाल में वह इसी से मिलती -जुलती परिस्थिति उत्पन्न करना चाहता है।

जब नेपाल में राजशाही का अवसान हुआ और वहां एक राजनीतिक शून्यता जन्मी , इस देश में  दो धाराएं आकार ले रही थीं लोकतंत्र और साम्यवाद। चीन ने अपने बढ़ते प्रभाव का रुख नेपाल की ओर किया और साम्यवाद के विस्तार के लिए माओवादी तौर – तरीके इस्तेमाल किये। अपनी आर्थिक क्षमता का प्रयोग नेपाल में माओवादी विचार को मज़बूत करने में किया। एक प्रकार से नेपाल को उसने एक वैचारिक और सांस्कृतिक उपनिवेश बना दिया। बिना भारत विरोध का सहारा लिए ऐसा संभव नहीं था इसलिए उसने अपनी मशीनरी को इस काम में लगाया।

जब भारत ने नेपाल से कहा कि मौजूदा विवाद नेपाल के आधारहीन तथ्यों के कारण है तो नेपाल ने इस पर अपनी नाराज़गी जतायी।  भारतीय सेना के प्रमुख के इस बयान का भी नेपाल ने विरोध किया कि वह चीन की शय पर ऐसा कर रहा है। जबकि चीन, नेपाल के सत्ता प्रतिष्ठानों तक घुसपैठ कर चुका है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि नेपाल में भारत विरोधी भावनाएँ सब जगह व्यापक रूप से पायी जाती हैं, बल्कि यह उन्हीं  हलकों में अधिक हैं जहाँ सुनियोजित तौर पर इन्हें  उकसाया जाता है। भारत और नेपाल सांस्कृतिक तौर पर इतने समीप हैं कि यह तनाव अकल्पनीय लगता है। किन्तु राजनीति किसी भी अन्य तत्व से कहीं बड़ी होती है इसलिए जब तक राजनीतिक क्षेत्र में समरसता नहीं होती, अन्य क्षेत्र भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे।

 

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