आत्म हत्या की भयावह स्थिति, सुशांत की सुसाइड के ग़म से नहीं उबरा मनोरंजन उद्योग

—अनुपम तिवारी, लखनऊ 

सुशांत सिंह राजपूत की सुसाइड का ग़म से मनोरंजन उद्योग अभी उबरा भी नही था, कि कन्नड़ टीवी इंडस्ट्री से बेहद दुखद ख़बर आयी है. 30 साल के टीवी एक्टर सुशील गौड़ा ने अपने गृहनगर मंड्या में आत्महत्या कर ली, जिससे कन्नड़ इंडस्ट्री सदमे में है. आत्महत्या की वजह का अभी खुलासा नहीं हुआ है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक सुशील ने 7 जुलाई को सुसाइड की. सुशील एक्टर के साथ फिटनेस ट्रेनर भी थे. एक अन्य खबर में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मनियर नगर पंचायत की ईओ (अधिशासी अधिकारी) मणि मंजरी राय की मौत ने भी समाज को झकझोर दिया है. पीसीएस अधिकारी मणि मंजरी राय ने सोमवार की देर रात पंखे के हुक से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. इस दौरान उन्होंने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है. बरामद हुए सुसाइड नोट में लिखा है कि वह दिल्ली, मुंबई से बचकर बलिया चली आईं. लेकिन यहां उन्हें रणनीति के तहत फंसाया गया है, इससे वह काफी दुखी हैं. लिहाजा उनके पास आत्महत्या करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है.

घर परिवार के लोग, इस बात पर कायम हैं कि वह बहुत शांत और सजग लड़की थी, जिस पर पिछले कई दिनों से अधिकारियों और ठेकेदारों द्वारा ठेकों के फर्जी पेमेंट को ले कर दबाव बनाया जा रहा था. वह इसे हत्या मान रहे हैं, किंतु यह स्पष्ट है कि अपराधियों व भ्रष्ट अधिकारियों ने समाज मे एक नेक्सस बना रखा है, जिसकी भेंट अक्सर मंजरी जैसे उत्साही युवा चढ़ जाते हैं. एक अन्य घटना में दिल्ली के एम्स हस्पताल में दैनिक भास्कर अखबार के पत्रकार तरुण सिसोदिया ने बिल्डिंग से कूद कर अपनी जान दे दी, वह कोरोना पॉजिटिव थे और बताया जा रहा है, छंटनी के तहत उनको नौकरी से भी निकाला जा चुका था. उन पर अपने परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी थी.

समस्याएं भले ही विकट थीं किंतु आत्महत्या किसी भी समस्या का हल कैसे हो सकता है. आत्महत्या की इन खबरों के बाद से हर तरफ डिप्रेशन, मानसिक समस्याओं, समाज की भूमिका आदि पर खूब चर्चा हो रही है. सुशांत जैसों का एक छोटी सी उम्र में अचानक दुनिया से चले जाना सबको हतप्रभ कर गया है. सुशांत एक चर्चित व्यक्ति थे, उनकी लोकप्रियता सबके सिर चढ़ कर बोलती थी. किंतु हम अपने आस पास नज़र डालें तो पता चलता है सुशांत, मंजरी, गौड़ा, तरुण जैसे कितने ही लोग लगभग रोज ही अलग अलग कारणों से आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं. कई घटनाओं में तो आत्महत्या की वजह इतनी हल्की होती है कि सहसा विश्वास ही नही होता.

27 जून को गाज़ियाबाद में निखिल और पल्लवी नामक एक दंपति ने एक साथ आत्महत्या कर ली, इनकी 2 साल पहले ही शादी हुई थी, और 6 महीने का एक बच्चा भी था. मरने से पहले दंपत्ति ने छोटी बहन को sms के जरिये लिखा था, हम जा रहे हैं सुबह बच्चे को ले जाना. दोनों एक अच्छे इलाके में अच्छे घर मे रहते थे, पति की अच्छी खासी नौकरी थी, और अब तक कोई भी कारण पता नही चला है जो इशारा कर सके कि इस जोड़े ने इतना घातक कदम कैसे उठा लिया.

आत्महत्या की वजहें कई हैं
अकाल मौत के कारणों में आत्महत्या ही ऐसा कारण है जिस पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है. किंतु शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब देश के किसी न किसी इलाके से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, कर्ज जैसी तमाम आर्थिक तथा अन्यान्य सामाजिक दुश्वारियों से परेशान लोगों के आत्महत्या करने की खबरें न आती हों. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में दुनियाभर में होने वाली आत्महत्याओं को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके मुताबिक दुनिया के तमाम देशों में हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं, जिनमें से लगभग 21 फीसदी आत्महत्याएं भारत में होती है.

मतलब दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा
ऐसा नहीं है कि लोग आत्महत्या सिर्फ आर्थिक परेशानियों के चलते ही करते हों, अन्य सामाजिक कारणों से भी लोग अपनी जान दे देते हैं. दरअसल, आज इंसान के चारों तरफ भीड़ तो बहुत बढ़ गई है लेकिन इस भीड़ में व्यक्ति बिल्कुल अकेला खड़ा है. परिवार, मित्र, संगी-साथी तथा स्कूल जैसी ताकतवर संस्थाएं तक आत्महत्या के निवारण मे खुद को असहाय महसूस कर रही है. यही कारण है कि आज बच्चों, नौजवानों, छात्रों, नवविवाहित दुल्हनों तथा किसानों की आत्महत्याएं सामाजिक संवेदनाओं का हिस्सा तक नहीं बन पा रही है. हैरत की बात यह है कि भारतीयों के बारे में कहा जाता है कि हर विपरीत से विपरीत स्थितियों में जीवित रहने का हुनर हमारे स्वभाव और संस्कार में है. भारतीय परंपरागत रूप से परिवार और अपने आसपास के लोगो से भावनात्मक जुड़ाव रखने के लिए जाने जाते हैं. परंतु नवउदारीकृत अर्थव्यवस्था ने हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को जिस तरह चोट पहुंचाई है उससे देश में आत्महत्या की बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया है.

भारत मे स्थिति भयावह है

भारत में आत्महत्या करने वालों में बड़ी तादाद 15 से 29 साल की उम्र के लोगों की है, यानी जो उम्र ऊर्जा से भरी होने और दुनिया से संघर्ष करने की होती है, उसी उम्र में लोग जीवन से पलायन कर जाते हैं. इस भयानक वास्तविकता की एक बड़ी वजह यह है कि पिछले कुछ दशकों में लोगों की उम्मीदें और अपेक्षाएंतेजी से बढ़ी हैं, लेकिन अवसर उतने नहीं बढ़े. दरअसल, उम्मीदों और यथार्थ के बीच बड़ा फर्क होता है. यही फर्क अक्सर आदमी को घोर अवसाद और निराशा की ओर ले जाता है. आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि आईआईटी व आईआईएम जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों तक में छात्रो के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. यह स्थिति हमारी समाज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है. आमतौर पर बच्चों, युवाओं, महिलाओं और किसानों के बीच बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के लिए परीक्षाओं का तनाव व दबाव, प्रेम में नाकामी, दहेज-लोलुपता, गरीबी, बेरोजगारी, नशे की लत जैसे कारकों को जिम्मेदार माना जाता है. लेकिन ऐसी दशाएं तो कमोबेश प्रत्येक देश-काल में मौजूद रही हैं. परंतु पहले लोग इतनी बड़ी तादाद में और इतनी जल्दी जीवन से हार नहीं मानते थे. दरअसल, आज व्यक्ति अपने जीवन की कठिन सच्चाइयों से मुंह चुरा रहा है और अपने को हताशा और असंतोष से भर रहा है. आत्महत्या का समाजशास्त्र बताता है कि व्यक्ति में हताशा की शुरुआत तनाव से होती है जो उसे खुदकुशी तक ले जाती है. यह हैरान करने वाली बात है कि भारत जैसे धार्मिक और आध्यात्मिक स्र्झान वाले देश में कुल आबादी के लगभग एक तिहाई लोग गंभीर रूप से हताशा की स्थिति में जी रहे हैं. कुछ दिनों पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि देश के लगभग साढ़े छह करोड़ मानसिक रोगियों में से 20 फीसदी लोग अवसाद के शिकार हैं.

अवसाद से उपजती है आत्महत्या की भावना
आत्महत्या की 80 प्रतिशत घटनाओं में अवसाद यानी डिप्रेशन एक बड़ा कारण होता है. समय आ गया है कि समाज, मानसिक बीमारियों पर गंभीर हो कर विचार करे. लखनऊ के अपोलो अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति द्वारा खुदकुशी के पीछे निराशा का बहुत बड़ा रोल होता है. जरूरी नही है कि निराशा दीर्घकालिक हो, कम समय पर उठा तीव्र निराशा का भाव भी खतरनाक है. निराशा से घिरे लोगों के मन में लगातार इस तरह के विचार आते रहते हैं कि अब स्थितियों को संभाला नहीं जा सकता. अपनी हालत को बेहतर करने का कोई तरीका नहीं बचा है. उन्हें कोई उम्मीद की किरण
नहीं दिखाई देती है. उनके अंदर उदासी बहुत गहरे तक बैठ जाती है.ऐसे में व्यक्ति खुद को दूसरों के ऊपर बोझ समझने लगता है. उसे लगता है कि उसकी वजह से सब परेशान हैं. इसलिए वह लोगों और अपनी परेशानियों दोनों से दूर चले जाना चाहता है और आत्महत्या का ही विचार उसके मन में बार-बार आता है. निराशा से घिरे होने की स्थिति में कुछ लोग अपने दोस्तों और परिवार से मिलना या बात करना भी कम कर देते हैं और धीरे धीरे यही निराशा अवसाद का रूप ले लेती है.

आत्महत्या निरोधी कानून में ढील
कानून की किताबों में आत्महत्या को अपराध माना गया है. इसके पीछे सोच यह है कि मनुष्य जीवन अनमोल है और उसे नाहक ही खत्म करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है. और अगर कोई व्यक्ति ऐसा करने का प्रयास करता है तो उसके लिए राज्य की ओर से दंड का प्रावधान हो ताकि उससे सबक लेकर कोई अन्य व्यक्ति इस तरह की कोशिश न कर सके. किंतु पिछले दिनों आईपीसी की धारा 309 में बदलाव करते हुए आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. उल्लेखनीय बात यह भी है कि केंद्र सरकार के इस प्रयास का 25 राज्य सरकारों ने भी समर्थन किया था. यानी लोगों के आत्महत्या की राह आसान बनाने के सवाल पर देश में राजनीतिक स्तर पर आम सहमति है. भोपाल के मनोचिकित्सक विकास द्विवेदी का कहना है कि आत्महत्या की रिपोर्टिंग ज्यादातर सनसनीखेज घटना की तरह की जाती है, इसके सामाजिक और मानसिक पक्ष को समझने और बताने की आवश्यकता है. राजनेताओं से लेकर समाज एवं परिवार के स्तर तक, मानसिक अवसाद और उससे उपजने वाली हताशा पर गंभीर चिंतन होना चाहिए. यहां यह हकीकत भी नहीं भूलनी चाहिए कि हमारे समाज में ऐसे शातिर अपराधियों की कमी नहीं है जो यह जानते हैं कि किसी सुनियोजित हत्या को कैसे आत्महत्या का रूप दिया जाए. इस आपराधिक नेक्सस को बिना उतार फेंके समाज का भला नही हो सकता.

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