होईहै सोई जो राम रचि राखा

-अपर्णा पात्रीकर 

सुबह जागते ही आजकल मुँह से निकलता है- हे राम और सपने भी अजीब आते हैं। बीती रात सपने में मैं राम-नाम का दुशाला ओढे भगवाधारी होकर गंगा किनारे ध्यानावस्था में बैठा था कि अचानक पहाड़ों पर पहुंच गया और फिर तलाशता हुआ अयोध्या। अपने रामजी को तलाशता-पुकारता हुआ। तभी नेपथ्य से कुछ स्वर कानों में यकायक गूंजने लगे- मोकू कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास रे,न मैं मंदिर न मैं मस्जिद,न काशी कैलाश रे! तभी नींद खुल गई और मुँह से निकला- हे राम!

 ऐसा कुछ न कुछ आजकल रोज ही हो जाता है। सुप्तावस्था से बाहर निकलने की कशमकश सदा रहती है। फिर सब छिटक जाता है जब अखबार और एक कप चाय सामने होते हैं। आज अखबार सामने आया तो न कोरोना था, न चीन-लद्दाख, न महाकालेश्वर पहुंचकर दुर्गति को प्राप्त हुआ विकास बल्कि इन सबको पीछे धकेलकर अपने राम जी सुर्खियों में थे। भौचक रह गया कि मेरे राम जी मुझसे छिटककर अखबार की सुर्खियों में कैसे पहुंच गए। अपने राम जी को अपने भीतर झांका तो उनके दर्शन से पहले मुँह से निकला- हे राम!

अखबार की सुर्खियों से पता चला कि भव्य राम मंदिर का शिलान्यास और उसके आकार लेने में बहुत कम समय लगेगा।नवम्बर से राम जी के दर्शन के लिए कपाट खोल दिए जाएंगे। भक्त आराधना कर सकेंगे। मन प्रसन्न हो गया लेकिन फिर दिमाग में दही जमने लगा।

विचलित मन बार-बार दिमाग पर हथोड़े बजाने लगता। घबराहट होती कि नवम्बर के बाद मेरा क्या होगा! मेरे राम जी मुझे छोड़कर मंदिर में चले जाएंगे। घबराहट होती कि मेरे हृदय में बसने वाले राम जी के दर्शनों के लिए क्या अब कतार में लगना होगा। फिर सोचा कि आखिर इतनी जल्दी क्या है राम जी को मंदिर में जा बसने की कहीं हमसे कोई भूल तो नहीं हो गई मन ही मन उन सारे कर्मों का मंथन कर लिया जो कि इस निर्णय के जिम्मेदार लग रहे थे. ऐसा कुछ तो पकड़ में आया नहीं .अलबत्ता एक भूल के फिर खुद को समझाया मेरे अकेले वोट से तो सरकार बनी नहीं है तो फिर ये भूल कोई मेरे अकेले की तो हुई नहीं।हम सबने दुबारा इस भूल को किया है, और किया भी तो आपके राज की संस्थापना के लिए ही है,प्रभु तरस गए थे हम राम राज के लिए आ गए बातों में भूल गए ‘कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें है बातों का क्या’.तो कहीं ऐसा तो नहीं कि राम जी इसी बात से नाराज़ होकर चले जा रहे हैं।

 जब लगा कि ये बात हो सकती है फ़िर एक बार ये विचार भी मन में आया कि राम जी को याद दिला दूं कि आप भी तो वही गलती दुबारा कर रहे हैं पहले भी एक बड़बोले की बातों में आकर माता सीता को इतना कठोर दण्ड दे चुके हैं,अब दुबारा क्यूं बड़बोले के चक्कर में उलझ रहे है??,प्रभु ज़माना बदल गया है।आप भी तो थोड़ा सा बदलिए, मगर छोटा मुंह बड़ी बात हो जाती सो चुप रहने भलाई समझी,यूं भी मन की बात कहने की आज़ादी अब सबके पास कहां??? इस पर तो सर्वाधिकार सुरक्षित हो गए हैं। ख़ैर एक लम्बी सांस भरके बची हुई खबर पढ़ी। मन दुबारा गार्डन- गार्डन हो गया. अनायास ही मुंह से निकल पड़ा वाह प्रभु ये तो आपकी ही माया है कि सारे कामकाज परे रखवा कर, मंदी बेरोज़गारी, महंगाई सबकी चिंता भुलवा कर आप जिसे चाहो अपने काम में लगा सकते हो।

 लेकिन प्रभु ये क्या!आपने तो लंका विजय के बाद अपनी राम पंचायत में अपने हर साथी को स्थान दिया था,मैंने कलेंडरों में साफ साफ देखा है हनुमान जी,जांबुवंत सब मौजूद थे आपके साथ राज्याभिषेक में,फिर इस बार क्या हुआ प्रभु?

जिन लोगों ने इस कलियुग में आपकी याद दिलवाई आपके मंदिर की ज़िद पर अड़ गए, भले आपकी परम्परा संबंधों के आगे राजपाट छोड़ने की रही हो. फिर भी प्रभु… आपके इस भव्य मंदिर को बनाने का बीड़ा उठाया, तन मन धन सब समर्पित किया, कलियुगी लोग तो भूल चुके थे. आपके मंदिर की महत्ता को उन सबके मन मस्तिष्क में आपकी उपस्थिति,आपकी आस्था फिर जगाई और इस पूरे घटनाक्रम में वो बेचारे बूढ़े हो गए उनको क्यूं सेवा का अवसर नहीं दे रहे हैं प्रभु???

आज नहीं कल उनको आखिर आना तो उनको आपके पास ही है। फिर बुढ़ापे में ये गत क्यूं?? आप ही कहिए क्या सच में ऐसा करना शोभा देता है!अब ये मत कहिएगा राम जी कि आप भी हमारी तरह मजबूर हो गए हैं,कि अब मंथरा ने भेस बदल लिया है और आजकल वो एक अदद दासी नहीं बल्कि अपनी धूर्तता की योग्यता के कारण देश के दूसरे महत्वपूर्ण पद पर जमी हुई है,वो सुनती ही नहीं किसी की।

हे राम !बस आप ही है जिनसे इतनी बातें कह पाए हैं वरना अभी तक तो मीडिया सेल वालों ने धिक्कार की सारी हदें लांघ दी होती। ख़ैर अब सब आपके भरोसे ही है,तो भगवन! ज़रा सा हम भक्तों का खयाल रखीएगा,हम तो आपके भक्त है सच्चे वाले,बाकी के भक्तों की राम जाने।

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