ये हिंदी मीडिया किस तंत्र का खंभा है?

राजेंद्र तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार, राँची 

आज यहां कुछ ऐसी खबरों की बात करेंगे जिन पर हमारे अखबारों को खास तवज्जो देनी चाहिए थी। पहली खबर, चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की एडीबी में नियुक्ति। दूसरी खबर, अमेरिका में एफ-१ व एम-१ वीजा को लेकर उच्च शिक्षण संस्थाओं का ट्रंप सरकार के खिलाफ अदालत जाना और फिर अमेरिकी प्रशासन द्वारा फैसला वापस लेने की। तीसरी खबर, बिहार के अररिया में बलात्कार की शिकार लड़की के जोर से बोलने को अदालत की अवमानना मानकर लड़की को जेल भेजने की घटना। और चौथी खबर है, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत द्वारा मीडिया को उसकी भूमिका समझाये जाने की। ये खबरें ऐसी हैं जिनको सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति पर बयान का बैनर  उठाया जा सकता है। कुछ अंगरेजी अखबारों ने ऐसा किया भी लेकिन हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के अखबार इससे बेखबर ही दिखाई दिये। ये खबरें हिंदी अखबारों छपी हैं लेकिन उचित संदर्भ व परिप्रेक्ष्य से काटकर। 

अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा आनलाइन क्लास करने वाले विदेशी छात्रों का वीजा रद्द करने की घोषणा की गई थी। इस पर खूब हल्ला मचा और हार्वर्ड विवि व एमआईटी इस फैसले के खिलाफ बोस्टन के कोर्ट में गये। बाद में दबाव में ट्रंप प्रशासन को यह फैसला वापस लेना पड़ा। यह खबर विदेशी छात्रों का वीजा बरकरार रखे जाने की जगह अमेरिकी बौद्धिक-शिक्षण संस्थानों के लोकतांत्रिक संस्थाओं के तौर पर खड़े होकर प्रशासन को चुनौती देने की है। लेकिन अमेरिकी अखबारों, न्यूयॉर्क टाइम्स व वाशिंगटन पोस्ट ने तो इसी संदर्भ-परिप्रेक्ष्य में दिया लेकिन हमारे यहां खबर भारतीय छात्रों के वीजा के इश्यू में सिमट कर रह गई। उदाहरण के तौर पर हिंदुस्तान टाइम्स को ही लें। इसके १६ जुलाई के अंक में पहले पेज लीड खबर यही है लेकिन शीर्षक लगा है – अमेरिका के नये वीजा नियमों के वापस लेने से छात्रों को राहत। इससे पहले जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या और उसके बाद अमेरिका में शुरू हुए देशव्यापी प्रदर्शनों, इन प्रदर्शनों से निपटने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा सेना की तैनाती की घोषणा के बाद रक्षा मंत्री व थल सेना प्रमुख द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ स्टैंड लेना और सेना के उतारने से इनकार कर दिये जाने की खबरों का ट्रीटमेंट भी बहुत चलताऊ तरीके से हमारे अखबारों में किया गया जबकि इन खबरों को उचित परिप्रेक्ष्य में प्रमुखता से देकर उन सब बातों को बारीक व तीखे तरीके से पाठकों के सामने रखा जा सकता था जिन पर मीडिया स्थानीय घटनाओं के संदर्भ में बात करने से बचने की राह ही अपनाता रहता है। लेकिन क्या ऐसा हुआ?

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की एडीबी में नियुक्ति को हिंदी अखबारों में ऐसे छापा गया है जैसे लवासा ने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। अंगरेजी अखबार पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि खेल क्या व क्यों हुआ और खेल कर कौन रहा है। टेलीग्राफ ने इसे पहले पेज पर प्रमुखता से दिया है और हेडिंग बहुत ही मारक – How to pluck EC thorn in Modi’s side. इंडियन एक्सप्रेस व इकोनॉमिक टाइम्स ने भी पृष्ठभूमि के साथ यह बताया है कि कैसे लवासा को मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से रोक दिया गया। हिंदुस्तान व प्रभात खबर में तो यह खबर दिखाई ही नहीं दी। नवभारत टाइम्स में खबर लगी जरूर है लेकिन लवासा की उपलब्धि के तौर पर। 

बिहार के अररिया जिले की खबर बहुत ही महत्वपूर्ण खबर थी। अक्लियत समाज की बेहद ग़रीब बच्ची के साथ गैंगरेप हुआ, थाने में शिकायत भी दर्ज हुई, लेकिन जब यह मामला ज़िला अदालत में पहुँचा तब उस पीड़ित बच्ची का सामना न्यायिक व्यवस्था की अड़चनों से हुआ। ज़िला अदालत में बयान दर्ज कराने के बाद पीड़िता समेत दो अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को न्यायालय की अवमानना के आरोप में जेल भेज दिया गया। इस खबर को राष्ट्रीय हिंदी अखबारों ने भागलपुर से छपने वाले लोकल संस्करण में ही निपटा दिया। दूसरे संस्करणों में यह खबर पहुंची ही नहीं। बाद में जब हल्ला मचा तो वेबसाइटों पर खबर दिखाई दी। जबकि यह खबर कमजोर होते लोकतंत्र की डुगडुगी पीट रही है। स्मरण कीजिए कि कैसे महाराष्ट्र के पालघर की घटना पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने किस तरह हल्ला मचाया था और इस घटना पर चुप्पी। वजह समझना बहुत कठिन नहीं है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत ने मीडिया से ही पूछ लिया कि लोकतंत्र की रक्षा करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने न्यूज एंकरों पर निशाना भी साधा। इस खबर को भी हिंदी अखबारों ने दबा दिया। कहीं कोई जिक्र नहीं। 

आखिर ये हिंदी मीडिया किसका खंभा है?

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