नेपाल में अयोध्या का दावा करने वाले ओली हिंदी की चिंता क्यों नहीं करते

माता सीता की जन्मभूमि जनकपुर की प्रिय भाषा रही है हिंदी

यशोदा श्रीवास्तव, नेपाल मामलों के विशेषज्ञ

—यशोदा श्रीवास्तव  

नेपाल में अयोध्या का दावा करने वाले पीएम ओली अपने देश में हिंदी की चिंता क्यों नहीं करते? उन्हें डर तो नहीं कि नेपाल के पहाड़ी लोग हिंदी सीख लिए तो ओली जैसे पहाड़ी लोगों के हाथ से सत्ता छिटक सकती है? ओली के अयोध्या पर दिए बयान के बाद यह सवाल इसलिए समीचीन है कि अयोध्या के पहले जनकपुर जो नेपाल में ही है, वहां की आम बोलचाल की भाषा हिंदी ही है.

भारत में एक दो प्रदेश में नेपाली बोले जाने की वजह से यह भाषा आठवीं अनुसूची में दर्ज है जबकि नेपाल में तराई के 22 जिलों की प्रिय भाषा हिंदी होने के बावजूद इसे कोई सरकारी तवज्जो नहीं है.नेपाल में हालत यह है कि यहां हिंदी की आत्मा भटक रही है. अपना मुकाम हासिल करने को इसे समय समय पर हुक्मरानों से जूझना पड़ रहा है.कुछ साल पहले नेपाल में हिंदी की उपेक्षा का एक उदाहरण तब सामने आया था जब वहां के तत्कालीन उपराष्ट्रपति परमानंद झा के ओहदे पर ग्रहण लग गया था क्योंकि उन्होंने हिंदी में शपथ लेने की गुस्ताखी की थी.इसके इतर नेपाल में चीनी भाषा को लेकर संकट नहीं है.हालांकि इसे बोलने और समझने वालों की संख्या शायद अंगुलियों पर गिनने भर से भी कम है लेकिन इसे पढ़ाया जा रहा है.जगह जगह इसके कोचिंग चल रहे हैं.लेकिन हां,इसे पढ़ाने के लिए चीन अपने तरफ से चीनी अध्यापक उपलब्ध करा रहा है.नेपाल के हिंदी साहित्यकार भी नेपाल में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए भारत की ओर ताक रहे हैं.

काठमांडू में त्रिभुवन यूनिवर्सिटी की हिंदी विभाग की सह विभागाध्यक्ष संजीता वर्मा कहती हैं कि हिंदी विश्व की शक्तिशाली भाषाओं में से एक है, पूरी दुनिया में करीब 80 करोड़ लोगों द्वारा यह पढ़ी और बोली जा रही है, भारत की यह राज भाषा है ही लेकिन नेपाल में हिंदी का कोई मुकाम नहीं है,यह पूरी तरह उपेक्षित है.हिंदी की इतनी उपेक्षा हमारे उस पड़ोसी मित्र राष्ट में है जहां की 95 फीसदी लोग हिंदी बोलते हैं, पढ़ते और समझते हैं. हिंदी फिल्मों की गीत इनकी पहली पसंद है और हिंदी फिल्मों के देखने के लिए ये घंटों लाइन में खड़ा रहकर टिकट लेते हैं. नेपाल में किसी कोने में हिंदी की पढ़ाई नहीं होती,ऐसे में विश्वविद्यालयों में हिंदी के छात्र कहां से आएंगे? और लोग हिंदी पढ़े भी क्यों जब नेपाल में किसी नौकरी में हिंदी की अनिवार्यता नहीं है. हैरत है कि काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिंदी स्नातक के कुल छह छात्र हैं.

नेपाल में हिंदी के अतीत और वर्तमान पर गौर करें तो यह सच सामने आता है कि हिंदी जिसका नेपाल में कभी गौरवशाली अतीत रहा है वह आज बिना मुकाम के दयनीय दशा में है. नेपाल का जनक माने जाने वाले पृथ्वी नारायण शाह नाथ संप्रदाय के उन्नायक हिंदी के विख्यात कवि उत्तर भारत में हिंदू धर्म और संस्कृति के रक्षक योगी गोरखनाथ के बड़े भक्त थे. पृथ्वी शाह स्वयं भी हिंदी के कवि थे.इनकी स्वयं की ढेर सारी रचनाएं हिंदी में होने का प्रमाण मिलता है.

तब के नेपाल में पहाड़ से लेकर मैदान तक हिंदी के बहुत सारे साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी मेें एक से एक लोकप्रिय रचनाएं की.इस तरह नेपाल में हिंदी साहित्य में संत महात्माओं का योगदान अविसमरणीय है. हिंदी के उत्थान में राजा महाराजाओं में पृथ्वी नारयण शाह के बाद श्री 5 राजेंद्र के सुपुत्र श्री 5 उपेंद्र वीर विक्रम का नाम भी प्रमुख है. मल्ल काल में हिंदी साहित्य लेखन का विकास तेज गति से हुआ. मल्ल राजा स्वयं भी हिंदी में रचना करते थे और रचनाकारों को हिंदी तथा मैथिली में रचना के लिए प्रेरित भी करते थे. इस तरह देखें तो नेपाल में प्राचानी काल से लेकर मध्यकाल तक राजा महाराजाओं से लेकर संत महात्माओं तक ने हिंदी को रचनाओं के माध्यम से काफी आगे बढ़ाया.

नेपाल में 1951 ईस्वी तक हिंदी नेपाली शिक्षा का माध्यम रही और नेपाली प्रशासन की भाषा.पृथ्वी नारायण शाह के शासन काल में प्रशासनिक कार्य हिंदी के साथ स्थानीय भाषा में होता रहा. शाह वंश के प्रारंभिक शासकों ने राजभाषा के रूप में हिंदी तथा नेपाली दोनों को अपनाया. राणाओं के 104 वर्ष के शासन में भाषा को लेकर कोई समस्या नहीं थी. हिंदी और नेपाल दोनों का समान महत्व था. 1951 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद 1954 में राष्टीय शिक्षा योजना आयोग की स्थापना हुई. इस आयोग के 1956 की संस्तुति के आधार पर नेपाल में हिंदी शिक्षा की पढ़ाई बंद कर नेपाली शिक्षा की अनिवार्यता कर दी गई. राष्टीय शिक्षा आयोग की इस रिपोर्ट का भारी विरोध हुआ. हिंदी के बाबत चले विरोध और आंदोलन के बीच हुए 1959 के चुनाव में नेपाली कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की रकार आ गई. प्रधानमंत्री वीपी कोइराला ने तत्कालीन शिक्षा आयोग की संस्तुति को निरस्त कर प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय तक में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाए रखने की अनुमति दे दी.1960 में वीपी कोइराला की चुनी हुई सरकार को भंग कर दिया गया.इसके बाद की पंचायती राज व्यवस्था ने स्कूलों से लगातय विश्वविद्यालयों तक से हिंदी हटा दिया और इसे विदेशी भाषा तक घोषित कर दी गई. इतना ही नहीं 1950 में नेपाल में भारत द्वारा स्थापित नेपाल भारत संस्कृतिक केंद्र की सभी शाखाएं भी बंद कर दी गई.

स्कूली पाठ्यक्रम में कक्षा 9 और 10 में विकल्प के रूप में हिंदी पढ़ाने का प्रावधान तो था लेकिन इसके शिक्षक ही नहीं उपलब्ध कराए गए. परिणामतः हिंदी शिक्षा हासिए पर जाता चला गया. पंचायत प्रणाली के तहत हिंदी को बुरी तरह हतोत्साहित किया गया. इस दौरान नेपाल रेडियो द्वारा प्रसारित होने वाला हिंदी भाषा के समाचार को भी बंद कर दिया गया. इसी साल जनवरी के 10 तारिख को काठमांडू में अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर विश्व के करीब 15 देशों के हिंदी प्रेमी इकट्ठा हुए और ओली सरकार से हिंदी के लिए कुछ सकारात्मक पहल की अपील की जिसका ओली सरकार ने नोटिस तक नहीं लिया.आज नेपाल में हिंदी की क्या दशा है, इसपर त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की सह विभागाध्यक्ष संजीता वर्मा का कटाक्ष काबिले तारीफ है कि , नेपाल रेडियो का बहुत बड़ा एहसान है जो फिलहाल इस वक्त कुछ मिनट के लिए ही हिंदी में समाचार सुना देता है.

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