किसान कानून पर सरकारी जिद

हिसाम सिद्दीक़ी 
मुल्क में किसानों और किसानी से मुताल्लिक तीन बिल मोदी सरकार ने पार्लियामेंट से जबरदस्ती इक्कीस सितम्बर को पास करा लिए थे।

जबरदस्ती इसलिए कि राज्य सभा में बीजेपी की अक्सरियत नहीं थी तो आरएसएस के रंग में पूरी तरह शराबोर हो चुके पुराने समाजवादी हरिवंश सिंह ने तमाम जम्हूरी इकदार (मूल्यों) को तार-तार करके आवाज के वोट पर बिल पास हो जाने का एलान कर दिया।

हरिवंश सिंह भी क्या करें नितीश कुमार की दोस्ती में नए-नए बीजेपी हामी बने हैं।

बीजेपी के वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने उन्हें पहली बार ही राज्य सभा पहुंचने पर डिप्टी चेयरमैन का ओहदा देकर एखलाकी (नैतिक) तौर पर खरीद लिया।

कोई शख्स पैसों से बिकता है, कोई ओहदे के एवज में बिकता है और कोई एखलाकियात (नैतिकता) छोड़ कर जमीर ही फरोख्त कर देता है।

आम राय यह है कि हरिवंश ने अपना जमीर  और एखलाकियात (नैतिकता) दोनों ही फरोख्त कर दी और किसान मुखालिफ बिल राज्य सभा में जबरदस्ती पास करा दिया।

किसान बिल पास होने के बाद से ही देश का किसान सड़कों पर है शहरियत कानून (सीएए) की मुखालिफत करने वालों के खिलाफ बीजेपी ने जिस तरह कपिल मिश्रा जैसे जहरीले गुण्डों की फौज खड़ी की  थी ठीक उसी तरह बीजेपी ने इस बार किसान बिल की हिमायत में एक फौज मैदान में उतार दी है।

यह अलग बात है कि इस फौज में किसानों के बजाए गुण्डे किस्म के लोगों को भरा गया है।

इन गुण्डों से कहा गया है कि वह लाठी-डंडों और असलहों के जरिए आम किसानों को यह तस्लीम करने पर आमादा करें कि किसानी बिल काश्तकारों के फायदे में है।

पच्चीस सितम्बर को पूरे मुल्क की तरह बिहार के किसान भी सड़कों पर उतरे इत्तेफाक से पप्पू यादव की पार्टी के किसान एक ट्रक में जा रहे थे जिनकी तादाद कम थी फिर क्या था बीजेपी के लठैत गुण्डों ने ट्रक रोक कर उसपर लगे बैनर पोस्टर फाड़ डाले और ट्रक पर सवार किसानों को बुरी तरह लाठियों से पीटा।

पुलिस इन गुण्डों के साथ मौजूद रही मतलब साफ है कि अब अगर कोई भी शख्स वजीर-ए-आजम मोदी के किसी भी फैसले से इख्तिलाफ जाहिर करेगा तो उससे लाठियां के जरिए मोदी का फैसला तस्लीम कराया जाएगा।

इन बिलों पर सत्ताइस सितम्बर को इतवार की छुट्टी के दिन राष्ट्रपति (सदर जम्हूरिया) ने दस्तखत भी कर दिए।

किसानी बिल मुल्क के किसानों के मफाद में नहीं है इससे किसानों को मुस्तकबिल में बहुत बड़ा नुक्सान होने वाला है। उनसे उनकी पैदावार औने-पौने ले ली जाएगी।

वजीर-ए-आजम मोदी काफी दिनों बाद इस बिल पर जितना बोल रहे हैं उतना तो वह चीनी फौजों की घुसपैठ पर नहीं बोले।

वह बार-बार एक ही रट लगाए हुए हैं कि किसान बिल की मुखालिफत करने वाले झूट बोल कर किसानों को गुमराह कर रहे हैं।

उनका बार-बार यह कहना है कि मुल्क में किसानों की पैदावार की खरीद के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइज का सिस्टम जारी रहेगा। इसे खत्म नहीं किया जाएगा।

किसानों की दिलचस्पी इसमें है कि मिनिमम सपोर्ट प्राइज रहने का नहीं किसानों को मिलने का सवाल है एमएसपी रहे भी काश्तकारों को मिले भी नहीं तो इसके रहने न रहने का क्या मतलब है?

इसीलिए किसानों का एक ही अहम मतालबा है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा दे दिया जाए ताकि अगर कोई व्यापारी या अढतिया किसानों को एमएसपी से कम भुगतान करे तो किसान अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे सके।

मोदी यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हैं वह दुनिया भर की बातें कर रहे हैं लेकिन एमएसपी को कानूनी दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हैं।

इससे तो यही साबित होता है कि मोदी बड़े व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह किसान बिल लाए हैं।

अपने हर फैसले की तरह किसान बिल लाने से पहले मोदी ने न तो किसान यूनियन के नुमाइंदों से कोई बात की न अपोजीशन पार्टियों से की न जरई (कृषि) मामलात के माहिरीन से ही कोई राय मश्विरा किया और कोविड-19 की वबा के दौरान बाकी अहम काम छोड़ कर किसान बिल ले आए।

अब अगर आप बिल ले ही आए है और उसे पास भी करा लिया है तो इसी बिल में किसानों और अपोजीशन का भी एक मतालबा तस्लीम करके यह भी शामिल करा दीजिए कि काश्तकारों को अपनी पैदावार का मिनिमम सपोर्ट प्राइस हासिल करने का कानूनी हक मिलेगा।

बीजेपी की जानिब से बार-बार यह कहा जा रहा है कि वजीर-ए-आजम मोदी बार-बार वादा कर रहे हैं कि एमएसपी रहेगा इसे खत्म नहीं किया जाएगा तो अपोजीशन पार्टियों और हड़ताल कर रहे किसानों को वजीर-ए-आजम मोदी के वादे पर भरोसा करना चाहिए इसके जवाब में अपोजीशन और किसानों का कहना है कि मोदी तो गुजिश्ता छः सालों से देश से झूट ही बोलते आए हैं, झूटे वादे करते आए हैं, वह पार्लियामेंट और लाल किले की फसील (प्राचीर) तक से झूट बोलते हैं।

इसीलिए उनपर भरोसा नहीं किया जा रहा है।

लोगों का कहना है कि नोटबंदी करने और जीएसटी लाने के वक्त नरेन्द्र मोदी ने देश से जो वादे किए थे उनमें कौन सा वादा पूरा हुआ है जो अब उनके किए नए वादे पर भरोसा कर लिया जाए?वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी जिस शिद्दत के साथ किसान बिलों को अच्छा और किसानों के लिए बेहतरीन कानून बता रहे हैं उसीसे अंदाजा लगता है कि दाल में कुछ काला जरूर है।

सत्ताइस सितम्बर को उन्होने आल इंडिया रेडियो के जरिए जो मन की बात मुल्क पर मुसल्लत की उसमें भी इन बिलों को ही बेहतरीन बिल बताने की कोशिश की और कहा कि इन बिलों के नाफिज होने के बाद मुल्क के किसान पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएंगे।

उन्होने कहा कि किसानों को अब पहली बार आजादी मिली है। यकीनन वह उस कारपोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए देश और देश के किसानों को बेवकूफ बना रहे हैं।

जिस कारपोरेट सेक्टर के कहने पर वह यह किसान बिल लाए हैं उनके इस नए कानून में यह बंदोबस्त किया गया है कि कोई व्यापारी अपनी मर्जी मुताबिक गल्ले और दूसरी जरई (कृषि) पैदावार का स्टाक रख सकेगा।

दूसरा यह कि काश्तकार अब अपनी पैदावार सिर्फ मंडियों के बजाए जहां चाहेगें और जिसे चाहेंगे अपनी मुंह मांगी कीमत पर फरोख्त कर सकेंगे।

यह प्रावीजन भी कारपोरेट सेक्टर को ही फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है।

अभी तक बड़ी-बड़ी कम्पनियां हों, कारपोरेट सेक्टर हों या कोई दूसरा मंडियों से माल खरीदती थी तो उन्हें टैक्स देना पड़ता था जिससे रियासतों की आमदनी में इजाफा होता था अब उन्हें मंडियों के बाहर कहीं भी खरीदारी करने की छूट दे दी गई है।

इस तरह बड़ी-बड़ी कम्पनियां और कारपोरेट सेक्टर बगैर कोई टैक्स अदा किए बाहर से किसानों की पैदावार खरीद कर टैक्स की शक्ल में दिया जाने वाला करोड़ों रूपया खुद ही खा जाएंगी।

अब व्यापारियों को उनकी मर्जी मुताबिक स्टाक रखने की छूट देकर सरकार ने जमाखोरों की ही मदद की है अभी तक जमाखोरी कानून जुर्म थी अब उसे भी कानूनी जामा पहना दिया गया है।

इसके बावजूद मोदी कह रहे है कि नए किसानी कानूनों से देश के काश्तकारों को नई आजादी मिलेगी वह आत्म निर्भर और मालामाल हो जाएंगे।

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