कर्म सिद्धान्त को समझकर भीतर से समृद्ध बनें : अविमुक्तेश्वरानन्द

कर्म का सिद्धान्त एक ऐसा सिद्धान्त है जो सनातन धर्म की सर्वांगीण व्याख्या करता है। लेकिन इस कर्म सिद्धान्त के सम्बन्ध में लोगों को ठीक से जानकारी नहीं है। इसीलिए किसी-किसी के मन में निराशा, हताशा और दूसरे विपरीत विचार आते रहते हैं।

सिद्धान्त क्या है? सिद्धान्त यह है कि जैसा करोगे वैसा मिलेगा। यही सिद्धान्त है जैसी करनी वैसी भरनी। प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण : तीन तरह के कर्म होते हैं। क्रियमाण कर्म वह है जिसको हम इस समय कर रहे हैं। जैसे इस समय यहाँ आकर आप लोग दर्शन-पूजन कर रहे हैं। आप लोग आकर महात्माओं का संग कर रहे हैं। जैसे हमने आकर भगवान् बद्रीनाथ के दर्शन किए। यह सब आपका और हमारा क्रियमाण कर्म है। क्रियमाण कर्म का फल करते समय नहीं मिलता।

आप देखिए कि सबसे छोटी मजदूरी दिन भर की होती है दिहाड़ी। दिहाड़ी मजदूर को भी सबेरे से काम पर लगना पड़ता है तो शाम को उसको मजदूरी मिलती है। वह हर मिनट पर नहीं मांग सकता कि एक मिनट की मजदूरी मुझे दे दो। दूसरे मिनट का दे दो, तीसरे मिनट का दे दो या वह एक-एक घण्टे का भी नहीं माॅग सकता। सामान्य लोग एक महीने में माॅगते हैं। जैसे हमारे महिमानन्द जी एक महीना जैसे ही होता है तो कहेंगे भैया कुछ दिया जाए। पूरे एक महीने काम करते हैं तो कुछ नहीं माॅगते, बस काम करते जाते हैं क्योंकि उनको मालूम होता है कि मिलेगा। इनको यह पता है कि एक महीने के बाद पूरे महीने का एक साथ मिलेगा। है न?

उसी तरह से कुछ लोग साल भर का पैकेज लेते हैं। आप लोग बड़ी-बड़ी कम्पनियों में रहे। वहाॅ साल भर का पैकेज होता है। आपको पहले जितना एडवांस लेना है ले लीजिए। फिर साल भर का पैकेज आपको मिल जाता है। समय का अन्तराल कम या ज्यादा हो सकता है लेकिन यह बात निकल कर आती है कि जिस समय हम कोई कर्म करते हैं उसी समय उसका फल नहीं मिलता है।

हाॅ, अगर वह कर्म अति उग्र है तो उसका तत्काल फल मिल जाता है। जैसे इस बच्ची ने हमलोगों को अभी भगवान् की स्तुति सुनाई तो सुनाते ही हमने मेवा का पैकेट दे दिया। क्यों दे दिया? क्योंकि मन खुश हो गया। अत्यधिक प्रसन्नता हो गई। कोई गाली दे दे तो तत्काल ही आदमी थप्पड़ मारने को उठ जाता है, गला पकड़ लेता है। क्यों? क्योंकि अति उग्र कर्म। जितने उग्र कर्म होंगे उसका तुरन्त फल मिलेगा।

लेकिन सामान्य रूप से कर्मफल का नियम यही है कि वह करते समय नहीं मिलता है। कर्म सिद्धान्त की यही विशेषता है। इसलिए इसी के परिप्रेक्ष्य में यह समझने की आवश्यकता है कि हमको क्या मिला है और आगे क्या मिलने वाला है। अभी आप कह रहे थे कि हम कर्म करते हैं लेकिन फल मिलता हुआ दिखाई नहीं देता। जो मिल रहा है उससे अनुमान होता है कि हम क्या करके आए हैं। जैसा करके आए हो उसी के अनुसार न मिल रहा है?

हमारा समय लम्बा है। हमारे यहाँ दिहाड़ी नहीं है। महीने का और साल का पैकेज नहीं है। एक जन्म हमारे कर्मों का परिणाम है। दूसरा भोगने के लिए दूसरा और तीसरा भोगने के लिए तीसरा मिलेगा। काल अनन्त है। अनन्त काल में जब आप देखेंगे तो आपका यह सौ साल बहुत छोटा दिखाई देगा। यह बीत जाता है। पूर्व में किए का फल अब हमको मिला है। यह बात ठीक से लोग नहीं समझते। वह सोचते हैं कि इस समय हम इतने जप कर रहे हैं, इतना पूजा-पाठ कर रहे हैं, इतने मन्दिर जा रहे हैं। जाने क्या-क्या कर रहे हैं लेकिन फल मिल ही नहीं रहा है। अरे! अभी कैसे मिलेगा? पहले वाला पहले मिला है। उसको पहले भोग लो और अभी वाला आगे मिलने वाला हैं। यह बात अगर ठीक से समझ में आए तो समस्या नहीं आएगी।

लोग समझते हैं कि अभी मैं कर रहा हूँ तो अभी क्यों नहीं मिल रहा है और सिद्धान्त यह कहता है कि करते समय नहीं मिलेगा। वह क्रियमाण है। कर्म का फल बाद में मिलेगा और बाद में क्या मिलेगा? दो मिलेगा एक प्रारब्ध और दूसरा संचित! संचित है तो संचित ही हो जाएगा। हो सकता है वह हमको सौ जन्म के बाद मिले। ऐसे भी कई संचित कर्म होंगे। आपने अनन्त कर्म किए हैं क्योंकि आपके अनन्त जन्म हो चुके हैं।

अनन्त जन्मों के अनन्त कर्मों का फल आपको भोगना है तो कौन सा फल पहले भोगाया जाए और कौन सा बाद में भोगाया जाए। यह तो चित्रगुप्त और यमराज मिल कर तय करते हैं। चित्रगुप्त कर्मों की सूची निकाल कर दिखाते हैं और यमराज निर्धारण करते हैं। जैसे आपका मैनेजर जो पचास लोगों के ऊपर काम करता है उसको यह तय करना पड़ता है कि किस आदमी का कैसा उपयोग करें। कोई खाली न रहे। वह सबको किसी न किसी काम में लगाए रहता है। वह जान बूझकर दिमाग में जाल बुनता रहता है कि अच्छा यह खाली है तो इसको इस काम में लगा दो, इसको इसमें लगा दो।

इसी तरह से जिसको अनन्त कर्मों का फल आपको देना है वह भी तो कुछ जाल बुनेगा कि पहले यह वाला दो, फिर यह वाला दो। सब कर्मों का फल इसको भोगने दो। इसी में अनेक ऐसे कर्म हैं जो संचित हैं और एक प्रारब्ध है जो इस समय आप भोग रहे हैं। आपके जाने कितने कर्मों के कौन से फल हैं जो हिसाब के अनुसार बनता था वह आज इस समय आपको मिला हुआ है। अभी उसको भोग रहे हो आप। बाकी सब संचित हैं। उनका फल आपको आगे मिलने वाला है। आप जो कुछ अच्छा कर रहे हो, चाहे छोटा सा भी अच्छा काम करोगे उसका फल बनेगा और बनकर वह मिलेगा।

बेईमानी का हिसाब-किताब चित्रगुप्त का नहीं है, बहुत साफ है। जो कर्म है उसका आकलन करना, आकलन करके उसके फल का निर्धारण करना और फिर फल उपभोग में लगा देना। यह बहुत बड़ा कर्म सिद्धान्त है। आपके पिछले कर्मों का फल जो इस समय आपको मिला हुआ है वही प्रारब्ध है।

अब इसमें कई लोग बहुत दुःखी हैं। जो सुखी हैं वे अपने पुराने कर्मों के कारण हैं। लेकिन अब वे क्या कर्म कर रहे हैं, वह महत्वपूर्ण है। अगर अभी सही काम नहीं कर रहे हैं तो आगे उसका फल भोगने वाले हैं। अच्छा कर रहे हैं तो सुख मिलेगा और आपने जो पहले किया है उसका इस समय आपको मिला है। यह बात अगर आपके मन में ठीक से साफ समझ आ जाए तो समस्या नहीं होगी। इसी को साफ समझना है। यही कर्म सिद्धान्त है।

और एक बात यह कि हम कर्म के बिना तो रह नहीं सकते। कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है तो ऐसा कुछ करें जिसमें हमारी भावना जुडी हो। जैसे एक व्यक्ति मकान-दुकान बनाता है कि मेरा मकान, मेरा दुकान और एक महात्मा मठ मन्दिर बनाता है। महात्मा जानता है कि यह मेरा नहीं है। यह समाज का है।जैसे यह बिल्डिंग बनी है। ऐसी बिल्डिंग और लोगों ने भी बनाई है। आप सोचते हैं यह मेरा है और इसको मैंने बनाया।

आम व्यक्ति के मन में आ गया कि यह मेरा है लेकिन महात्माओं ने बनाया तो उनके मन में आया कि यह हमारा नहीं, समाज का है और समाज के लिए है। इस समय मुझे इसको सम्भालने का जिम्मा मिला है। जब तक हो सकेगा तब तक देखता रहूॅगा। दोनों की सोच में अन्तर है। जो कर्ता होता है वह भोक्ता होता है और जो कर्ता नहीं होता वह भोक्ता भी नहीं होता। इसीलिए कर्म करते हुए कर्म का सिद्धान्त समझे रहिए। जैसे हम और आप लोग हैं तो हममें और आपमें अन्तर क्या है? हमारे पास कुछ है ही नहीं। आप भी काम कर रहे हैं और हम भी काम कर रहे हैं। आप भी दिन-रात काम कर रहे हैं और हम भी दिन-रात काम कर रहे हैं। लेकिन आपमें और हममें अन्तर क्या हो गया कि आप कमाई के लिए कर रहे हैं और हम कमाई के लिए नहीं कर रहे हैं। कमाई के लिए नहीं, लोक कल्याण के लिए हम काम कर रहे हैं।

कमाई तो हमको पता है कि जो हमने पूर्व जन्म में किया है वह हमको मिलेगा ही। अगर भूखे रहना है तो भूखे रहेंगे। अगर राजसी भोजन मिलना है तो कोई आएगा और परोस देगा। उसको मना भी नहीं करना है। क्यों? क्योंकि जो प्रारब्ध है वही हमको प्राप्ति कराता है। हम प्रारब्ध की प्राप्ति को प्राप्त करते हैं। उसको मना भी नहीं करते हैं। उसका भोग करते हैं।

भगवान् की कृपा से गुरु के आदेश से जो प्रारब्ध रहा होगा वह हमको मिला है। इसलिए जो भगवान् दे उसको आदरपूर्वक स्वीकार करिए। उसमें कोई शिकायत नहीं करना चाहिए। किसी समय अच्छा दे दिया, किसी समय बुरा यह नहीं सोचिए। भगवान् हर समय अच्छा ही देते हैं। सामान्य दृष्टि से कह सकते हैं कि कभी कष्ट दिया, कभी सुख दिया। लेकिन सबमें आनन्द है तो ऐसी स्थिति में जो भगवान् ने दिया उसको कृपापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। इसलिए हम लोग कमाई के लिए काम नहीं करते। लोक कल्याण के लिए करते हैं और सामान्य लोग कमाई के लिए करते हैं। जो करते हैं उसका फल चाहते हैं और हम फल नहीं चाहते। हम चाहते हैं सबका कल्याण हो। हमारा जो कुछ है उसमें जिसको जो मिलना होगा मिल जाए।

अब इतना सब आप सबके द्वारा लाया गया है। इसमें फल है सेव, सन्तरा, तरह-तरह की मिठाइयाॅ हैं और अन्य चीजें भी हैं। अब इसमें से कितना हम खाएँगे पता है आपको? शायद एक टुकड़ा भी नहीं। कौन खाएगा? आप इतने सब लोग। तो हमारी प्राप्ति ऐसे बॅट जाती है। जैसे ये सब लड्डू वैसे ही हमारे कर्म भी बॅट जाते हैं। हमारे पास कुछ नहीं है। न पुण्य है, न पाप है। पाप की तरफ जाते नहीं और पुण्य अपने पास रखते नहीं। जैसे कैरियर होता है वैसे। जैसे गंगा।

गंगा की तलहटी में जो मिट्टी और पत्थर हैं उसके ऊपर पानी सदा रहता है लेकिन वह रुकता नहीं। आया, गया, आया, गया। आते जाओ, जाते जाओ। जो कुछ आएगा लोक कल्याण के निमित्त हो जाएगा और खुद सदा फकीर बने रहो। क्योंकि धन का संग्रह भी साधु के पास नहीं होना चाहिए। बड़े-बड़े मठ हैं साधुओं के। जो तथाकथित साधु हैं उनकी बात छोड़ दीजिए। जो असली साधु हैं उनके पास भी बड़े-बड़े मठ हैं। लेकिन अगर नकद देखने जाओ तो हो सकता है 500 रुपये भी पास में न हो। यही उनकी दशा है। क्योंकि आया और गया। धन का संग्रह करेंगे तो फिर समस्या आएगी। कहते हैं –

जब तक साधु निर्धन तबहीं तक सधुआई।

रुपया पैसा पाई के उहौ जात बौराई।।

जब रुपया आता है तो अन्दर से बड़ी ताकत बढ़ जाती है। घमण्ड आ जाता है। दबाने की शक्ति आ जाती है। जाने क्या-क्या आता है। इसलिए हर समय गंगा बने रहो। अन्दर से हर दृष्टि से और सत्कर्म की दृष्टि से समृद्ध बने रहो तो देखो आनन्द आएगा। हम लोग उस रास्ते पर चलते हैं। कर्म के सिद्धान्त को ठीक से समझिए क्योंकि चित्रगुप्त का मन्दिर बन रहा है तो कर्म का सिद्धान्त तो स्वाभाविक है समझना पडेगा। इसको ठीक से समझ करके ठीक से समझाइए लोगों को। ताकि किसी के मन में कोई भी जुगुप्सा न आए। कर्म तो करना ही है।

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