हरिद्वार कुंभ से पहले बड़ा सवाल : क्या गंगा, यमुना और गोमती अब भी जीवित नदियाँ हैं?

( राम दत्त त्रिपाठी ) 

रामदत्त त्रिपाठी,पूर्व संवाददाता बीबीसी
राम दत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

गंगा नदी कई स्थानों पर पहले से ऑंशिक रूप से साफ़ दिखाई देती है। पक्के घाट चमक रहे हैं। बड़ी संख्या में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने हैं। नदी पुनर्जीवन पर बड़े अभियान चल रहे हैं। इन सबसे ऊपर से देखने पर लगता है कि हालात सुधर रहे हैं।

लेकिन एक असहज सवाल अब भी सामने है—

क्या हमारी नदियाँ अब भी जीवंत हैं या खुद से जीवन पैदा कर पा रही हैं?

तीन दशक पहले और आज का बदला हुआ सवाल

लगभग तीन दशक पहले, जब मैंने उत्तर भारत की प्रमुख नदियों पर ज़मीनी अध्ययन किया था, तब मुख्य चिंता प्रदूषण की थी। सवाल था—पानी कितना गंदा है?

आज सवाल और गहरा है—

नदी कितनी जीवित है?

नदी केवल पानी नहीं, एक जीवित व्यवस्था है

नदी केवल बहता पानी नहीं है। वह एक जीवित प्राकृतिक व्यवस्था है—जिसमें पानी, मिट्टी, मछलियाँ, डॉल्फ़िन, कछुए, किनारे की ज़मीन , घास, जंगल और बाढ़ क्षेत्र जुड़े होते हैं। यदि इनमें से एक हिस्सा कमजोर पड़ता है, तो पूरा तंत्र प्रभावित होता है।

कृपया इसे भी पढ़ें :

वाराणसी के नंदी वैज्ञानिक प्रो यू के चौधरी Prof U K Chaudhari Varanasi तो गंगा और उस जैसी नदियों की संरचना को मानव शरीर के समान मानते हैं. 

प्रदूषण: समस्या अब भी समाप्त नहीं हुई

यह स्पष्ट कहना जरूरी है कि गंगा, यमुना, गोमती, हिंडन और काली जैसी नदियों में अब भी बड़ी मात्रा में शहरी मलजल और औद्योगिक कचरा पहुँचता है।

• कई शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, लेकिन वे पूरी क्षमता से नहीं चलते

• कई जगह untreated या आंशिक रूप से साफ़ सीवरेज सीधे नदी में गिरता है

• कानपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के औद्योगिक इलाकों में प्रदूषण का दबाव समाप्त नहीं हुआ।

Ganga at Kanpur barrage
Ganga river at Kanpur barrage

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हिंडन और काली जैसी नदियाँ गंभीर दबाव में हैं।

यमुना के कुछ हिस्सों में गर्मियों में पानी इतना कम हो जाता है कि प्रदूषण का असर अधिक तीखा दिखता है।

गोमती में लखनऊ में शहरी दबाव स्पष्ट है।

सुधार हुए हैं—लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई।बल्कि यमुना , हिंडन, काली और गोमती में तो और गंभीर हुई है . 

नदी की सेहत कैसे मापें?

नदी स्वस्थ तब मानी जाती है जब:

• उसका स्वाभाविक बहाव बना रहे

• बरसात में जलस्तर प्राकृतिक रूप से बढ़े और घटे

• ऑक्सीजन पर्याप्त हो

• मछलियाँ प्राकृतिक रूप से प्रजनन कर सकें

• बाढ़ क्षेत्र सुरक्षित रहे

यदि बहाव कम और प्रदूषण अधिक हो, तो जीवंतता कमजोर पड़ती है।

बहाव और जीवन का गहरा संबंध

मछली को जल की रानी कहा गया है . मछलियाँ मानसून के बढ़ते पानी को संकेत मानकर अंडे देती हैं।

यदि बांध और बैराज बहाव को कृत्रिम रूप से नियंत्रित कर दें, तो यह संकेत कमजोर पड़ सकता है।

कम बहाव और प्रदूषण मतलब कम ऑक्सीजन अर्थात् कम प्रजनन और घटती जैव विविधता।

मछली: नदी की सेहत का सबसे स्पष्ट संकेत

मछली केवल आर्थिक संसाधन नहीं है।

वह नदी की सेहत का संकेतक है।

यदि:

• प्राकृतिक मछली बीज घट रहा हो

• स्थानीय प्रजातियाँ कम हो रही हों

• नदी को हैचरी पर निर्भर होना पड़ रहा हो

तो यह नदी की प्राकृतिक क्षमता में गिरावट का संकेत है।

साफ़ दिखती और जीवित नदी में फर्क

ऊपर से साफ़ दिखना पर्याप्त नहीं है।यदि पर्याप्त बहाव न हो और प्रदूषण जारी रहे, तो नदी पूरी तरह स्वस्थ नहीं कही जा सकती।

साफ पानी जरूरी है।

लेकिन पर्याप्त पानी और जीवंत जैव विविधता भी उतनी ही जरूरी है।

कुंभ: आस्था के साथ आत्ममंथन का अवसर

अगले वर्ष हरिद्वार में कुंभ होगा। करोड़ों लोग और साधू संत गंगा के तट फिर से पर एकत्र होंगे।

यह आस्था का पर्व है।

लेकिन यह प्रश्न पूछने का अवसर भी है—

क्या हम नदी को केवल पवित्र मानकर पूजा कर रहे हैं?

या उसे जीवित भी रखना चाहते हैं?

आस्था और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

यदि गंगा, यमुना और अन्य नदियों को स्वस्थ बनाना है, तो:

• जगह – जगह बने बाँधों और बैराज को रिडिजाइन कर न्यूनतम प्राकृतिक बहाव और अविरल बहाव सुनिश्चित करना होगा

• शहरी मल- जल और औद्योगिक प्रदूषण पर कठोर निगरानी करनी होगी,

• मछली और अन्य जलीय जीवों के प्रजनन क्षेत्रों की रक्षा करनी होगी,

• नदियों के बाढ़ या डूब क्षेत्र को शहरी कॉलोनियों के अतिक्रमण से बचाना होगा,

• मछली विविधता को नियमित संकेतक बनाना होगा,

नदी को परियोजना नहीं, जीवित व्यवस्था मानना होगा।

अंतिम प्रश्न

तीन दशक पहले जब गंगा एक्शन प्लान GAP शुरू हुआ था मुख्य चिंता प्रदूषण थी।

आज चिंता नदी की जीवंतता की है।

यदि नदी खुद से जीवन पैदा करने की क्षमता खो दे, तो वह केवल जलधारा रह जाती है।

गंगा, यमुना और गोमती की असली पवित्रता केवल साफ़ पानी में ही नहीं,

बल्कि उनकी जीवित रहने की क्षमता में है।

(लेखक पर्यावरण और नदी विषयों पर लंबे समय से अध्ययन और लेखन करते रहे हैं।1988–89 में Centre for Science and Environment Delhi की फैलोशिप के आधार पर उत्तर भारत की नदियों पर उनका ज़मीनी अध्ययन दैनिक अमृतप्रभात में प्रकाशित हुआ था।)

Related Articles

Back to top button