गांधी ने चंपारन से देश में आज़ादी की अलख जगा दी

प्रमोद शर्मा

19 अप्रैल 1917 को गांधी जी का चम्पारण जाना स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। उनका चम्पारण का कार्यक्रम तो वहां के किसानों के ऊपर होने वाले जुल्म के खिलाफ था , पर किसानों के जबदजस्त उत्साह ने पूरे कार्यक्रम को नया मोड़ दे दिया।फिरंगी सरकार पूरी तरह हिल गई और फिरंगी मजिस्ट्रेट ने गांधी को गिरफ्तार करने का हुक्म सुना दिया।

        साथ ही गांधी जी को ये रियायत दी कि वो जमानत दे के रिहा हो सकते हैं।गांधी जी ने जमानत देने से साफ मना कर दिया।अंत में अंग्रेज मजिस्ट्रेट को हार कर बिना जमानत के ही गांधी जी को रिहा करने पड़ा।इस घटना ने न सिर्फ किसानों के ऊपर बंदिशें हटाने का काम किया बल्कि स्वतन्त्रता संग्राम में जबरदस्त तेज़ी आ गई।इसके बाद ही गांधी जी के नेतृत्व  में कांग्रेस पार्टी का सत्याग्रह शुरू हुआ जो सन 1947 में भारत की स्वतंत्रता तक चला।

इस आंदोलन ने अंग्रेजों द्वारा नील की जबददस्ती खेती करवाने वाले किसानों को भय से निकाल कर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करना सिखाया।पहली बार चम्पारण के किसानों के साथ साथ उत्तरी भारत के किसानों ने लगान के खिलाफ भी आवाज उठाई।इन किसानों में व्याप्त गुस्सा आगे चल कर पूरे देश में सत्याग्रह का रूप ले लिया। आज की परिस्थितियों में जब समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने आप को वंचित और अलग- थलग मानता है, ज़रूरत है फिर से उस भावना की जिसमें सभी वर्गों को उसका हक मिले जिससे गांधी के स्वप्न को यथार्थ में लाया जा सके।

 चम्पारण के इस किसान आंदोलन और गांधी जैसे जन नायक को हम शत- शत नमन करते हैं।

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