‘कोरोना काल कथा – स्वर्ग में सेमीनार’ उपन्यास में महात्मा गांधी

डॉ.आर.अचल

डा आर अचल
डा आर अचल

महाव्यापद कोरोना के संक्रमण से भूलोक की रक्षा के लिए स्वर्ग में आयोजित सेमीनार का संचालन करते हुए महर्षि पुलस्त्य की गंभीर ध्वनि पटल से गूँजी.किसी परिस्थिति से निकलने के लिए सर्वप्रथम विचार का अंकुरण आवश्यक होता है, जो परिस्थिति के प्रति विद्रोह जैसे लगते हैं, जबकि वह सजग होने का लक्षण मात्र है. भारत विविध विचारों के अंकुरण की भाव भूमि रही है, जिसमें समन्वय स्थापित कर विश्व को एक अभिनव संघर्ष सूत्र प्रदान करने वाले राजपुरुष मोहनदास करमचन्द गाँधी को आमंत्रित करता हूँ. जिनका भूलोक प्रवास काल 1869 से 1948 ई.तक रहा है. विचार और कर्म के अभेद भाव के कारण इन्हें महात्मा गाँधी भी कहा जाता है.

महर्षि के आवाहन के पश्चात एक दण्डधारी संन्यासी सदृश्य राजपुरुष को पटल पर पहुँचते देखकर मंडप में कुछ विस्मय के भाव तैरने लगे.

-आप सभी से क्षमा चाहता हूँ, मैं कोई संन्यासी या महात्मा नहीं हूँ, मैं मूलतः भारतीय राजपुरुष हूँ. जब विश्व में मानव प्रतिष्ठा व अधिनायकों के मध्य संघर्ष चल रहा था, उस समय भारत दुर्भिक्ष व दासता का प्रारब्ध भोग रहा था. शिक्षा प्राप्त कर जीविका के लिए दक्षिण अफ्रिका पहुँचने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ. जॉर्ज वाशिंगटन की तरह न मेरे पास सेना थी, न लेनिन की तरह जनसमूह, इसलिए मैंने शान्तिमय विरोध का आत्मपीड़क मार्ग चुना.

भारत आकर मैंने पाया कि दुर्धर्ष परिस्थितियों से निकलने के लिए विरोध की चिन्गारियां तो थी परन्तु बहुतस्तरीय, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक, भौगोलिक संरचना के कारण ज्वाला नहीं बन पा रही थी. विविधता पूर्ण समाज के बीच समन्वय स्थापित करना, कठिन कार्य था.

हजारों वर्ष की उपेक्षा के कारण आमजन और सत्ता के बीच बहुत दूरी बन चुकी थी. नागरिक अधिकार क्या? जनता मनुष्य होने का बोध भी भूल चुकी थी. अपने श्रम से उपार्जित धन का कुछ अंश दान-अनुदान के रूप में पाकर प्रारब्ध मानते हुए मनोमुर्छित हो चुकी थी, जिसके जागरण के लिए मुझे संन्यासी वेश धारण करना पड़ा.

महर्षि गण क्षमा करेगे! आप लोगों ने ऐसी परम्परा ही स्थापित कर दी है कि भारत का आम जनमानस संन्यासी वेश से सहज ही जुड़ जाता है, हालांकि इस वेश में बार-बार छला भी गया है. विविध स्तरीय बंधन तोड़ कर समन्वय स्थापना के लिए राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर आदि को भी संन्यासी वेश धारण करना पड़ा था.

आज हमारी वर्तमान पीढ़ियों को मेरा जागरण एक बड़ा झूठ लगता है इसलिए वे बार-बार मेरी हत्या का अभिनय करते हैं. मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि हमारी भविष्य की पीढ़ियाँ इतनी मूढ़ भी हो सकती हैं. जो अपने पड़ोसी का नाम भी नहीं जानती हैं, वह देश की बात करती है. गाँव के लोग, जिन्हें गंवार लगते हैं, वे देश की बात करते हैं. देश उन्हें एक नक्शा दिखता है, जबकि मैंने अपने पाँवों से नाप कर देश को देखा-समझा है.

भारत माता जमीन के टुकड़े का नहीं, कोटि-कोटि जनमानस का नाम है, जिसके विशाल जागरण से ही सशक्त ब्रिटिश सम्राज्य से मुक्त स्वतंत्र भारत का निर्माण संभव हो सका.

समग्र जनभारत का जागरण नहीं हुआ होता, तो स्वतंत्रता के बाद भी खण्ड-खण्ड भारत होता, जिसकी सत्ता कुछ राजकुलों के पास होती. जनता पुनः सत्ता से दूर अकिंचन स्थिति में होती.

फिर भी मेरा स्वप्न पूर्ण होने से पहले रूग्ण हो गया. अपनी सफलता मैं उसी समय हार गया. सत्ता में नगरीय लोगों का वर्चस्व हो गया. जागृत जनमानस की स्थानिक स्वतंत्रता पुनः नायकवाद में फँस गयी है. अधिकार के बजाय कृपा-दान के लोभाश्रित हो गयी, जिसका कुफल आज तक भोग रही है.

यहाँ मैं भी निर्दोष नहीं हूँ, क्योंकि विशाल भारत में पहुँचने के लिए मुझे भी उन्हीं राजाओं, व्यापारियों का सहयोग लेना पड़ा था, जिन्होंने जनता को अधिकार बोध से दूर किया था. इस दुरभिसंधि में आज भी भारत की जनता पीस रही है.

गाँव उजड़ते गये, नगर विकास की सीढ़ियाँ चढ़ते गये. भारत की शक्ति जो गाँवों में थी, शहरों के अधीन होती चली गयी. आयातित नीतियों से भारत निर्माण करते रहे और भारत मरता रहा, यह क्रम आज तक निरंतर तीव्रता क्रम में बढ़ता जा रहा है. इन्हीं विडम्बनाओं के कारण कोरोनाकाल में भारत व्याधि से अधिक व्यवस्था के पीड़ित है.

मनुष्यता-नागरिकता की बोधहीनता के कारण जनसंवाद, नायक, कृपा, दान, अनुदान, अंश मात्र से संतुष्ट जनता भला कैसे सजग हो सकती है. इन्हीं परिस्थितियों ने भारत को लोकतंत्र के निचले पायदान पर खड़ा कर दिया है. मेरे स्वप्न का जनतंत्र आज फिर जनता से दूर भयभीत किनारे खड़ा है. जनश्रम का फल मात्र कुछ राजकुलों और वणिकों के पास है, जो तंत्र के ऐश्वर्य के स्वामी बने हुए हैं, जो सहस्रांश दान-अनुदान कर, गर्वित हो रहे हैं. विशाल भारत की जनता उसी तरह भय और भटकाव से ग्रस्त है, जैसे ब्रिटिश काल में थी.
भारत के पितृपुरुषों से मेरा एक सवाल है, क्या आपका धर्म यही है, जो आज भारत मे दिख रहा है?

सत्राध्यक्ष महर्षि गौतम! आप ही बता दें- घृणा, संदेह से युक्त होना धर्म है या मुक्त होना? जनपद की शक्ति भारत है या सत्ता की शक्ति भारत है? वृक्ष शिखर की ओर बढ़ना विकास है या शिखर से पत्तियों का झड़ना विकास है? इन यक्ष प्रश्नों के साथ मैं भारत के पितृपुरुषों सहित विश्व के समस्त आचार्यों, राजपुरुषों को नमन करता हूँ, क्योंकि भारत के निर्माण में आपका योगदान भी कम नहीं है.

गाँधी संवाद के पश्चात मंडप गंभीरता में इस तरह डूब गया जैसे तृणकम्प से भी कर्णभेद ध्वनि का आभास हो.

https://mediaswaraj.com/who-is-mahatma-gandhi-of-the-peasant-movement-shravan-garg/

महर्षि पुलस्त्य की भूलोकदृष्टि

गाँधी के प्रश्नों के यथार्थ पर चिंतन करते हुए महर्षि पुलस्त्य भूलोक पर देख रहे थे. भूलोक काल गणना में मासान्त का दिन 30 मई 2020 ई. है. जनस्तम्भन के समानान्तर कोरोना विस्तार कर रहा है. उबते लोग निर्भयता से नगरों में निकल रहे हैं। अमेरिकी सम्राट ने विश्व स्वाथ्य संगठन से संबंध विच्छेद की घोषणा की है. पुलिस द्वारा एक अश्वेत नागरिक के मारे जाने पर पूरे अमेरिका की जनता स्तम्भन भंग कर विरोध कर रही है.

इधर भारत में बिहार के गोपालगंज जनपद में तीन हत्याओं के विरुद्ध जनविरोध को पुलिस ने कोरोना के बहाने रोक दिया है. महाकांतार (छत्तीसगढ़) के राजपुरुष अजित जोगी देहमुक्त होकर स्वर्गारोहण कर रहे हैं. एक आदिम कुलोत्पन्ना आचार्या सोनझारिया भारत के इतिहास में प्रथम बार झारखण्ड विश्वविद्यालय की कुलपति नियुक्त हुई हैं.

इन्द्रप्रस्थ की भूमि कम्पित हुई है, कोटिजन जल त्रास से पीड़ित है. विकास दर अधोगति को प्राप्त हो रही है. कोरोना की गति के साथ ही आमजन में दुर्भिक्ष, दारिद्र्य बढ़ रहा है. सत्ता प्रतिष्ठान देश को विकास के स्वर्ग तक ले जाने की सफलता का उत्सव मना रहा है. बाँदा के कोरोना ग्रस्त एकांतवासी ने अवसाद ग्रसित होकर आत्महत्या कर ली है.

हाँगकांग के स्वतंत्रता संघर्ष पर दुनिया, चीन के विरोध व समर्थन में विभाजित हो चुकी है. जॉर्ज वाशिंगटन, लेनिन, गाँधी के मानव सम्मान व अधिकार के विचार सूत्र आइसोलेशन में हैं. गाँधी के प्रश्नों और भूलोक के दृश्यों से महर्षि पुलस्त्य खिन्न मन लेकर पुनः पटल की ओर बढ़ने लगे.

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