कोयले की कमी से देश में गहराता जा रहा है बिजली संकट, अंधेरे में डूब सकता है भारत

बिजली संकट के कगार पर भारत

बिजली का उत्पादन करने वाली आधे से अधिक प्लांट्स अलर्ट पर रखे गए हैं. बिजली मंत्री आर के सिंह ने कहा है कि उन्हें पता नहीं है कि अगले पांच-छह महीने उन्हें चैन मिलेगा कि नहीं क्योंकि कोयला संकट अभूतपूर्व है. आरके सिंह ने कहा कि पिछले एक सप्ताह से हालात बेहद खराब हैं. देश में 40 से 50 गीगावाट बिजली का उत्पादन करने वाले थर्मल पावर प्लांट्स में सिर्फ तीन दिन के कोयले का स्टॉक बचा हुआ है.

कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ तेज़ी जरूर आई है लेकिन कोयला भंडार में आई गंभीर कमी के बाद आने वाले समय में देश में अप्रत्याशित बिजली संकट पैदा होने की संभावना दिख रही है.

भारत में 70 फ़ीसदी से अधिक बिजली कोयले से पैदा होती है. यहां 135 कोयले पर आधारित बिजली संयंत्र हैं, जिनमें से आधे से अधिक फिलहाल धुएं पर चल रहे हैं. देश में अचानक बिजली की मांग बढ़ने से जानकारों को यह चिंता सताने लगी है कि कोरोना महामारी के बाद पटरी पर लौटने की कोशिश कर रही देश की अर्थव्यवस्था कहीं फिर से पटरी से उतर न जाए.

सिर्फ चार दिनों के कोयले का स्टॉक

इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, देश में सिर्फ चार दिनों के कोयले का स्टॉक बचा हुआ है. पिछले कुछ वक्त से कोयले की किल्लत ने सरकार को परेशान कर रखा है. कोयले की कमी की वजह से बिजली सेक्टर पर बड़ी आफत आ सकती है और देश को भारी ऊर्जा संकट से जूझना पड़ सकता है.

बिजली मंत्री आर के सिंह ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि इस महीने के आखिर में देश के पावर स्टेशनों में सिर्फ चार दिन का स्टॉक बचा था. हाल के कुछ वर्षों में ऐसा कोयला संकट नहीं देखा गया था. अगस्त में देश के पावर स्टेशनों में औसतन 13 दिनों के कोयला का स्टॉक था. देश को इस संकट की स्थिति से सामान्य हालत में आने में छह महीने से भी अधिक का वक्त लग सकता है.

कोयला आयात करने में दुनिया में दूसरे नंबर पर भारत

साल 2019 के मुकाबले बीते दो महीनों में ही बिजली की ख़पत 17 प्रतिशत तक बढ़ गई है और यह संकट कई महीनों से पैदा हो रही है. भारत में यूं तो दुनिया में कोयले का चौथा सबसे बड़ा भंडार है, लेकिन ख़पत की वजह से भारत कोयला आयात करने में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. बिजली संयंत्र जो आमतौर पर आयात किए गए कोयले से चलते थे, अब देश में उत्पादित हो रहे कोयले पर निर्भर हो गए हैं.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे वजह यह है कि दुनियाभर में कोयले के दाम 40 फ़ीसदी तक बढ़े हैं जबकि भारत का कोयला आयात दो साल में सबसे निचले स्तर पर है. पहले से ही कमी से जूझ रही कोयला सप्लाई इससे और भी दबाव में आ गई है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक कोयला आयात करके ज़रूरतों को पूरा करना इस समय भारत के लिए अच्छा विकल्प नहीं होगा. नोमुरा के वाइस प्रेसिडेंट और भारतीय अर्थशास्त्री ओरोदीप नंदी कहते हैं, “हमने पहले भी
कोयले की कमी देखी है लेकिन इस बार कोयला वाकई बहुत ज़्यादा महंगा है.”

देश में जरूरत की हर चीज है महंगी

अगर यह संकट ऐसे ही चलता रहा तो ग्राहकों पर बिजली क़ीमतों के बढ़ने की मार पड़ सकती है. इस समय भारत में ख़ुदरा महंगाई पहले से ही बहुत है क्योंकि तेल से लेकर ज़रूरत की हर चीज़ महंगी हो चुकी है.

इंडिया रेटिंग्स रिसर्च के डायरेक्टर विवेक जैन कहते हैं कि परिस्थिति बहुत ही अनिश्चित है. भारत ने हाल के सालों में पर्यावरण के लिए अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने के लिए कोयले पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है, जिसकी वजह से भारत में कोयला उत्पादन भी कम हुआ है.

बिजली से ही हर चीज़ चलती है, ऐसे में पूरा उत्पादन सेक्टर- सीमेंट, स्टील, कंस्ट्रक्शन, सब कोयले की कमी से प्रभावित होते हैं

भारत के ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि मौजूदा परिस्थिति जोख़िम भरी है और भारत को अगले पांच छह महीनों के लिए तैयार रहना चाहिए. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा कि परिस्थितियां चिंताजनक हैं.

भारत में 80 फ़ीसदी कोयला उत्पादित करने वाले सरकारी उपक्रम कोल इंडिया लिमिटेड की पूर्व प्रमुख ज़ोहरा चटर्जी चेताती हैं कि यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही तो एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने के लिए संघर्ष करेगी.

मौजूदा परिस्थिति भारत के लिए चेतावनी

ज़ोहरा कहती हैं, “बिजली से ही हर चीज़ चलती है, ऐसे में पूरा उत्पादन सेक्टर- सीमेंट, स्टील, कंस्ट्रक्शन, सब कोयले की कमी से प्रभावित होते हैं.” वो मौजूदा परिस्थिति को भारत के लिए एक चेतावनी की तरह बताती हैं और कहती हैं कि अब समय आ गया है जब भारत कोयले पर अपनी निर्भरता कम करे और अक्षय ऊर्जा रणनीति पर आक्रामकता से आगे बढ़े.

हाल के सालों में ये सवाल भारत की सरकारों के लिए चुनौती बना रहा है कि भारत अपनी क़रीब 140 करोड़ की आबादी की ज़रूरतों को कैसे पूरा करे और भारी प्रदूषण करने वाले कोयले पर निर्भरता कैसे कम करे? डॉक्टर नंदी कहते हैं कि ये समस्या इतनी बड़ी है कि इसका कोई अल्पकालिक हल नहीं निकाला जा सकता है.

भारत के लिए एक चेतावनी

नंदी कहते हैं, “सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसका दायरा बहुत बड़ा है. हमारी बिजली का एक बड़ा हिस्सा थर्मल पावर (कोयले) से आता है. मुझे नहीं लगता कि अभी हम ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि थर्मल पावर का कोई प्रभावी विकल्प ढूंढ सकें. मैं ये मानता हूं कि ये भारत के लिए एक चेतावनी है और भारत को संभलना चाहिए. लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमारी ऊर्जा ज़रूरतों में कोयले पर निर्भरता को जल्द समाप्त किया जा सकेगा.”

वहीं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ज़ोहरा चटर्जी मानती हैं कि कई ऊर्जा स्रोतों में दीर्घकालिक निवेश करने और सही योजना बनाने से मौजूदा संकट जैसी स्थिति से बचा जा सकता है.

वो मानती हैं कि देश के सबसे बड़े कोयला आपूर्तिकर्ता कोल इंडिया और दूसरे हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय बनाए जाने की ज़रूरत है. अंतिम स्तर तक आसानी से डिलीवरी और बिजली कंपनियों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए.

चटर्जी कहती हैं, “बिजली उत्पादकों को कोयले के भंडार भी रखने चाहिए, उनके पास एक निश्चित सीमा का भंडारण हर समय होना चाहिए. लेकिन हमने देखा है कि ऐसा हो नहीं सका है क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में कोयले की व्यवस्था करने की वित्तीय चुनौतियां होती हैं.”

आपूर्ति और ख़पत के बीच अंतर

फ़िलहाल भारत सरकार ने कहा है कि वह कोल इंडिया के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाने और अधिक खनन करने पर काम कर रही है ताकि आपूर्ति और ख़पत के बीच अंतर को कम किया जा सके.

सरकार को बंधक खदानों से कोयला हासिल करने की भी उम्मीद है. ये वो खदानें हैं जो कंपनियों के नियंत्रण में होती हैं और इनसे उत्पादित कोयले का इस्तेमाल सिर्फ़ वो कंपनियां ही करती हैं. सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों के तहत इन खदानों को कोयला बेचने की अनुमति नहीं होती है.

विशेषज्ञ ये मानते हैं कि भारत अल्पकालिक उपायों से किसी तरह मौजूदा संकट से तो निकल सकता है, लेकिन देश की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारत को दीर्घकालिक विकल्पों में निवेश करने की दिशा में काम करना होगा.

दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में हाल के दशकों की सबसे बड़ी गिरावट आई है और भारत भी अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में भारत नहीं चाहेगा कि उसके रास्ते में रुकावटें आएं.

कोयला संकट सार्वजनिक क्षेत्र को तबाह करने का परिणाम -वर्कर्स फ्रंट


विद्युत उत्पादन गृहों में हो रही कोयले की कमी व संकट सरकार के ऊर्जा के प्रमुख स्रोत कोयला को निजी हाथों में देने और सार्वजनिक क्षेत्र को तबाह करने की नीति का परिणाम है। आज कोयले की इस कमी से प्रदेश में बिजली का संकट खड़ा हो रहा है और आम आदमी को बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है। इसके खिलाफ आम जनता में वर्कर्स फ्रंट जन जागरण अभियान चलाकर सरकार की निजीकरण की नीतियों के बारे में बतायेगा। यह बातें वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने प्रेस को जारी अपने बयान में दी। 


 उन्होंने कहा कि सरकार ने खनिज कानून (संशोधन) अधिनियम 2020 द्वारा कोयला खनन क्षेत्र में कोल इंडिया लिमिटेड़ का एकाधिकार खत्म कर सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देकर कारपोरेट कम्पनियों को खुले बाजार में कोयले की खरीद फरोख्त की छूट दे दी है। इन देशी-विदेशी कम्पनियों को कोयले के निर्यात की भी छूट दे दी है। देश में ऊर्जा के प्रमुख स्रोत कोयले की इस लूट ने आज आपूर्ति के संकट को जन्म दिया है। इससे कोयले की कमी से प्रदेश में बिजली का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हरदुआगंज, पारीछा, ललितपुर, मेजा व रोजा की कई उत्पादन ईकाइयां बंद पड़ी है और अनपरा व ओबरा में भी उत्पादन प्रभावित हुआ है। प्रदेश के ताप बिजलीघरों का उत्पादन 3000 मेगावाट रह गया है जबकि मांग 17000 मेगावाट है। परिणामतः बिजली की कटौती करनी पड़ रही है। दरअसल सरकार देशी विदेशी कारपारेट घरानों के हितों के लिए देश के सार्वजनिक क्षेत्र को तबाह करने पर आमादा है जिसके खिलाफ जन जागरण अभियान चलाया जायेगा। 

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