डॉ. लोहिया : समाजवादी आंदोलन की मौलिकता के प्रतीक पुरुष

डॉ. चन्द्रविजय चतुर्वेदी

12 अक्टूबर को समाजवादी आंदोलन के प्रतीक पुरुष डॉ. लोहिया की पुण्यतिथि होती है।

अपने को कुजात गांधीवादी कहने वाले डॉ. लोहिया  पांचवे-छठे दशक के युवजनों को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले राजनेताओं में से थे।

उनके सप्तक्रांति के बिंदु थे —

1 -भाषा की स्वतंत्रता, 2 -रंगभेद की समाप्ति, 3 -जाति प्रथा का ध्वंस, 4 -नर -नारी समता, 5 -आर्थिक समानता, 6 -हथियारी ताकतों के मुकाबले सिविल नाफरमानी, 7 -विकेन्द्रीकरण और विश्व सरकार का गठन।

दुनिया के उपेक्षितों, दलितों, शोषितों तथा वंचितों में आत्मविश्वास, जोश और तेज पैदा करने वाले महानायक का स्वप्न था पीड़ित मानवता की पीड़ा दूर करना।

राजनीति में तर्कसंगत क्रन्तिकारी विचारधारा का पोषण करने वाले डॉ. लोहिया  ने  इतिहास, संस्कृति, कला, पुरातत्व तथा धर्म के क्षेत्र में एक नवीन क्रन्तिकारी दृष्टि विकसित की।

आजाद चिंतन के लिए बुद्धिजीवियों का आवाहन किया। यदि राजनीति के क्षेत्र में न आकर डॉ. लोहिया साहित्य, कला और इतिहास के क्षेत्र में होते तो निश्चय ही विश्व को एक नई दृष्टि दिए होते।

डॉ. लोहिया की इतिहास दृष्टि राजाओं, महाराजाओं के उत्थान को गौण मानती है। वे समाज और मनुष्य के उत्कर्ष के इतिहास को वास्तविक इतिहास मानते थे।

मनुष्य और उसकी अस्मिता तथा उसके स्वाभिमान के रक्षक के रूप में वे लोकतंत्र को परिभाषित करते थे। लोहिया का ईश्वर था मनुष्य और उनका धर्म था मानवता। डॉ. लोहिया का समाजवाद सम्पूर्ण बराबरी के पहले संभव बराबरी पर पड़ाव डालता है।

नवचेतना के अग्रदूत राजनेता को कोटि कोटि नमन।

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