क्या हमें अपनी प्रतिष्ठा के बारे में चिंतित होना चाहिए?

‘जीवन की उलझनें एवं श्रीमद् भगवद् गीता द्वारा उनके समाधान’ का एक अध्याय)

निहार सतपथी

 

निहार शतपथी, स्वतंत्र लेखक, भुवनेश्वर से

Nihar Satpathy

अपने आस- पास, कॉलेज में, या काम की जगह पर हमें कोई न कोई ऐसा दोस्त, सहपाठी, या सहकर्मी मिल ही जाता है, जो हमेशा अपनी प्रतिष्ठा को लेकर इतना परेशान और चिंतित रहता है, जैसे कि उसका जीवन इसी पर निर्भर करता है। वह सावधानीपूर्वक अपनी छवि बनाने के लिए कोशिश करता है, जैसे – कैसे बोलना है, क्या पहनना है, क्या तर्क देने हैं, यहाँ तक कि अपने जीवन के बारे में निर्णय भी वह स्वयं लेता है। ऐसे लोगों की पहली और सबसे बड़ी चिंता अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। आपने यह भी देखा होगा कि ये लोग सार्वजनिक रूप से अपनी छवि को नुकसान पहुँचाने वाली छोटी से छोटी घटना पर भी कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। ये अपनी प्रतिष्ठा पर छोटी सी खरोंच भी सहन नहीं कर पाते और दुखी हो जाते हैं। ऐसी सोच बहुत विवेक शून्य लगती है।

आइए इस प्रश्न पर विचार करें:

क्या प्रतिष्ठा नाम की चीज हमारे जीवन के लिए इतनी कीमती है? क्या हमें अपनी प्रतिष्ठा के लिए चिंतित और सुरक्षात्मक रहना चाहिए?
माना यह जाता है कि अपनी प्रतिष्ठा के प्रति लगाव होना हमारे व्यक्तित्व की कमजोरी है, एक नकारात्मक लक्षण है। यदि कोई अपनी प्रतिष्ठा बनाने के लिए कुछ करने लगता है, तो यही उसके जीवन का उद्देश्य बन जाता है। लोग इसे अच्छा नहीं समझते। प्रतिष्ठा को अगर महत्वाकांक्षा के रूप में चुना जाता है, तो उसे हीन माना जाता है।
“अपने चरित्र पर ध्यान दें, न कि अपनी प्रतिष्ठा पर,” ऐसा हमारे समय के प्रेरणादायक विचारकों में से एक रॉय टी. बेनेट पीटर कहते हैं। यह बात बुद्धिमत्तापूर्ण है, क्योंकि किसी व्यक्ति के जीवन का महत्त्व उसके चरित्र और प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है, न कि उसकी प्रतिष्ठा पर। बहुत बार ऐसा होता है कि हमें उस काम के लिए मान नहीं मिल पाता, जिसके हम अधिकारी होते हैं, कभी-कभी, हम यह पाते हैं कि हमें तब श्रेय मिल जाता है, जब हम उसके योग्य नहीं होते और हम सोच में पड़ जाते हैं कि क्या हमने इसके लायक कुछ किया था। अतः प्रतिष्ठा की चिंता करने का कोई मतलब नहीं है।

प्रतिष्ठा का मुखौटा

कुछ लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रतिष्ठा बिना आधार के, ज़बरदस्ती बनाई हुई हो सकती है। उनकी प्रतिष्ठा प्रायः अपने असली चेहरे को छुपाने के लिए उनका एक मुखौटा हो सकती है। इस तरह के मुखौटे के पीछे, एक बिलकुल उलटे स्वभाव के चरित्र को छिपाना हो सकता है। प्रतिष्ठा, अगर स्वाभाविक नहीं है, बल्कि ज़बरदस्ती बनाई हुई या नकली है, तो उसका कोई महत्त्व नहीं है। इसलिए बल सदा जीवन मूल्यों पर होना चाहिए, जो हमारी प्रतिष्ठा के आधार हैं।

खुद की प्रतिष्ठा के प्रति इतने रक्षात्मक होने का कारण अपने नाम और प्रसिद्धि से लगाव है। प्रतिष्ठा के लिए इस तरह के लगाव या लालच की प्रायः सराहना नहीं की जाती। गीता की भावना किसी भी इच्छा से जुड़ी होने के विरोध में है। इच्छा के वश में हो कर मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा कम ही करता है। यह आसक्ति ही है, जो मनुष्य के गलत व्यवहार का कारण बन जाती है।
गीता के पाँचवें अध्याय में, इस पहलू को इस प्रकार समझाया गया है: “जो अपने कर्तव्य को बिना आसक्ति के करता है और परिणामों को परम आत्मा को सौंप देता है, वह पाप से अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी से अछूता रहता है। ”
हमें इस उपमा की उपयुक्तता को समझना चाहिए। एक कमल के पत्ते पर साफ पानी की एक बूंद के बारे में सोचिए। यह मोती के मनके की तरह चमकती है और पत्ती पर इधर- उधर हिलती रहती है; लेकिन कभी भी पत्ती से चिपकती नहीं है और इससे अलग रहती है। यह अनासक्ति है। इसी तरह, सभी इच्छाओं से अछूता रहना चाहिए। आगे के अध्यायों में हम इसकी अन्य संदर्भों में चर्चा करेंगे। अभी के लिए, हम अपने अहंकार को संतुष्ट करने और अपनी प्रतिष्ठा बनाने की इच्छा से अलग रहने के महत्व को समझेंगे। हालाँकि, प्रतिष्ठा के संबंध में श्रीकृष्ण ने एक अलग रोचक दृष्टिकोण अपनाया। हम पाते हैं कि वे अर्जुन को उसकी गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए अत्यंत सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

कठिन कार्य

हम जानते हैं कि कृष्ण के लिए यह काम आसान नहीं था कि वे अर्जुन को उसके असमंजस से मुक्ति दिला सकें। आसान तरीके से कोई भी अनुरोध या सलाह देने से लाभ नहीं होने वाला था। अतः यह सुनिश्चित करने के लिए कि अर्जुन स्थितियों और उनके कारणों को सही परिप्रेक्ष्य में समझ सकें, कृष्ण को प्रमाण और उदाहरण देकर कई उलझे हुए स्पष्टीकरणों का सहारा लेना पड़ा।
अपने प्रयासों से कृष्ण अर्जुन को सच्चाई का बोध कराने का प्रयास करते हैं। इस समय तक, उन्होंने मौत के पीछे की सच्चाई के विषय पर बात कर ली है। उन्होंने अर्जुन को यह भी समझा दिया है कि हर किसी के लिए अच्छा होना एक कमजोरी है। अब वे उन्हें बोध की उच्च अवस्था तक पहुँचाने के अपने प्रयास में एक और दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे प्रतिष्ठा की बात करते हैं। क्या युद्ध अस्वीकार कर देने पर अर्जुन की प्रतिष्ठा को हानि नहीं होगी? लोग क्या सोचेंगे? उनके मन में अर्जुन की क्या छवि बनेगी?
“योद्धा सोचेंगे कि आप डर के कारण युद्ध से दूर हो गए हैं।“ कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ” आप उन लोगों की दृष्टि में तिरस्कृत हो जाएंगे, जिनके मन में आपके लिए बहुत सम्मान है।”
यह परामर्श देते हुए कृष्ण तीन पहलुओं का उल्लेख करते हैं:
योद्धा अर्जुन को बहुत सम्मान देते हैं।
वे सोचेंगे कि अर्जुन डर के कारण युद्ध से दूर हो गए हैं।
दूसरों की दृष्टि में उनकी गरिमा कम हो जाएगी।

इस अध्याय के आरंभ में, हमने प्रतिष्ठा के प्रति लगाव की सराहना नहीं की थी, बल्कि हम प्रतिष्ठा के लिए इच्छा को अस्वीकार करते हैं, यदि वे स्वार्थ लाभ के उद्देश्य से किए जाते हैं। लेकिन यहाँ, स्थिति अलग है। इस स्थिति में, गरिमा की हानि का अर्थ कुछ और है। इसका गहरा अर्थ है। अर्जुन को पहले से ही बहुत सम्मान और मान्यता प्राप्त है। वे उस प्रतिष्ठा के लिए पूरी तरह से योग्य भी हैं, क्योंकि यह उनके सीखने और करने के प्रति उनके ईमानदार समर्पण का परिणाम है, चाहे वह तीरंदाजी हो, युद्ध या उनकी किसी अन्य प्रकार की प्रतिबद्धता। वे अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने प्रतिष्ठा हासिल करने के संकीर्ण निश्चय के साथ पूर्ण समर्पण का अपना रास्ता नहीं चुना था। बल्कि उनकी प्रतिबद्धताओं के कारण प्रतिष्ठा खुद उनके पास आई। यह ऐसी प्रतिष्ठा थी, जिसके वे योग्य थे। इसे गवांना ठीक नहीं।

अमूल्य संपत्ति

सम्मान की हानि एक महान योद्धा के लिए बहुत मायने रखती है, क्योंकि यह सबसे अमूल्य संपत्ति है, जो उसके पास हो सकती है। यदि हमें इससे एक संदेश लेना है, तो वह यह है कि हमें प्रतिष्ठा का बहुमूल्य अधिकार खोना नहीं चाहिए, ख़ासकर तब, जब वह किसी लगाव या इच्छा के अधीन हुए बिना हमारी सच्ची प्रतिबद्धताओं के पुरस्कार के रूप में हमें मिलता है।
दूसरी बात, अगर हम अपना सम्मान खो देते हैं, तो क्या होता है? समाज हमें नीचे दिखाएगा। हमारे बारे में अपमानजनक बातें करेगा। हमें हमारे सम्मान से वंचित होने के सही कारण का पता लगाए बिना, लोग अपने खुद के फैसले सुनाएंगे। अर्जुन डर के कारण नहीं, बल्कि दुश्मन के शिविर में अपने संबंधियों के प्रति सहानुभूति के कारण लड़ाई में भाग लेने से मना कर रहे थे। पर लोग यह समझ नहीं पाते और टिप्पणी करते, “आह! महान योद्धा युद्ध शुरू होने से पहले ही पीछे हट गया! ”
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या हमें लोगों को हमारे द्वारा किए गए कार्यों या निर्णयों के लिए गलत ठहराने की अनुमति देनी चाहिए?
प्रतिष्ठा, अगर सही ढंग से पाई गई है, तो इसे सावधानीपूर्वक संरक्षित किया जाना चाहिए। प्रतिष्ठा का नुकसान न केवल हमें नुकसान पहुंचाता है, बल्कि हमारे आस-पास के लोगों और विशेष रूप से हमारे प्रियजनों को भी निराश करता है और कष्ट पहुंचाता है। दूसरों के लिए यह देखना पीड़ादायक है कि हम कितनी दयनीयता से प्रतिष्ठा की हानि की पीड़ा झेलते हैं।
विलियम शेक्सपीयर द्वारा रचित त्रासदी नाटक ओथेलो में एक पात्र इयागो के संवाद में हानि की भावना का बहुत अच्छा वर्णन है:
“पुरुष और महिला की प्रतिष्ठा,
हे प्रिय परमात्मा,
उनकी आत्माओं का आभूषण है:
जो मेरा पर्स चुराता है वह कचरा चोरी करता है; ‘यह कुछ खास नहीं है, कुछ नहीं;
वह मेरा था, अब उसका है, और हजारों का गुलाम रहा है;
लेकिन वह जो मुझसे मेरा मान-सम्मान छीनता है,
खुद तो उससे समृद्ध हो नहीं पाता, पर मुझे सच में गरीब बना देता है। ”
यह अवलोकन इगाओ द्वारा एक अलग संदर्भ में किया गया था, जो लोग नाटक की पटकथा पढ़ चुके हैं, वे इसे अच्छे से समझ सकते हैं, पर हम इसे अपने संदर्भ में देखेंगे, ताकि यह पता चल सके कि ‘अच्छे नाम’ की हानि, अर्थात प्रतिष्ठा की हानि किसी व्यक्ति को वास्तविक अर्थों में गरीब बना सकती है। इसलिए हम अपनी प्रतिष्ठा को किसी को भी चुराने नहीं दे सकते। यदि दुर्भाग्य से ऐसा हो जाता है, तो यह हानि सबसे बड़ी होगी।
किसी भी और चीज की तुलना में यह हमारे लिए बड़ा नुकसान क्यों होगा? श्री कृष्ण इसका जवाब देते हुए अर्जुन को समझाते हैं, “क्योंकि लोग तुम्हारे अपमान के बारे में सदा बात करेंगे, और अगर तुम अनंत काल तक अपमानित रहो, तो यह मौत से भी बुरा है।”
इसलिए हमें जीते जी स्वयं को मृतक जैसा नहीं बनने देना चाहिए। अपने जीवन में हमें बहुत कुछ करना होता है, इसलिए हमें जीवन में अपनी प्रतिष्ठा को बचाए और बनाए रखने के लिए अत्यंत सावधान रहना चाहिए।

(हाल ही में प्रकाशित लेखक की पुस्तक ‘जीवन की उलझनें एवं श्रीमद् भगवद् गीता द्वारा उनके समाधान’ का एक अध्याय।)

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