गोवर्द्धन पर्व का देवत्व

गोवर्धन पर्व
डॉ. चंद्रविजय चतुर्वेदी

गोवर्द्धन पर्व का एक महत्वपूर्ण पहलू –गोधन का देवत्व है। वैदिक काल से ही गोधन सात्विक समृद्धि का परिचायक रहा है।

गौ इस सृष्टि का अदभुत प्राणी है दैवीय शक्ति का एक स्वरूप। अमृत तुल्य गोरस –दूध ,दही ,मट्ठा ,मक्खन के साथ साथ इसका गोबर भी कितना उपयोगी है जो कीटाणुनाशक है घर की लिपाई के लिए और  कृषि के लिए खाद भी है। कृषि युग के पूर्व वैदिक ऋषि युग में गोधन के साथ विकसित संस्कृति काल में ही वेदों की रचना हुई। गोष्टी ,गोत्र जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति गौ से ही है। कृषि संस्कृति के युग में भी गोधन की प्रधानता रही –दो बैलों की जोड़ी हल जोतते थे ,गाडी खींचते थे।

मशीन आधारित कृषिकार्य ने दो बैलों की जोड़ी को अनुपयुक्त बना दिया उनकी दुर्दशा कर दी। गांव के लिए बछड़े समस्या बन गए। गोपालक यह अधिकार समझने लगे की गाय ,बछड़े ,सांड को छुट्टा छोड़ दो –हालत यह हो गई है की खेतों को सुरक्षित करने के लिए खेतों को तारों से रुँधा जा रहा है –जिसमे फंसकर गोमाता घायल भी होती हैं।

सनातन संस्कृति में गौमाता ने  मानव में मातृत्व भाव जगाकर सेवाभाव की जो सात्विक भाव जागृत की थी उसका पराभव हो गया है। खाने के पूर्व पहला कौर गाय को अर्पित किया जाता था। गोदान सबसे श्रेष्ठ दान समझा जाता रहा है। इस सम्बन्ध में मेरे जीवन के कई आश्चर्यजनक व्यक्तिगत अनुभव है। मैं व्यक्तिगत रूप से गोधन की दुर्गति से मर्माहत हो जाता हूँ। व्यापारिक संस्कृति के साथ गोधन शहर आ गई जहाँ चरम दुर्गति को प्राप्त हो रही है –नालियों का पानी पी रही हैं ,कूड़ा खा रही हैं। सडकों पर बैठी हैं अपमानित हो रही हैं।

कृष्ण ने इसी गोधन के संवर्धन ,मान-सम्मान के लिए आकाश के देवता इंद्र से संघर्ष किया और लोकमत को गोधन के अमृतत्व का बोध कराया। दुर्भाग्य है की आज की अपरिभाषित संस्कृति उस देवत्व को अपमानित कर रहा है जो इसधरती का मूलतत्व है मातृत्व। यह मातृत्व कब तक अपमानित होगी –उसके कोप का अनुमान कदाचित हम नहीं कर पा रहे हैं। क्या आज इस पर्व के देवत्वभाव को कर्मकांड से इतर समझने की आवश्यकता नहीं है।?

आज से पचास साल पूर्व के गांवों को याद करें। हर गरीब अमीर के दरवाजे पर एक गाय पलती थी कुल के माता के रूप में। सुबह ये गायें खरके के साथ चरने चली जाती थी। शामको जब लौटती थी तो उनके खुरों की धूलि से गोधूलि बेला परिभाषित होता था। आज की भूमिव्यवस्था में पशुओं के चरने की कोई व्यवस्था नहीं है। गोशालाओ पर कोई टिपण्णी न करके कहना चाहूंगा की गोसेवकों को देवरहवा बाबा के विंध्याचल में स्थित आश्रम को देखना चाहिए जहाँ गाय ,बछड़े ,सांड प्राकृतिक रूप से विचरण कर रहे हैं। चारा और जल के प्राकृतिक स्रोत हैं गोबर के सदुपयोग की व्यवस्था है। ऐसे ही गोशालों से गोधन के देवत्व की रक्षा हो सकेगी।

अथर्ववेद में –गावो भगो कहा गया है की गायें ही पुरुष का धन और सौभाग्य हैं। अथर्ववेद का एक मन्त्र है —

प्रजावतीः सुयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः

मा व् स्तेन ईषत महानशसः परि वो रुद्रस्य हेतिवृणक्तु

अर्थात ,हे गाय तुम उत्तम घास वाली भूमि में चलती हुई स्वच्छ जल पियो और उत्तम संतानवाली बनो ,चोर तुम्हे न चुरा सके ,बाघ आदि हिंसक पशु तुम्हारी हिंसा न करे ,रूद्र का आयुध तुम्हारा स्पर्श न करे –4 /21 /7

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