..तो जिलापंचायतों पर इस तरह बजेगा बीजेपी का डंका

तार- तार होता गांधी के सपनों का स्वराज

यशोदा श्रीवास्तव:

आजकल यूपी में जिलापंचायतों के अध्यक्ष का चुनाव चल रहा है। इस चुनाव में सपा और बीजेपी की ही दिलचस्पी दिख रही है। सपा सत्तापक्ष के प्रभाव वाले इस चुनाव में कितना टिक पाएगी,कहना मुश्किल है। हालाकि दोनों ही किसी जिले में अपने बूते मलाईदार इस पद पर आसीन होने की स्थित में नहीं है। जाहिर है इस दौड़ में धन बल का ही खेल है।

भाजपा की एकआध जिले में छोड़ किसी जिले में टक्कर देने की भी स्थित नहीं है, लेकिन उसने पूरे दमखम से इस पद पर कब्जा करने का जोर लगा दिया है। चूकि ऐसे चुनाव शासन सत्ता पर आधारित होते हैं जिसमें “पारदर्शिता का दावा बेमानी होता है”ऐसे में जाहिर है जिलापंचायतों और ब्लाकों पर कौन काबिज होगा?जिलापंचायतों के सदस्य पद के चुनाव में बुरी तरह हारी बीजेपी जिलापंचायतों और ब्लाकों पर कब्जा कर अपनी लोकप्रियता का दावा करेगी जो सच से बहुत दूर है।

 यूपी में मुख्यमंत्री का जिला गोरखपुर हो या प्रधानमंत्री का जिला बनारस, कहीं भी जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन इतराने जैसा नहीं रहा।बावजूद इसके इन जिलों के जिलापंचायत अध्यक्ष पद पर बीजेपी का कब्जे की पूरी तैयारी है। यही नहीं यूपी के तमाम मंत्री विधायक तक जिला पंचायत सदस्य का चुनाव अपने परिवार,समर्थक और शुभचिंतकों को नहीं जिता सके।अभी हाल ही यूपी के जिस ब्राम्हण शिरोमणि जितिन प्रसाद को बीेजेपी में जोरदार स्वागत कर शामिल किया गया है,वे महाशय स्वयं अपनी भाभी को जिलापंचायत सदस्य पद का चुनाव नहीं जितवा सके। भाजपा के कई निर्वतमान जिला पंचायत अध्यक्ष तक सदस्य पद का चुनाव हार गए। पूर्वांचल में एक तेजतर्रार विधायक ब्लाक प्रमुख बनाने के लिए अपने भाई को बीडीसी नहीं जितवा सके।कहना न होगा, पंचायत चुनाव में ये जीत वीत सब बेमानी है। क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य पद पर बीजेपी भले ही न जीत पाई हो,इनके जरिए होने जा रहे ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर जीत तो इनकी ही होगी। फिलहाल अभी तक का जो सिनेरियो है,वह यही है।

जाहिर है जिला पंचायत सदस्य हों या ब्लाक प्रमुख इसके वोटर जो सदस्य चुनकर आए हैं, उनका मोलभाव तय है और वे परंपरा के अनुसार “तीर्थाटन और देशाटन पर हैं” जिसक भारी भरकम खर्च सुनिश्चित जिला पंचायत अध्यक्ष लोग खुले हाथ कर रहे हैं। यह तब है जब चुनाव आयोग जिलापंचायतों के अध्यक्ष के चुनाव खर्च की सीमा चार लाख तय कर दी है।

याद आ रहा है 2012 के पहले का यह चुनाव! बसपा की सरकार थी। यूपी के जिला सिद्वार्थनगर में बसपा के दबंग एक नेता अपने पुत्र को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने के लिए इसी जिले की भाजपा नेत्री तथा पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के दो प्रस्तावकों को भारी सुरक्षा घेरे से उस वक्त गायब करवा दिया था जब मोहतरमा नामांकन के अंतिम दिन जिलाधिकारी कार्यालय नामांकन को जा रही थीं। बहुत हो हल्ला हुआ,कोई सुनने वाला नहीं था। वे नामांकन ही नही कर सकीं और तत्कालीन प्रशासन ने दबंग बसपा नेता के पुत्र को जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर विजयी घोषित कर दिया था। इस चुनाव में इसी जिले में सपा के एक जिला पंचायत सदस्य के गायब होने का आरोप अब भाजपा पर लग रहा है। यहां भजपा की उम्मीदवार महिला हैं जो एक ठेकेदार की पत्नी बताई जा रही हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष का ख्वाब देख रहे जिला पंचायत सदस्य पद पर विजयी दो तीन भाजपा नेता ऐसे धराशायी हुए जिसका उन्हें तनिक भी भनक नहीं था। हैरान न होइय! युपी के जिला पंचायत अघ्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा के ऐसे ढेरों उम्मीदवार है जो अचानक आ गए हैं और इनकी जीत भी पक्की है। भाजपा के मजे मजाए एक नेता की टिप्प्णी का क्या कहने! इस चुनाव में धन बल की बात चली तो उसने साफ कहा कि भाजपा भले ही किसी जिले में अपने दम पर जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने की स्थित में न हो लेकिन जीतेंगे हम ही। जिाला पंचायत छोडि़ए, हमने उन प्रदेशों में भी सरकार बनाकर दिखा दी है जहां हमारे एक भी एमएलए नहीं थे। और कम बहुमत के बावजूद कितने प्रदेशों में सरकार बनाई, उसे भी आप देख रहे हैं। उस भाजपा नेता की टिप्पणी यह बताने के लिए काफी है कि इस चुनाव में भाजपा का लक्ष्य आखिर क्या है?ब्लाक प्रमुख हो या जिलापंचायत अध्याक्ष, यह पद अब सेवा भाव का नहीं रहा। करोड़ों अरबों के बजट वाले इस पद पर चुनाव लड़ने वाला शख्स यहां भारी भरकम धनराशि का निवेश करता है और पूरे पांच साल उसे मजे से दुहता है। अधिकतम इन पदों पर सत्ता पक्ष के मंत्री,सांसद,विधायक या दमदार नेता के परिजन ही काबिज होते हैं। मुख्यमंत्री के जिला गोरखपंर में एक पूर्व मंत्री व भाजपा विधायक की पत्नी उम्मीदवार हैं। उनकी जीत भी पक्की है।

बता दें कि गांधी जी के सपनों को साकार करने की नियत से 1947 में पंचायत राज अधिनियम बनाया गया था। 15 अगस्त 1949 को ग्राम सभाओं का गठन हुआ। अमरीकी पैटर्न पर 1951-52 में विकासखंडों का गठन हुआ। और इसके कुछ साल बाद ही जिला पंचायतों का गठन हुआ। शुरू में इसे जिला परिषद का नाम दिया गया था। स्व. राजीव गांधी ने ग्राम सभा से लेकर विकास खंड और जिला पंचायतों को मजबूती देते हुए क्षेत्रपंचायत सदस्य का गठन किया और इसे बहुत सारे वित्तीय अधिकार भी दिए। उन्होंने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के जरिए इन तीनों पदों का चुनाव एक साथ कराने का फैसला किया और इसे त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का नाम दिया गया। मक्सद था चुने गए ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों के जरिए गांव समेत पूरे जिले के विकास की रूपरेखा बनाना और उसका विकास करना।

इसके पहले विकास खंडों में आए विकास के पैसे को हड़पने का शोर शुरू हो गया था। ब्लाक पर बैठा बीडीओ व अन्य कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे।

बलवंत राय मेहता की एक रिपोर्ट के आधार पर ब्लाकों के अधिकारी और कर्मचारियों पर नकेल कसने के लिए 1960-61 में ब्लाक प्रमुख पद का सृजन किया गया। ब्लाक प्रमुख का चुनाव ग्राम प्रधानों द्वारा होता था। अब ब्लाक प्रमुखों का चुनाव बीडीसी अर्थात क्षेत्रपंचायत सदस्यों के जरिए होता है। जिस मकसद से ब्लाक प्रमुख पद का सृजन हुआ, वह बुरी तरह फेल हो गया, ब्लाकों में भ्रष्टाचार और बढ़ गया। ठीक वही हाल जिला पंचायतों का है। जिला पंचायत सदस्यों का सदन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव गए बीते हाल में दस बीस करोड़ का खेल है। सीधी सी बात है जो शख्स इस पद के लिए इतना भारी निवेश करेगा, उससे विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है। ब्लाक और जिला पंचायतों का यह हाल आज और अभी नहीं, सरकार किसी की भी हो, यहां भ्रष्टाचार जारी था और जारी रहेगा।

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