आयुर्वेद में शोध और प्रयोग निरंतर जारी रहना चाहिए

यह लेख 2019 अक्टूबर में CENTRAL DRUG RESEARCH INSTITUTE LUCKNOW सीडीआरआई लखनऊ में वैज्ञानिको को संबोधित करते हुए आयुर्वेद के भ्रामक अवधारणाओं का निराकरण करते हुए डा आर अचल का लेक्चर है।आज आयुर्वेद की चर्चा के दौर में नीतिनिर्माताओं एवं आधुनिक वैज्ञानिको के अध्ययन हेतु विशेष रूप में प्रस्तुत है।                                                                        

आयुर्वेद धर्म और विज्ञान

डा आर अचल
डा आर अचल

आयुर्वेद को केवल भारत के संदर्भ में नहीं लिया जाना चाहिए।विश्व की प्रत्येक सभ्यता ने अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिकित्सा के उपाय खोजे है।यह सर्वविदित सत्य है दुनियाँ की प्रत्येक सभ्यता ने मानव जीवन के अस्तित्व का कारण एक दैविय सत्ता को स्वीकार किया है।इसलिए मानव जीवन के दुखों,रोगो,के निवारण और जीवन की रक्षा के लिए भी प्राथमिक रुप से  दैविय सत्ता की कृपा को स्वीकार किया ।इसलिए पहली औषधि प्रार्थना या मंत्र के रुप में खोजी गयी।इसीलिए पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान के शुरुआती दौर में प्रार्थना शामिल थी इसी लिए आज भी चर्च के फादर झाड़ फूँक करते दिख जायेगे।इसी तरह भारतीय चिकित्सा में भी मत्रों का प्रयोग दिख जाता है।

अतः प्रत्येक संस्कृति में चिकित्सा विज्ञान का आरम्भ धार्मिक केन्द्रो से ही हुआ है।पश्चिम में भी इसका प्रारम्भिक केन्द्र चर्च ही रहा है।सबसे पहले डाक्टर शब्द का प्रयोग चर्च द्वारा दिव्यज्ञान के अर्थो मे किया गया था।13वीं शताब्दी मे पहली बार पेरिस विश्वविद्यालय द्वारा विषय विशेषज्ञ के लिए डाक्टर शब्द का प्रयोग किया।उसी प्रकार चीन में भी यिन-यान धार्मिक आध्यात्मिक सूत्र से हुआ।आयुर्वेद की शुरुआत यत्तपिण्डे तद् ब्रह्माण्डे से होती है।परन्तु यहाँ विशेष बात यह है कि पश्चिम ने 19 शताब्दी के आरम्भ मे बौद्धिक क्रांति के बाद चिकित्सा विज्ञान को आध्यत्म के अलग कर भौतिक रूप में परिवर्तित कर लिया, इसके विपरीत भारत में ऐसा नहीं हो सका।इसलिए भारतीय चकित्सा पद्धति-आयुर्वेद को आज एक छद्म चिकित्सा विज्ञान के रुप में देखा जाता है।हालाँकि आज स्थितियाँ कुछ बदल रही है,फिर भी यह स्वास्थ्य रक्षा और जीवन शैली प्रबंधन तक सिमित है।

आयुर्वेद की विविधता

भारतीय सभ्यता, विषम भौगोलिक स्थितियों और जलवायु के कारण विविध संस्कृतियों का समुच्चय है।इसलिए जीवन शैली,आहार,व्यवहार में भी विविधता है.यही कारण है चिकित्सा विधाये भी विविधता भरी हुई है।आज का आयुर्वेद भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तरह विविध चिकित्सा विधियों का  समुच्चय है।ये विधियाँ अपने-अपने समय की जरुरतो के अनुसार विकसित हुई है।जो आज संयुक्त रुप में आयुर्वेद को एक समग्र आयुर्विज्ञान स्वरुप प्रदान कर रही है।

भारतीय सभ्यता, विषम भौगोलिक स्थितियों और जलवायु के कारण विविध संस्कृतियों का समुच्चय है।इसलिए जीवन शैली,आहार,व्यवहार में भी विविधता है.यही कारण है चिकित्सा विधाये भी विविधता भरी हुई है।आज का आयुर्वेद भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तरह विविध चिकित्सा विधियों का  समुच्चय है।ये विधियाँ अपने-अपने समय की जरुरतो के अनुसार विकसित हुई है।जो आज संयुक्त रुप में आयुर्वेद को एक समग्र आयुर्विज्ञान स्वरुप प्रदान कर रही है।

आयुर्वेद का उद्देश्य

स्वास्थ्य रक्षा,

व्याधि चिकित्सा > आरोग्य चिकित्सा,   शामक चिकित्सा

वैदिक-अवैदिक आयुर्वेद

आयुर्वेद के विषय में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि इसका स्रोत केवल वेद को माना जाता है.जबकि इसकी दो स्रोत रहे है वैदिक और अवैदिक ।

वैदिक आयुर्वेद-

वेद,आरण्यक,उपनिषद,पुराण,

आयुर्वेद ग्रंथ-चरक 

संहिता(चरक 300 ईसा पूर्व-दृढ़बल 17वी शताब्दी),हारित संहिता,अष्टांगहृदय,भावप्रकाश आदि 

आचार्य

भारद्वाज,भेल,जतुकर्ण,अत्रैय,अग्निवेश-चरक,

हारित > वागभट्ट,> वृन्द,चक्रपाणि,डल्लहण,शारंधर,भावमिश्र,आदि 

मूलविषय-स्वास्थ्य रक्षण, कायचिकित्सा

औषधिस्रोत- मुख्य रुप से वनौषधि, कुछ जान्तव,खनिज का भी प्रयोग

उद्देश्य- तप,धर्म,अर्थ काम, मोक्ष

चिकित्सक की उपाधि-वैद्य

अवैदिक आयुर्वेद

तंत्रग्रंथ,आगम,साहित्य संगम साहित्य,बौद्ध,जैन,साहित्य,शैव,शाक्त साहित्य,एवं लोक प्रयोग

*आचार्य-शैव-वीरभद्र भैरव,अगस्त(500ईसा पूर्व),पुलस्त्य,रावण,

मूल विषय़-रोग चिकत्सा

औषधि द्रव्य -पारद .गंधक आदि धातु,खनिज, रसायन,जान्तव, विषज द्रव्य,

उद्देश्य-अमरत्व

चिकित्सक उपाधि- सिद्धवैद्य

*योग-पतंजलि-अमरत्व (200ईसा पूर्व)

*शाक्त-शल्य-धनवंतरि,सुश्रुत,

उद्देश्य-घात चिकित्सा व आकस्मिक चिकित्सा 

चिकित्सक उपाधि-धानवंतरि

*बौद्ध-समग्र चिकित्सा 

आचार्य- कुमारजीवक,(2500 ईसापूर्व)महाकाश्यप(600ईसा पूर्व),नागार्जुन(50से 200 ईसा पूर्व) आचार्य मेडिसन बुद्धा,मंजुश्री,अवलोकितेश्वर,वज्रपाणि, आनन्द,पद्मसंभव,नागार्जुन,

तिब्बत (Sowa Ringpa) ज्योतिष,काय चिकित्सा

चिकित्सक उपाधि-आमची

*लोक आयुर्वेद

मध्य भारत,पूर्वोत्तर में रहने वाले आदिवासी समुदाय में वनौषधि व जन्तु  आधारित चिकित्सा व्यवस्था है,ये अपनी चिकित्सा विधि की उत्पत्ति देवी शीतला से मानते है।यह आयुर्वेद का अंग है।

औषधि-भल्लातक को (Semecarpus anacardium) जमीन के गाड़ दिया जाता है, उसके ऊपर बावची(Psoralea corylifolia) के बीज बोते है,उसके फल आने पर उसका प्रयोग चर्मरोग में करते है।

*क्षेत्रीय प्रभाव

उत्तर भारत –वानस्पतिक व शल्य  दक्षिण भारत-धातु,रत्न ,जानत्व,पंचकर्म 

पर वर्तमान में पुरे भारत में मिश्रित व्यवस्था है।पर केरल में पंचकर्म केन्द्रित है।

*जैसे-जैसे जीवन सहज व प्राकृत था एकल औषधियों का प्रयोग प्रचलन में था

*जैसै -जैसै जीवन जटिल होता गया,मिश्रित योग,विषो,धातु,खनिजो,लवणों का प्रयोग प्रचलन में आया । 

निदान-

आयुर्वेद की सभी धाराओं में निदान की प्रक्रिया समान है।

वात-पित्त-कफ और लक्षण,मलमूत्र,स्पर्श,नाड़ी,नेत्र आदि परीक्षा।

आयुर्वेद औषधि निर्माण

औषधि वर्ग- 

1-वनौषधिवर्ग-मूल,कंद,त्वक,पत्र,पुष्प,बीज,तैल,राल,गोंद

2-माँस्यादिवर्ग

3-दुग्धवर्ग

4-मूत्रवर्ग

5-विषवर्ग

6-धातु-उपधातु- रत्नवर्ग वर्ग

7-लवण वर्ग-

औषधि संग्रह काल– हेमन्त मे कंद,शिशिर में मूल,वसंत में फूल,ग्रीष्म में पत्र 

औषधियों की स्थानीय गुणवत्ता -जैसे उष्णवीर्य औषधियाँ  पूर्वोत्तर मे कमजोर,तराई मे मध्यम विन्ध्य मे उत्तम गुण मानी गयी है।

उचित रख रखाव न होने पर औषधियाँ हीन वीर्य हो जाती है।पर आसव,अरिष्ट ,रसौषियाँ लम्बे तक तक वीर्यहीन नही होती है।

विकल्प –आवश्यक औषधि द्रव्यो के अभाव मे वैकल्पित द्रव्यो का प्रयोग किया जाता है। जैसे

अगर Aquilaria agallocha > दालचीनी Cinnamomum verum,

केशऱ (Saffron) > लौंग Syzygium aromaticum

अतीस Aconitum hetrophilum >नागरमोथा Cyperus scariosus

आकदुध Calotropis latex >पीले पत्तो का रस 

1-स्वरस-हरी वनस्पति का जूस स्वरस कहलाता है।सूखी औषधियों को उसकी मात्रा के दोगुणे जल मे 24 घंटे भिगो कर मसल कर छान लिया जाता है।

2-फुटपाक- औषधि का कल्क को गम्भारी,बरगद जामुन आदि पत्तो लपेट कर उसके ऊपर मिट्टी लपेट कर अग्नि मे डाल दे।ऊपर की लिपटी हई मिट्टी लाल होने पर अग्नि से निकाल ले।इसमे से कल्क निचोड़ लिया जाता है।यह कड़ी पत्तियों और छाल के स्वरस निकलने के लिए विधि प्रयोग की जाती है जैसे नीम,अडुसा,आदि।

3-कल्क-हरी पत्तियों के जल के साथ पीस कर बनाया जाता है।सूखी औषधियों के चूर्ण को जल में मिला कर बनाया जाता है। 

4- क्वाथ–   16 या 8 गुने जल मे पकाया जाता है,अष्ठमांस ,चतुर्थाश बचने पर छान कर प्रयोग किया जाता है।50 मिली प्रयोग किया जाता है,परन्तु मन्द अग्नि के रोगियों को 25 मिली ।

5– क्षीरपाक-द्रव्य को आठगुना दूध और दूध के चारगुना जल पकाये जब केवल दूघ बचे  उतार ले।

6- हीमकषाय– 20 ग्राम औषधि को 120 मिली जल में सायं भीगो दे सुबह मसल कर छान कर प्रयोग किया जाता है।

7-अर्क-जल मे मिला कर आसवित करते है।

8-फांट-उबले जल में औषधि डाल कर थोडी देर रख कर ठंडा होने पर छान कर पीये

9-संधान-Fermentation- गन्ने से रस या गुड़ के रस में अन्य औषधियाँ डाल कर प्रकिण्वन किया जाता है।

10-अरिष्ट जैसे अर्जुनारिष्ट

4 किलोग्राम अर्जुन की छाल,2 किलो ग्राम द्राक्षा,800 महुए का फूल,जौकुट कर 40लीटर 800 Ml (कुल द्रव्य के 6 गुने) जल मे क्वाथ किया जाता है।10 लीटर (चतुर्थांश)जल बचने पर  4 किलो गुड़ और 800ग्राम धाय का फूल मिलाकर मुख बन्द कर 30 दिन रख दिया जाता है,उसके बाद छान कर आरिष्ट प्राप्त किया जाता है।

11-आसव-आसव मे क्वाथ के बजाय औषधियो के सीधे जल में प्रकिण्वन(Fermentation) कर आसव बनाया जाता है। 

12-घृतपाक– औषधियों के क्वाथ-चूर्ण को घृत मे पकाया जाता है,पाक होने पर छान लिया जाता है।

13-अवलेह-कुछ क्वाथ,चुर्ण व धृत शहद,शर्करा के योग से अवलेह बनाया जाता है।

14-क्षार-कुछ औषधियों के जला कर उसके राख को पानी मे घोल कर, छान कर राख अलग लिया जाता है।जल को सुखा कर क्षार प्राप्त किया जाता है।

15-घनसत्व-क्वाथ को पका कर घनसत्व बनाते है।

16-विषज शोधन-*कुचले (Strychnos nuxvomica) को सात दिन में गोमूत्र की सात भावना दी जाती है, फिर छिलका,जीभ्भी निकाल कर,16 गुने दूध मे दोलायंत्र मे उबालकर,घी में भूना जाता है।

**कुचला को एरण्डतैल (Ricinus oil) मे भूनने से शुद्ध हो जाता है।

16-धातु प्रयोग शोधन व भस्म- जस्ता,लोहा,स्वर्ण,आदि धातुओं के शोधन करके उसका भस्म निर्माण कर प्रयोग किया जाता है,इस प्रक्रिया में वनस्पतियों व जान्तव द्रव्यो का प्रयोग होता है।

जैसे कुछ उदाहरण है-

जस्ता(Zinc) शोधन- इसे कड़ाही में डालकर तेज अग्नि रस करके,21 बार दूध में बुझाने शुद्ध होता है।जिसका प्रयोग भस्म बनाने के लिए किया जाता है।

जसद भस्म- शुद्ध जसद एक किलो ग्राम कड़ाही में डाल कर तेज अग्नि पर लोहे के करछुल से चलाते है।आग की लपटे उठने पर 200 -200 मिली नीम की पत्ति का स्वरस पाँच बार जब आग का लौ उठने पर डालते है।इसके पश्चात मिट्टी या लौह पात्र के बर्तन से ढक कर  4 घंटे अग्नि दिया जाता है।,कड़ाही ठंडी होने पर प्राप्त भस्म को 6 घंटे धीक्वार के रस में  खरल कर छोटी-छोटी टिकिया बनायी जाती है। जिसे धूप में सुखा कर,सरावसंपुट मे रख कर 20 गजपुट पाक किया जाता है इसके पश्चात-यशद भस्म तैयार होता है।

सरावसंपुट-मिट्टी के दो कटोरियों को आपस ऊपर नीचे जोड कर बनाया जाता है।

गजपुट-27 ईंच लम्बे-चौडे,गहरे गड्ढे को गोबर से लेप कर ,उसमे सरावसंपुट रखकर कंडे की आग जलायी जाती है।

मल्ल शोधन(Arsenic)-  बकरे के मूत्र और चौलाई से रस में 12 घंटे डोला यंत्र पकाया जाता है।

भस्म-मल्ल (Arsenic),शुक्तीभस्म(Oyster),आक का पत्तो के रस(Calotropis procera) 12 घंटे खरल कर गोलियाँ बना कर सरावसंपुट में जलाते है।

प्रयोग-वातरोग(Neuro),गठिया,जीर्ण ज्वर, कफज्वर(Pneumonia), सन्निपात,Gland,Piles.

*हिंगुल शोधन (Sulphate of Mercury) आयुर्वेद -भेड़ के दूध में अम्लवेत, जम्भीरी नीबू आदि अम्लीय रसों 7 भावना दी जाती है।

**सिद्ध मे एकदिन दूध एक दिन नीबू के रस में भीगो कर सुखा लिया जाता है

*मैंसिल शोधन (Arsenic Sulphide)

आयुर्वेद में मैंसिल के चूर्ण को मोटे कपड़े की थैली मे भर बकरी के मूत्र के साथ दोला यंत्र में 3 अहोरात्र(72घंटे) तक मंद आँच पर पकाया जाता है,बकरी के पित्त की सात भावनाये या 3 घंटे हल्दी के क्वाथ मे दोला यंत्र मे पकाकर अदरक रस मे कूट कर धूप मे सुखाते है।

**सिद्ध मे मैंसिल के टुकड़ो को अदरक या नीबूरस या खट्टे मठ्ठे मे 4 घंटे भीगोकर शुद्ध किया जाता है।

रसऔषधि योग

त्रिभुवन कीर्ति रस-ज्वर चिकित्सायोग

शुद्ध सिंगरफ(Sulphate of Mercury),शुद्ध वत्सनाभ(Aconitum ferox),सोठ (Zingiber Officinale), काली मिर्च (Piper nigrum).भुना हुआ सुहागा(Sodium borate),पीपरामूल(Root of Piper longum)

इस चूर्ण को तुलसीपत्र रस(Ocimum),अदरक (Zingiber),धतूरा पत्र रस ( Datura stramonium) 

की तीन-तीन भावनाये दी जाती है। लगभग 50-60 मिलीग्राम की गोलियाँ बनायी जाती है।

प्रयोग-सर्दी,जुकाम,संक्रामक ज्वर,चेचक,वात ज्वर ,कफ ज्वर,सन्निपात ज्वर,

*अनुपान-अदरख स्वरस और शहद के साथ या रोगानुसार वनौषधियों के स्वरस से।

सावधानी-पित्तज्वर(.यकृत,गुर्दा Live, Kidney) में प्रयोग नही किया जाता है अति आवश्यक होने पर  प्रवाल पिष्टी शीतल औषधि के साथ प्रयोग किया जाता है।

देश-काल की आवश्यकताओं के अनुसार निरंतर शोध एवं प्रयोग आयुर्वेद का मौलिक चरित्र हैं इसलिए आज भी वर्तमान संसाधनों द्वारा यह प्रक्रिया जारी रहनी आवश्यक है।

-डॉ.आर अचल मुख्य संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट शोध पत्रिका, संयोजक सदस्य-वर्ल्डआयुर्वेद कांग्रेस    

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