कस्मै देवाय हविषा विधेम; हम अपनाहवि किसे समर्पित करें

आजादी के संघर्ष के दौरान हर वर्ग के बुद्धिजीवियों तथा समाजसेवियों ने कष्ट झेलते हुए प्रताड़ना की परवाह न करते हुए अपने समक्ष, कस्मै देवाय हविषा विधेम को स्पष्ट रखते हुए अपने धर्म का पालन हर कीमत पर किया। अपना हवि उस देवता को समर्पित किया जो जनता जनार्दन के रूप में रूढ़ियों तथा गुलामी के जंजीरों में जकड़ा शोषित आक्रांत त्राहि त्राहि कर रहा था। ज्ञान और विचार ने अपना हवि, करुणा, संवेदना, चेतना और मानवीय मूल्य को समर्पित किया। असत को तिरस्कृत कर सत को प्रोत्साहित किया।

क्या यह क्रूर सत्य नहीं है की सामाजिक मूल्यों के ह्रास तथा सत्ता के राजनीतिककरण में प्रभावी हो रहे धनबली, बाहुबली, जातिबली, सम्प्रदायबली ताकतों के गठजोड़ में एक नई ताकत ज्ञान और बुद्धि के क्षेत्र में भी उभर रही है आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के रूप में जिससे ज्ञान- जगत धीरे धीरे संक्रमित होता जा रहा है और बुद्धि विवेक का हवि जनता जनार्दन को न मिलकर गढ़े जा रहे नए नए देवता हड़प ले जा रहे हैं?

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी, प्रयागराज

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राज्य को सतत कल्याण की ओर उन्मुख करते रहने तथा समाज को जीवंत बनाये रखने में, बुद्धिजीवियों, समाजसेवी कर्मवीरों तथा चिंतकों का महती योगदान रहा है। इस देश में वैचारिकता की एक उदात्त परम्परा रही है। आजादी के संघर्ष के दौरान हर वर्ग के बुद्धिजीवियों तथा समाजसेवियों ने कष्ट झेलते हुए प्रताड़ना की परवाह न करते हुए अपने समक्ष, कस्मै देवाय हविषा विधेम को स्पष्ट रखते हुए अपने धर्म का पालन हर कीमत पर किया। अपना हवि उस देवता को समर्पित किया जो जनता जनार्दन के रूप में रूढ़ियों तथा गुलामी के जंजीरों में जकड़ा शोषित आक्रांत त्राहि त्राहि कर रहा था। ज्ञान और विचार ने अपना हवि, करुणा, संवेदना, चेतना और मानवीय मूल्य को समर्पित किया। असत को तिरस्कृत कर सत को प्रोत्साहित किया।

आजादी के बाद नवनिर्माण के चुनौतीकाल में भी विचारकों और समाजसेवियों ने निश्चय ही सराहनीय भूमिका निवाही। विचारों की प्रतिबद्धता को स्वस्थ रूप से मुखरित किया। असहमति में सहमति की भूमिका स्पष्ट की तथा आगाह करने के कर्तव्य से विमुख नहीं हुए। अभिव्यक्ति और चिंतन की स्वस्थ परम्परा विकसित की।

पर क्या यह क्रूर सत्य नहीं है की सामाजिक मूल्यों के ह्रास तथा सत्ता के राजनीतिकरण में प्रभावी हो रहे धनबली, बाहुबली, जातिबली, सम्प्रदायबली ताकतों के गठजोड़ में एक नई ताकत ज्ञान और बुद्धि के क्षेत्र में भी उभर रही है आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के रूप में जिससे ज्ञान- जगत धीरे धीरे संक्रमित होता जा रहा है और बुद्धि विवेक का हवि जनता जनार्दन को न मिलकर गढ़े जा रहे नए नए देवता हड़प ले जा रहे हैं? सत के बजाय असत की पक्षधरता किसी न किसी रूप में मजबूत ही हो रही है, ऐसा धुंध सम्भ्रमता के बौद्धिक विलासों से जाने अनजाने सृजित किया जा रहा है।

आज जब यह देश एक गंभीर त्रासदमय संक्रमण काल से गुजर रहा है, वैश्विक स्तर थाटलेसनेस प्रभावी हो रहा है, सचेत बौद्धिक जगत को उद्घोष करना होगा कि, कस्मै देवाय हविषा विधेम, उसके देवता कौन हैं? जनता जनार्दन की करुणा, प्रतारणा शोषण के प्रति संवेदनशीलता, मानवीयमूल्य, जनचेतना या वाग्विलास, बकवास, मूल्यों का हनन, सत्ता के साथ गठजोड़ और समाज में झूठसच के विषबेल का रोपण। बुद्धि विवेक की मीमांसा से ही ज्ञान विज्ञानं और पाखंड रूढ़ियों के बीच द्वंद्व को तर्कपूर्ण अर्थ प्रदान कर सकता है। इस त्रासद भरे युग में मानवीय मूल्यों की रक्षा दानवीय प्रवृत्तियों से कर सकता है। मानवता के लिए नीर क्षीर विवेक के साथ अपने कर्म –देवाय या पितराय को स्पष्ट करते हुए बौद्धिक जगत को हर कीमत पर इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा।

–यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।

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