भक्ति ही भक्त का स्वधर्म है

गीता प्रवचन दूसरा अध्याय* 32

फल-त्यागके दो उदाहरण
संतजनों ने अपने जीवनके द्वारा यह बात सिद्ध कर दी है।

तुकाराम के भक्ति-भाव को देखकर शिवाजी महाराज के मन में उनके प्रति बहुत आदर होता था।

एक बार उन्होंने तुकाराम के घर पालकी भेजकर उनके स्वागत का आयोजन किया।

परंतु तुकाराम को अपने स्वागत की यह तैयारी देखकर भारी दुःख हुआ।

उन्होंने अपने मन में सोचा – “यही है मेरी भक्ति का फल ? क्या इसी के लिए मैं भक्ति करता हूँ?”

उनको ऐसा प्रतीत हुआ, मानो भगवान् मान-सम्मान का यह फल उनके हाथ में थमाकर उन्हें अपने से दूर हटाना चाहते हैं।

उन्होंने कहा –
जाणोनी अंतर | टाळिसील करकर|
तुज लागली हे खोडी | पांडुरंगा बहु कुडी|

(मेरे अंतर्हदय को जानते हुए भी तुम मेरी झंझट टालना कहते हो ? हे पांडुरंग ! तुम्हारी यह टेव बहुत बुरी है।)

“भगवन्, तुम्हारी यह टेव अच्छी नहीं। तुम मुझे ये घुँघची के दाने देकर टरकाना चाहते हो। मन में सोचते होगे कि इस आफत को निकल ही न दूँ ! परंतु मैं भी कच्चा नहीं हूँ। मैं तुम्हारे पाँव पकड़कर बैठ जाऊँगा।”

भक्ति ही भक्त का स्वधर्म है और भक्ति में दूसरे-तीसरे फलों की शाखाएँ न फूटने देना ही उसकी जीवन कला है।

पुंडलीक का चरित्र फल-त्याग का इससे भी गहरा आदर्श सामने रखता है।

पुंडलीक अपने माँ-बाप की सेवा कर रहा था। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर पांडुरंग उसकी भेंट के लिए दौड़े आये।

परंतु पुंडलीक ने पांडुरंगके चक्कर में पड़कर अपने उस सेवा-कार्य को छोड़ने से इनकार कर दिया। अपने मां-बाप की सेवा उसके लिए सच्ची ईश्वर-भक्ति थी।

कोई लड़का यदि दूसरोंको लूट-खसोट कर अपने माँ-बाप को सुख पहुँचाता हो अथवा कोई देश-सेवक दूसरे देश का द्रोह करके अपने देश का उत्कर्ष चाहता हो तो दोनों की वह भक्ति, भक्ति नहीं कहलायेगी।

वह तो आसक्ति हुई। पुंडलीक ऐसी आसक्ति में फँसा नहीं।

उसने सोचा कि परमात्मा जिस रुप को धारण कर मेरे सामने खड़ा हुआ है, क्या वह इतना ही है? उसका यह रूप दिखायी देने से पहले सृष्टि क्या प्रेत थी?

वह भगवान् से बोला- “ भगवन्, आप स्वयं मुझे मिलने के लिए आये हैं, यह मैं जानता हूँ, पर मैं ‘भी’-सिद्धांतो को माननेवाला हूँ। आप ही अकेले भगवान् हैं, ऐसा मैं नहीं मानता। मेरे लिए तो आप भी भगवान् हैं और ये माता-पिता भी। इनकी सेवा में लगे रहनेके कारण मैं आपकी ओर ध्यान नहीं दे सकता, इसके लिए क्षमा कीजिए।”

इतना कहकर उसने भगवान् को खड़े रहने के लिए एक ईंट सरका दी और स्वयं उसी सेवा-कार्य में निमग्न हो रहा।

तुकाराम इस प्रसंग को लेकर बड़े प्रेम से विनोद पूर्वक कहते हैं –
कां रे प्रेमें मातलासी | उभें केलें विठ्ठलासी|
ऐसा कैसा रे तूं धीट | मागें भिरकाविली विट ||

“ तू कैसा पागल प्रेमी है कि तूने विठ्ठल को खड़ा रखा ? तू कैसा ढीठ है कि तूने विठ्ठल के लिए ईंट सरका दी?” क्रमश:

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