मज़दूरों के नाम 

गौरव अवस्थी

गौरव अवस्थी, पत्रकार, रायबरेली 

हाँ , वह मज़दूर है
मेहनतकश  मज़दूर है
मगर देश का नूर है
महल – किले सब रचे बनाये
शिल्प से कल -कारखाने चलाये
माटी को करके मुलायम
खेत गोड़  कर अन्न उपजाए
वक्त पड़े तो खुद को भरमाये
खाली पेट वह खुद रह जाए
पर लॉकडाउन की बंदी में
कहीं से कोई काम ना आये
रहा न जाए -सहा न जाये
भूख प्यास की फ़िक्र छोड़कर
पैदल से पैडल को मारे
तेज तेज साइकिल चलाये
शरीर से मजबूत है
पसीने की बहती बूँद है
पर पैसे से मजबूर है
गौर से देखो तो सही
वह परियों सा हूर है
हाँ, वह मजदूर है
मेहनतकश मज़दूर है
 मगर देश का  नूर है

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