कोरोना की जांच 5 सेकेण्ड में आईआईटी रुड़की की खोज

    दिनेश कुमार गर्ग

दिनेश कुमार गर्ग

कोरोना वायरस कोविड 19 से जंग लड़ रही दुनिया में भारत, रूस, इंगलैण्ड, अमरीका सहित सभी देशों में चारों तरफ लाकडाऊन से कोराना के प्रसार को थामने की जिद्दोजहद चल रही है। ऐसे में यह खबर कि कोरोना निगेटिव लोग या कोराना अप्रभावित लोग भी वस्तुतः कोरोना कैरियर हो सकते हैं तथा लाॅक डाऊन के बाद के दिनों में फिर से कोविड 19 आउटब्रेक की दूसरी वैश्विक लहर पैदा कर सकते हैं , इस्लामिक जगत को छोड़कर समस्त विश्व के विद्वान कैरोना की तोड़ ढूंढने में लगे हैं । इसकी तोड़ कोराना कि मौलिक संरचना में ही मिलेगी इस पर सर्वसम्मति है । अब संरचना में कमजोर कडी़ को पहचानने और उस पर प्रभाव डालने वाले प्रोटीनों, अम्लों अथवा विषों पर काम चल रहा होगा जिसके विषय में रिसर्च पूर्ण होने पर ही जानकारी मिल सकेगी ।
तब तक, तब तक दुनिया हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती , इसलिए अभी डाॅक्टर्स, इंजीनीयर्स और टेक्नीशियन्स का जोर ऐसे एपरेटस या टेस्ट किट के विकास पर है जो कोरोना संक्रमण का ठीक ठीक पता लगा ले । इस निमित्त भारत में आईसीएमआर ने सेरोलाॅजिकल किट के प्रयोग की सलाह दी है पर वह भी लोकसुलभ , विश्वसनीय होगी यानी शात-प्रतिशत डिटेक्शन रेट साबित करेगी इसमें सन्देह है। अभी कोरोना टेस्ट की जितनी भी सुविधाएं हैं वे पूर्ण विश्वसनीयता के स्तर का प्रदर्शन करने में विफल साबित हुई हैं। इसी कारण निगेटिव टेस्टेड लोग बाद में पाॅजिटिव साबित हो रहे हैं जो सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि निगेटिव टेस्टेड शख्स भी कोरोना कैरियर होने के कारण सामाजिक गतिविधि में पहले अपने परिवार , फिर आस-पडो़स, आॅफिस, बिजनेस सेण्टर आदि में संक्रमण फैलाने वाला बन सकते हैं।
कहने का मतलब कि कोरोना नियंत्रण के बावजूद कोरोना निर्मूलन अभी निकट भविष्य में लगभग असंभव सा दिख रहा है , ऐसे में कोरोना के डिटेक्शन के 100 प्रतिशत प्रभावी तकनीक का विकास एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी और प्रेस ट्रस्ट के अनुसार एक भारतीय इंजीनियर ने इस दिशा में पाथ-ब्रेकिंग उपलब्धि हासिल की है । आईटीआई रुड़की भारत के सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक है और कोरोना फाइट में यह संस्थान भी लगा है। इसके सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर कमल जैन ने एक कंप्यूटर साफ्टवेयर विकसित करने में सफलता प्राप्त की है जिसकी मदद से कोरोना के सस्पेक्टेड मरीज के एक्सरे की जांच कर 5 सेकेण्ड में पता चल जायेगा कि सस्पेक्टेड व्यक्ति संक्रमित है या नहीं । प्रफेसर जैन अब अपने साफ्टवेयर का पेटण्ट करवा रहे हैं।
तो सबसे पहले कोरोना डिटेक्शन में प्रचलित श्वाब टेस्ट के बजाय प्रोफेसर जैन द्वारा विकसित साफ्टवेयर असिस्टेड एक्स रे इमेज एनालिसिस के महत्व को जान लें तब ही इस साफ्टवेयर डिस्कवरी के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पाथ-ब्रेकिंग महत्व को समझा जा सकेगा।
कोरोना यानी कोविड 19 वायरस फैफडे़ और श्वसन तंत्र को ही पकड़ता है। फैफडे़ के कोटि-कोशों में इसके संक्रमण से मवाद भरनी शुरू होती है , और यह काम शुरुआत में अधिकांशतः धीमा होने से श्वाब या सेरोलाॅजिकल टेस्ट में जांच अधीन व्यक्ति निगेटिव होता है। पर एक्सरे चूंकि फेफडे़ पर ही फोकस होता है और वहां संक्रमण के कारण बन रहे बैक्टीरियल कालोनी , कोरोना के कारण मवाद या पानी भरने को इमेज में कैद करता है जिसको प्रोफेसर जैन का साफ्टवेयर डिटेक्ट कर लेता है । यानी इन्फेक्शन अपनी सेंधमारी के समय ही पकड़ में आने लगता है, जिससे कोरोना संक्रमित व्यक्ति के कोरोना निगेटिव दिखने की संभावनाएं समाप्त हो जायेंगी। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी इस स्टेज पर मेडिकल संस्थानों द्वारा प्रोफेसर कमल जैन के साफ्टवेयर असिस्टेड एक्सरे डिटेक्शन विधि की पुष्टि की प्रतीक्षा बनी हुई है।
प्रोफेसर कमल जैन ने बताया कि “सबसे पसले आर्टीफीसियल इण्टेलिजेंस बेस्ड डाटाबेस में 60,000 से अधिक एक्स रे स्कैन किये जिनमें कोविड 19 , न्यूमोनिया और टीबी के भी थे । प्रोफेसर जैन ने बताया कि “मैं जानना चाहता था कि तीनों बीमारियों में चेस्ट इन्फेक्शन में अंतर क्या है। इसके साथ ही मैंने अमरीका के एन आई एच क्लीनिकल सेण्टर के डाटाबेस को भी खंगाला है ।”
प्रोफेसर कमल जैन ने साफ्टवेयर के कार्य के बारे में बताया कि डाॅक्टर इस साफ्टवेयर पर किसी भी व्यक्त के एक्स रे को अपलोड करके जान सकते हैं कि वह मरीज न्यूमोनिया या कोविड 19 प्रभावित है या फिर किसी बैक्टीरिया का शिकार है और संक्रमण की पकड़ कितनी है। यह सब मात्र 5 सेकेण्ड में हो सकेगा ।
दर असल, कोविड 19 संक्रमण के बाद यह वायरस फेफडे़ को पूरी तरह जकड़ लेता है , जबकि अन्य तरह के बैक्टीरियल इन्फेक्शन से फेफडे़ आंशिक रूप से प्रभावित होते हैं। प्रोफेसर कमल जैन के साफ्टवेयर का प्रयोग कर मात्र 5 सेकेण्ड में बैक्टीरिया की कालोनी , फेफडे़ में फ्लूड जमा होने के पैटर्न, क्लंप या क्लाॅट का ( bilateral opacity, pattern of fluid build-up in lungs and nature of clump or clot if any,) का पता भी चलेगा।
इस साफ्टवेयर के विकास के बाद अब हम कह सकते हैं कि कोविड 19 संक्रमण की व्यापक और गतिशील जांच के लिए हमारे इंजीनियरों ने अपना योगदान कर दिया है और बारी है नीति निर्माताओं की कि वे बाहर झांकने से पहले भीतर के टैलेण्ट पर भी ध्यान दें।

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