तालाबंदी ने मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ाया

बढ़ रही हैं आत्महत्यायें

अनुपम तिवारी

अनुपम तिवारी, लखनऊ

जिस समय सारा देश इस जद्दोजहद में लगा हुआ है कि कैसे कोविड 19 के भयानक हो रहे प्रसार को रोका जाए, कुछ ऐसी मौतों ने समाज को झकझोर दिया है जिन्हें शायद रोका जा सकता था.

कल, 30 मई को 50 वर्षीय भानु प्रकाश गुप्ता ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली. उनका शव उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में रेल की पटरियों से बरामद हुआ. मृतक के पास से एक सुसाइड नोट मिला है, जिसके अनुसार वह एक होटल में काम करता था, लॉक डाउन के चलते उसका रोजगार बन्द हो गया था. इस स्थिति में वह अपनी और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर पाने में खुद को असमर्थ पा रहा था.

सुसाइड नोट से पता चलता है कि अपने आसपास हो रही घटनाओं से यह व्यक्ति दुखी हो कर कब मानसिक अवसाद की स्थिति में पहुँच  गया यह उसे पता ही नही चला. वह आगे लिखता है कि पैसे की जबरदस्त तंगी है. सरकार से उसे सहायता के तौर पर राशन मिल जाता था, मगर बाकी आवश्यक वस्तुओं जैसे चीनी, नमक, तेल यहां तक कि बच्चों के लिए दूध तक खरीदने के पैसे उसके पास नही बचे थे. 

अपने पीछे वह पत्नी, 4 बच्चों और बूढ़ी, बीमार मां को छोड़ गया है. उसकी माँ की लंबी बीमारी भी इस अवसाद को बढ़ाने में सहायक रही. इसी सुसाइड नोट में उसने शिकायत करते हुए लिखा है कि माँ का इलाज नही हो पा रहा था, उसने अधिकारियों से मदद की गुहार भी लगाई थी जो कि अनसुनी हो गयी.

इस हृदय विदारक घटना का संज्ञान लेते हुए जब कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीट करके सरकार पर हल्ला बोल दिया तो मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई. अब उत्तर प्रदेश सरकार ने मृतक के परिवार को हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है. लखीमपुर खीरी के जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह ने मीडिया को बताया कि, “हम जांच कर रहे हैं, जिससे कि मौत की असल वजहों का पता चल सके”.

तालाबंदी के दौर में बढ़ती आत्महत्यायें

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार जब से देशव्यापी लॉक डाउन घोषित हुआ है, भारत मे 300 से ज्यादा मौतें नॉन-कोरोना वजहों से हुई हैं. यह आंकड़े चौंकाते हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि तालाबंदी ने लोगों में मानसिक तनाव और अवसाद को बढ़ाया है. रिपोर्ट के अनुसार 80 लोगो ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली कि वह अकेलेपन से ऊब चुके थे या उनमें डर बैठ गया था कि कहीं उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव न आ जाये. इसके अलावा गति शीलता पर लगा ब्रेक और शराब न मिलने पर होने वाला ‘अल्कोहल विदड्रॉल’ भी कई दुर्घटनाओं का कारण बना.

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है यह आंकड़े और भी ज्यादा भयावह हो सकते हैं, क्योंकि भारत मे बहुत सी ऐसी घटनाएं रिपोर्ट भी नही की जाती. 

आँकड़े डराते हैं

इकनोमिक टाइम्स बताता है कि 7 व्यक्ति मानसिक अवसाद के इस कदर शिकार हुए कि उन्होंने आफ्टरशेव लोशन और सैनिटाइजर पी कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी.

फर्स्ट पोस्ट डॉट कॉम ने इस दौरान मानसिक अवसाद के कारण हुई मौतों पर देश भर से डेटा इकट्ठा किया है जिनमे से कुछ उल्लेखनीय हैं.

1. रांची में 26 वर्षीय एक युवती ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह ताला बंदी के कारण अपने घर वापस नही जा पा रही थी.

2. चित्तूर (आंध्र प्रदेश) में एक 56 वर्षीय व्यक्ति ने फांसी लगा कर जान दे दी क्योंकि उसको वहम हो गया था कि उसको कोरोना हो गया है, और वह ज़िंदा रहा तो अपने परिवार, बच्चों में यह फैला सकता है.

3. बंगलुरू के विक्टोरिया अस्पताल में कोरोना का इलाज कर रहा एक 50 वर्षीय व्यक्ति, जो ठीक हो रहा था, ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसके वार्ड में एक अन्य कोरोना का मरीज भर्ती हो गया था.

4. आयरलैंड में मास्टर्स की पढ़ाई कर रही एक 25 वर्षीय युवती सकुशल ताला बंदी के पूर्व ही भारत वापस आ चुकी थी. 2 महीने मुम्बई में अपने घर मे अकेले, अपने कॉलेज-समाज से दूर रहना उसको इतना अखरा, कि उसने फांसी लगा कर अपना जीवन त्याग दिया.

आर्थिक परेशानियों से उपज रहा है तनाव

श्रमिकों, दुकानदारों और नौकरी पेशा लोगों में भी इस कोरोना काल मे अपने अपने व्यवसाय को ले कर अनिश्चितता घर कर गयी है. बेरोजगार हो जाने का डर, वेतन में कटौती, ऋणों-देनदारियों को न चुका पाने का भय इत्यादि इन वर्गों में आर्थिक और मानसिक तनाव को जन्म दे रहे हैं. मगर सबसे बड़ी मार तो गरीब पर ही पड़ी है क्यों कि वह वास्तविक जीवन मे कठिनाइयों के सबसे समीप रहता है. और मानसिक अवसाद से बचने के लिए जो भी उपक्रम समाज मे उपलब्ध हैं, उन तक इसकी पहुंच नही है.

स्ट्रेटेजी एंड पापुलेशन हेल्थ (केंट, इंग्लैंड) के डायरेक्टर रशेल जोन्स के अनुसार “लोगों के सामान्य रूटीन और उनके वाह्य संपर्कों में जब भी रोक लगाई जाती है, वह उनमें मानसिक तनाव को जन्म देता है, यह रुकावट अगर लंबी अवधि तक रह जाए तो व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाएगा. युवाओं और गरीब तबके के लोगों में यह प्रवृत्ति ज्यादा देखने को मिलती है”

अपने देश मे अभी भी मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा उतनी नही होती जितने उसके मरीज हैं. लोग इसको गंभीरता से नही लेते. परंतु समाज को यह देखना होगा, कि ये उन मौतों का कारण बन सकता है, जिनको हम बचा सकते थे. महामारी के इस दौर में, समाज के तौर पर हम सब का दायित्व बन जाता है कि अपने आसपास नज़र रखें अवसाद के लक्षण दिखते ही ऐसे व्यक्तियों को प्रेरित करें कि वह अपना इलाज करवाएं. बहुत सारे स्वयंसेवी संगठन और समाजसेवी संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं. सरकारों को भी चाहिए कि वह समझे कि उसके लोगों  का मानसिक रूप से स्वस्थ रहना भी जरूरी है, इसलिए नीतियां इस प्रकार बनें जो सर्वोपयोगी हों और जमीन पर दिखें भी. बीमारों के इलाज के लिए टेली कॉन्फ्रेंसिंग का वृहत उपयोग किया जा सकता है. सुनिश्चित करें कि, फिर कोई भानु प्रताप  सिर्फ इस लिए अपने प्राण न त्यागे कि उसके पास दाल तो थी, पर वह उसमे नमक नहीँ डाल पा रहा था.

 

 

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