कौरोना की मार महरियों पर 

प्रसंगवश 

ज्ञानेंद्र शर्मा

ज्ञानेन्द्र षर्मा

वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त, उत्तर प्रदेश 

 आगे आने वाले महीनों में और खासकर इस साल के शेषार्ध  में कुछ नई घटनाएं और घटनाओं सी लगने वाली अघटनाएं होने की संभावनाएं बराबर मंडरा रही हैं। सबसे पहली चोट तो पड़ रही है, घरेलू नौकरों, महरियों और कामवाली बाइयों पर। जिस तरह से सरकार का झुकाव मालिकों/उद्योगों की तरफ हो रहा है, इन घरेलू नौकरों की मुसीबतें और भी बढ़ सकती हैं। 

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2015 को, यानी पहली बार प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद यह संकेत दिए थे कि घरेलू नौकरों को बेहतर सेवा शर्तें दी जाएंगी। उन्होंने संकेत दिया था कि इन्हें पूर्णकालिक सेवा के लिए कम से कम 9000 रु मासिक वेतन मिलना चाहिए, 15 दिन की पेड लीव, मैटरनिटी लीव, सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि केन्द्रीय केबिनेट में जल्दी नेशनल पालिसी फाॅर डोमेस्टिक वर्कर्स का मसौदा लाया जाएगा और उस पर काम होगा। लेकिन ताजा जानकारी बताती है कि यह प्रस्ताव तब से अब तक भी सरकार के विचाराधीन ही है।

      इस बीच कामकाजी महिलाओं/काम वाली बाइयों/महरियों की कठिनाइयाॅ इस महामारी और लाॅकडाउन ने और भी बढ़ा दी हैं। कई जगहों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि लाकडाउन के समय काम पर न आने की वजह से उस अवधि का वेतन लोग उन्हें नहीं दे रहे हैं। 

कई कालोनियों ने और मुहल्ला कमेटियों ने महामारी के डर से महरियों का प्रवेश  अपने यहाॅ बंद कर दिया था और अब इस अवधि में काम न करने के कारण उन्हें मेहनताना देने से मना किया जा रहा है। अब चूॅकि कामवाली महरियों यानी मेड्स को काम पर वापस लेने की अनुमति सरकार ने दे दी है तो उनकी पिछले दिनों की तनख्वाह का सवाल उठ रहा है।

     यह भी कम उल्लेखनीय बात नहीं है कि नोयडा जैसे कुछ शहरों में इन मेड्स के एक से अधिक घरों में काम करने पर रोक लगा दी गई है। ऐसे आदेश  देने वाले जिलाधिकारी इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि ज्यादातर घरों में ये बाइयाॅ अंशकालिक यानी पार्ट टाइम के तौर पर काम करती हैं इसलिए कई घरों में काम करना उनकी मजबूरी होती है। वरना उन्हें जीवन यापन करना मुश्किल  हो जाएगा। यह भी गौर करने लायक है कि उनके काम के घंटे तय नहीं होते, साप्ताहिक अवकाश  उन्हें नहीं दिया जाता, बहुत कम मेहनताना दिया जाता है, बीमार पड़ जायं तो दूसरी मेड काम पर रख ली जाती है। बहुत सारी मेड्स के पति अंततः उन्हीें की कमाई पर निर्भर हो जाते हैं और इस तरह बच्चों के अलावा पति की देखभाल भी उनकी ही जिम्मेदारी हो जाती है।

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