सम्भवामि युगे युगे : धर्म संस्थापना अर्थात प्रकृति का संरक्षण

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी, प्रयागराज 

सन २०२० का पदार्पण मानव इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा। सारा विश्व जहाँ एक ओर कोरोना वाइरस के आतंक से दहल उठा  वहीँ दूसरी ओर समूचा विश्व सामाजिक आर्थिक विप्लव की आशंका से ग्रस्त है।कैसी बिडम्बना है की निरंतर भीषण त्रासदी झेलते हुए भी  विश्व की राजनीती सम्पूर्ण रूप से मानवतावादी और शांतिवादी प्रतिबध्दता के प्रति समर्पित होने के बजाय विपत्ति काल में भी बाजारवाद और एकाधिकारवाद की तृष्णा से मुक्त नहीं हो पा रहा है। विज्ञानं के शिखर पर पहुंचे वैज्ञानिक निराकरण की दिशा में आपेक्षित सफलता नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। विज्ञान की अन्यान्य शाखाओं में शिखर छूने का दावा करने वाला विज्ञानं अर्द्धजीव वायरस से सम्बंधित शोधों में मुँह की क्यों खा रहा है। एक लहर की उपयोगी दवाएं दूसरे लहर में अनुपयोगी करार कर दी जा रही हैं। अँधेरी गुफा में मानव भटक रहा है। कोरोना को भी जीवन की एक त्रासदी के  रूप में अंगीकार करने की अवधारणा विकसित होती जा रही है। 

असमय आंधी तूफान वर्षा भूचाल आदि से सामान्य जन किंकर्तव्यविमूढ़ होता जा रहा है। 

विश्व की यह स्थिति कही  प्रकृति के शोषण पर्यावरण प्रदूषण धर्म की ग्लानि -पतन के कारण तो नहीं है। 

ऐसे समय में गीता के दो श्लोकों का परायण करता रहता हूँ। मेरी दृष्टि में इनपर चिंतन मनन आज अधिक प्रासंगिक है। 

गीता के अध्याय ४ के श्लोक ७ में कहा गया :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम 

अर्थात हे भारत ,विश्व के नागरिकों जब भी धर्म की ग्लानि ,पतन ,हानि होती है। अधर्म की प्रधानता होने लगती है तो  

मैं अपने को प्रगट करता हूँ। कोरोना काल में धर्म के पतन के उदहारण न भूतो न भविष्यत् हैं -पतन की सीमा को उत्थान का प्रयास भी चरितार्थ करने की निर्लज्जता ने मानवता को लज्जित किया। 

श्लोक ८ में कहा गया ;

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम 

धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे 

अर्थात ,;साधु पुरुषों के उद्धार के लिए ,दुष्टों के विनाश के लिए ,धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए मैं हर युग में प्रगट होता हूँ। 

इन श्लोकों के परायण से ही यह आशा जागृत होती है साधु पुरुषों ,सामान्य जन ,जो धर्म अधर्म को अपने जीवन में नहीं समझ पाते ,के उद्धार और दुष्टों के उद्धार का एक ही रास्ता है धर्म की संस्थापना। 

कैसे होगी धर्म की संस्थापना ,कौन करेगा ?क्या कोई अवतार होगा राम और कृष्ण की भांति ?

इसमें कोई संशय नहीं की विगत तमाम वर्षों में जाने अनजाने भारत ,विश्व के नागरिकों ने ,उनके महानायकों ने धर्म को ग्लानीग्रस्त ही किया ,अधर्म में वृद्धि ही हुयी ,दुष्टों की संख्या में वृद्धि ही हुयी बाबा तुलसी के शब्दों में ;

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सद्ग्रन्थ 

दंभहि निज मति कल्पी करि प्रगट किये बहु पंथ 

अर्थात कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया ,सद्ग्रन्थ लुप्त हो गए ,दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए। 

धर्म की संस्थापना हेतु धरती के राम,कृष्ण को धर्म को समझाना होगा। धर्म ,सीता और देवकी के रूप में कारागार में है। इन्हे मुक्त कराने की आवश्यकता है। 

श्रीमद्भागवत में कहा गया है ,;धर्म तू साक्षादभगवत्प्राणितं ,;६ \३ १९ ;अर्थात धर्म भगवान के प्रत्यक्ष आदेश हैं जिन्हे वेदों में ऋत कहा गया प्रकृति के शाश्वत नियम। 

धर्म की धारणा केवल अपूर्ण प्रायोगिक ज्ञान और उससे भौतिकता की उपलब्धि में ही निहित नहीं है उसे मानवतावादी और शान्तिमूलक बनाना होगा ,तभी धर्म सही अर्थों में संस्थापित हो सकेगा ,चाहे यह राजधर्म हो समाजधर्म हो या व्यक्तिधर्म। 

धर्म संस्थापना अर्थात प्रकृति का संरक्षण ,प्राकृतिक नियमों के अनुसार जीवनयापन ही वर्त्तमान भय ,आतंक ,अशांति को दूर कर सकता है,तभी यह संभव हो सकेगा की त्रासदियों को भी मानव जीवन का एक कारक बनाकर जी सके। 

support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

one × 3 =

Related Articles

Back to top button