दुविधा और अनिर्णय में फंसी कांग्रेस

"मांझी जब नाव डुबोए, उसे कौन बचाए।"

रतिभान त्रिपाठी
रतिभान त्रिपाठी
आपदा में अवसर तलाशते कांग्रेसजनों का सपना एक बार फिर टूट गया है। वह एक अदद अध्यक्ष नहीं तलाश पाए। कोरोना की आड़ लेकर कांग्रेस ने अध्यक्ष पद का चुनाव/मनोनयन टाल दिया है। सोनिया गांधी फिलहाल कार्यवाहक अध्यक्ष बनी रहेंगी। 

पार्टी में लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले नेताओं को निराशा का ही सामना करना पड़ा है। पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग बनी रहेगी। अनिर्णय, असमंजस और निराशा जैसे नकारात्मक शब्द कांग्रेस की डिक्शनरी में स्थाई भाव में शामिल होते जा रहे हैं। 

इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने पांच साल पहले कांग्रेस से आए हिमंता बिस्व सरमा को असम का मुख्यमंत्री जरूर बना दिया है। कांग्रेस के लिए यह आईना है कि वह अपने ही मजबूत लोगों का सदुपयोग न करके उन्हें अन्यत्र शरण लेने पर मजबूर करती है। और भारतीय जनता पार्टी उनका सदुपयोग करते हुए अवसर देती है। 

कांग्रेस अपनी ऐसी ही चूकों से खुद को कमजोर बनाती चली जा रही है।  वह ऐसी दुविधा से बाहर कब आएगी, यह रहस्य पुराने कांग्रेसजन भी नहीं समझ पा रहे हैं। बार-बार ऐसी ही चूकों के चलते कांग्रेस कमजोर होती जा रही है। उस पर परिवारवाद का ठप्पा लग ही चुका है, जो मौजूदा राजनीतिक हालात में घातक है।

देश के पांच राज्यों में भले ही वह जैसे तैसे सत्ता बचाने में कामयाब है लेकिन दुविधापूर्ण नीतियों के नाते ही वह बारह राज्यों में विपक्ष के रूप में है, जहां वह सत्ता हासिल कर सकती थी।
कांग्रेस लोकतांत्रिक ढांचे वाली पार्टी रही है, जिसमें आंतरिक लोकतंत्र के लिए भी भरपूर स्थान रहा है। इतिहास इसका साक्षी है। बदले दौर में कांग्रेस की हालत एक परिवार की पार्टी जैसी हो गई है। ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी और उनके परिवार का कोई सदस्य ही इस पार्टी को चला सकता है। दूसरे के वश की बात ही नहीं।

यह माहौल यूं तो इंदिरा गांधी के जमाने से ही बन गया था लेकिन वह बहुत मजबूत और विलक्षण नेता रही हैं। उनके समय पार्टी इतनी कमजोर नहीं होने पाई। सोनिया गांधी के जमाने में परिवारवाद ही अंतिम सत्य हो चला है। जिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को दो बार प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेसजनों के बीच मदर इंडिया जैसा मुकाम हासिल कर लिया था, उनके सामने ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अपने पुत्र राहुल गांधी के अलावा किसी और को पार्टी का नेतृत्व नहीं सौंपना चाहतीं, जबकि कांग्रेस में एक से बढ़कर एक अनुभवी, कर्मठ, समर्पित और युवा नेता मौजूद हैं, जिनकी ऊर्जा का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
अनिर्णय और दुविधापूर्ण हालात का ही नतीजा है कि उसके वरिष्ठ और अनुभवी नेता चुप मारकर बैठ गए हैं। कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद जैसे नेताओं की बात सुनी ही नहीं जा रही है। क्या पार्टी के हित में इन जैसे नेताओं के अनुभव का लाभ नहीं लिया जा सकता है।

ऐसे में वह अगर अपने लिए राजनीति का कोई दूसरा ठौर ठिकाना तलाश लें तो इसमें क्या ग़लत है। इसी तरह उपेक्षा के शिकार युवा नेता भाजपा जैसे दूसरे दलों में अपने लिए अवसर तलाश रहे हैं। जो कुछ बागी हो गए, उनका पराक्रम सबके सामने है। जगनमोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश में सत्ता में हैं तो असम में हिमंता बिस्व सरमा को भाजपा ने ही मुख्यमंत्री बना दिया। और पीछे जाएं तो महाराष्ट्र में अपनी बुलंदी का परचम लहराने वाले शरद पवार व पश्चिम बंगाल में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाली ममता बनर्जी भी कांग्रेसी ही रही हैं। राजस्थान में सचिन पायलट के विद्रोही तेवर किसी से छिपे नहीं हैं। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया बागी होकर भाजपा के पाले में जा बैठे हैं।

वह तो अंदरूनी राजनीति और कुछ चूकों के चलते हालात नहीं बन पाए, वरन सचिन पायलट राजस्थान के मुख्यमंत्री होते और यह असंभव नहीं कि भाजपा निकट भविष्य में ज्योतिरादित्य को मध्य प्रदेश की सत्ता की कमान सौंप दे।
2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़कर बड़प्पन दिखाने की कोशिश की थी लेकिन परिवार की गुलामी करने जैसी मानसिकता में जी रहे कांग्रेसियों ने अंततः सोनिया गांधी को ही कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया, जबकि यह प्रयोग का एक अवसर था। लेकिन संभवतः सोनिया और राहुल को लगा होगा कि अगर नेतृत्व किसी और के हाथ में चला गया तो खेल बिगड़ सकता है। इसीलिए न तो राहुल गांधी ने परिवार के बाहर के व्यक्ति को नेतृत्व सौंपने की वकालत की और न ही सोनिया गांधी ने। यदि मां-बेटा यह चाह लें तो पार्टी को रातों-रात नया और पूर्णकालिक अध्यक्ष मिल सकता है।
इस दरम्यान कई राज्यों में चुनाव हुए जहां पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा। असम और पश्चिम बंगाल के हाल में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे किसी से छिपे नहीं। सीएए और एनआरसी को लेकर पार्टी जिस तरह से इन राज्यों में भाजपा के मुक़ाबिल थी, उसका फायदा तो मिलना ही चाहिए था लेकिन न तो असम में कोई कमाल दिखा पाई और न ही पश्चिम बंगाल में।

पश्चिम बंगाल में तो पार्टी का सफाया ही हो गया। 44 सीटों से शून्य पर पहुंच गई। यहां कांग्रेस का कोई नामलेवा ही नहीं बचा। यह सब पार्टी नेतृत्व के अनिर्णय और दुविधा के कारण ही तो है। कांग्रेसजन राहुल गांधी जिम्मेदारी से भागते हुए महसूस करते हैं। जब वह प्रियंका गांधी वाड्रा को जिम्मेदारी सौंपने की बात उठाते हैं तो सोनिया गांधी और राहुल, दोनों खामोशी ओढ़ लेते हैं। इससे स्पष्ट है कि वह प्रियंका को आगे लाने के पक्षधर नहीं। बेटी को आगे लाना पसंद नहीं और परिवार के बाहर किसी और को जिम्मेदारी सौंपनी नहीं है। ऐसे में देश की सबसे पुरानी और एक जमाने में देश में सर्वाधिक भरोसा हासिल करने वाली पार्टी कहां पहुंचेगी, तय कर पाना मुश्किल है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की बात करें तो यहां कांग्रेस की हालत इतनी खराब है कि अगले साल होने वाले चुनाव में पार्टी का क्या होगा, भगवान ही जानता होगा।

माना कि स्वास्थ्य कारणों से सोनिया गांधी यहां सक्रिय नहीं हो सकीं लेकिन राहुल गांधी तो कांग्रेसजनों को एकजुट करते हुए संगठन को न ताकत दे सकते थे, जो अमेठी हारने के बाद यहां मुंह दिखाने भी नहीं आए। प्रियंका गांधी वाड्रा को राज्य का जिम्मा सौंपा गया। उनके दूत तो बीते साल भर से उनके लिए दफ्तर और आवास तलाशने का महज हल्ला मचवाते रहे हैं और प्रियंका ट्वीट के भरोसे काम चला रही हैं।

वह कुछ नहीं करतीं, बस आनंद भवन में डेरा जमाकर कार्यकर्ताओं से मिलने जुलने लगतीं या लखनऊ में ही रुक जातीं तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होने में शायद देर नहीं लगती। लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया।

प्रदेश का नेतृत्व संभालने लायक प्रमोद तिवारी, आरपीएन सिंह जैसे कई अनुभवी और पार्टी के लोकप्रिय चेहरों को पीछे ढकेल दिया गया है। ऐसे में आगे का रण कैसा होगा, अभी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के हालात तो केवल उदाहरण के लिए हैं, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और दूसरे कई राज्यों में पार्टी की स्थिति कोई अलग नहीं है। इन स्थितियों को देखते हुए फिल्मी गीत की यह लाइनें कम प्रासंगिक नहीं हैं कि “मांझी जब नाव डुबोए, उसे कौन बचाए।” इस माहौल में जब देश कोरोना से जूझ रहा है तब अपनी सेवा भावना के जरिए देश के लोगों का दुख-दर्द बांटने और जन सहानुभूति अर्जित करने के बजाए वह केवल आरोप लगाने में ही अपनी जीत मान रही है।
(लेखक -रतिभान त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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