धन की गंगा उलटी बहती है

मसूद रिज़वी

मसूद रिज़वी

कोरोना की महामारी ने हमारे सामने जो सबसे बड़ी चुनौती खड़ी की है वह है श्रमिकों का बड़े शहरों से अपने मूल निवास या गांव की ओर पलायन। लाखों श्रमिक बिना साधन, बिना धन, बिना खाए पिए पैदल ही हजारों किलोमीटर‌ के सफ़र पर चल देते हैं, उनके पैर छालों से भरे हैं रास्ते में कितने ही मज़दूर व उनके परिवार की महिलाएं व बच्चे, दुर्घटना में अथवा भूख प्यास और बीमारी की वजह से दम तोड़ देते हैं। कोई परिवार सामूहिक आत्महत्या करने पर विवश हो जाता है।शायद ब्रिटिश राज में पड़ने वाले महाकाल और भुखमरी के बाद भारत के कामगारों के लिए यह सबसे बड़ी त्रासदी है।

सवाल यह है कि क्या यह समस्या कोरोना महामारी की देन है अथवा पहले से ही समाज में मौजूद थी जिसे महामारी के कारण लगने वाले झटके ने जगजाहिर कर दिया। स्पष्ट है कि समस्या महामारी ने नहीं पैदा की। महामारी ने तो केवल उसे आंखों के सामने उजागर कर दिया। कह सकते हैं की यह स्थिति उस फोड़े से बहती हुई पीप जैसी है जिस के प्रारंभिक लक्षण आज से 5-6 वर्ष पूर्व किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के रूप में सामने आने लगे थे।

पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में भारत ने समाज वादी व्यवस्था का रास्ता छोड़कर उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण के पूंजीवादी मूल मंत्र अपना लिए। कहते हैं के इसके बाद से घरेलू सकल उत्पाद में बढ़त की दर लगातार बढ़ती चली गई। यही नहीं भारत के उद्यमी उद्योगपति व पूंजीपति विश्व के बड़े धनी लोगों की फ़ेहरिस्त में शामिल होते चले गए। देश ने और भी बहुत सारी प्रगति की जैसे बेहतर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, बाजार में अपनी साख बढ़त में व विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी इत्यादि में। 

प्रवासी कामगार

फिर इन सभी प्रकार की प्रगति का लाभ इन श्रमिकों तक क्यों नहीं पहुंचा? आखिर इनके लिए अपने कार्य स्थलों पर बने रहना इतना कठिन क्यों हो गया कि उनको घर पलायन करने के लिए इतने बड़े जोखिम उठाने पड़े? साथ ही यह भी पूछना पड़ेगा कि आखिर हम उनके इस स्थानांतरण के लिए उन्हें उचित साधन क्यों उपलब्ध नहीं करा पाए जबकि विदेशों से  लोगों की घर वापसी के लिए वंदे भारत कार्यक्रम के तहत हम उत्तम विमान सेवाओं पर लाखों लाख खर्च कर रहे हैं? या फिर जहां वह कार्य के संबंध में निवास कर रहे थे वही उनके उचित निवास व खाने-पीने की व्यवस्था लॉक डाउन के पीरियड में क्यों नहीं कर सके? क्या यह कामगार समाज के ऊपर बोझ है? क्या यह भी किसी प्रकार की ‘दीमक’ हैं जो दूसरों के पैदा की हुई चीजों पर पलते हों? यदि ऐसा है तो क्यों उन राज्यों की सरकारें तथा उद्योगपति पूंजीपति उद्यमी व ठेकेदार उनके चले जाने पर परेशान हैं और चाहते हैं कि उन्हें किसी प्रकार राज्य छोड़कर जाने से रोक लिया जाए? 

इस समस्या कई व्याख्याएं की जा रही हैं तथा की जाती रहेंगी। पर इस बीमारी को और इसके बुनियादी कारणों को समझने के लिए हमें अर्थव्यवस्था में पैसों की पैदाइश, तथा पैसों और धन के बीच की भिन्नता को समझना पड़ेगा। बहुधा लोग यह समझ लेते हैं कि पैसे ही धन है परंतु यह सत्य नहीं है। धन हम उन वस्तुओं तथा सेवाओं को कह सकते हैं जिनका हम उपयोग अथवा प्रयोग करते हैं, जैसे रोटी, कपड़ा और मकान व डॉक्टर, नाई, दर्जी इत्यादि की सेवाएं वगैरह। रुपए पैसे जिन्हें अर्थशास्त्र की भाषा में मुद्रा कहा जाता है तो मात्र धान को बाजार से खरीदने की शक्ति है। यह मुद्रा कोई भी सरकार तथा उसका केंद्रीय बैंक (जैसे कि अपने देश में भारतीय रिज़र्व बैंक) मिलकर सैद्धांतिक रूप से किसी भी मात्रा में जारी कर सकते हैं। जारी की गई मुद्रा सरकार द्वारा लिया गया एक कर्ज है। केंद्रीय बैंक तथा सरकार द्वारा जारी की गई यह मुद्रा जिस वर्ग के पास जितनी अधिक पहुंचेगी उस वर्ग की बाजार से असल धन यानी वस्तुएं तथा सेवाएं उठा लेने की क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाएगी। इसके विपरीत जिस तबके तक मुद्रा काम पहुंचेगी उसके पास से असल धन बाजार में खिंचता चला जाएगा चाहे उसने धन के सर्जन में कितना भी योगदान क्यों न दिया हो।

कीन्ज़ के सिद्धांतों पर आधारित आज की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सरकारें, उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए मांग में वृद्धि के उद्देश्य से, अधिक से अधिक संभव मात्रा में मुद्रा जारी करती हैं तथा इन्हें उद्यमियों तक पहुंचाने की कोशिश करती है तथा यह मानती हैं के नीचे की ओर रिसाव के कारण धन धीरे-धीरे बूंद बूंद टपक कर समाज की बिल्कुल निचली सतह तक भी पहुंच जाएगा, जैसा के जब वृक्षों पर वर्षा होती है तो वहां से टपकने वाली बूंदों से नीचे की घास भी भली-भांति सिंचित हो जाती है। इस अवधारणा को ट्रिकल डाउन इफेक्ट का नाम दिया गया है। 

यह अवधारणा पेड़ों पर होने वाली बारिश के लिए तो सत्य हो सकती है परंतु मुद्रा की पूंजीपति वर्ग पर होने वाली वर्षा के लिए कतई भी दुरूस्त नहीं है। इसके ठीक विपरीत मुद्रा की यह वर्षा असली धन को चूस कर ऊपर के धन संपन्न वर्गों तक पहुंचाने का काम करती है। अतः इस बारिश से ट्रिकल डाउन इफेक्ट के बदले धन सक्शन पंप इफेक्ट की अपेक्षा की जा सकती है। जिस प्रकार एक शक्तिशाली पंप निचले तल से पानी को खींचकर ऊपर के तल तक पहुंचा देता है उसी प्रकार धन संपन्न वर्गों के पास मुद्रा की अधिक तरलता निचले स्तर से वास्तविक धन को खींच कर ऊपर तबके में पहुंचा देती है। गंगा मैया पर्वतों की ऊंचाई से खाड़ी तक बहती हैं और रास्ते में हजारों वनों, उद्यानों तथा खेतों को जीवनदान देती जाती हैं परंतु धन की गंगा उलटी ही बहती है। ऐसा किस प्रकार होता है इसका बयान हम पहले ही कर चुके हैं। मुद्रा धन नहीं है। धन वह वस्तु एवं सेवाएं हैं जिनका हम उपयोग या प्रयोग करते हैं जैसे रोटी, कपड़ा मकान इत्यादि। मुद्रा इस वास्तविक धन के लिए केवल एक क्रय शक्ति है। यही कारण है की पिछली शताब्दी के अंतिम दशक के बाद से धीरे- धीरे देश में धनी और निर्धन लोगों के बीच की खाई कम होने के बजाय चौड़ी होती जा रही है। आज स्थिति यह है की सबसे धनी 1% लोगों के पास सबसे ग़रीब 70% जनता की तुलना में 4 गुना अधिक संसाधन एकत्रित हो चुके हैं।

कोरोना संकट से उत्पन्न होने वाली वर्तमान आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए केंद्रीय सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा आवंटित की है जो कि सकल घरेलू उत्पाद के 10% के बराबर बताई जा रही है। स्पष्ट है यह मुद्रा अर्थव्यवस्था के जिन भागों में पहुंचेगी तत्काल प्रभाव से वास्तविक धन भी उन्हीं वर्गों की ओर आकर्षित होगा। यदि इस मुद्रा का प्रमुख भाग प्रथम चरण में अति गरीब तबके तक पहुंचता है तो निश्चय ही गरीबों की समस्याओं का समाधान होगा। वह श्रमिक जो बड़े शहरों से अपने-अपने गांव की ओर लौट गए हैं सबसे पहली प्राथमिकता उन्हें गांव में ही रोजगार की उपलब्ध कराने की है। 

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90 के दशक तक सरकार की प्राथमिकता ग्रामीण तथा कुटीर व अति लघु उद्योगों को व साथ-साथ छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सब्सिडी के साथ बैंक लोन उपलब्ध कराने तथा तकनीकी जानकारी से लैस करने की थी। इसमें कोई शक नहीं है कि उस जमाने में आवंटित धन के कुछ बेईमान अधिकारियों व दलालों इत्यादि द्वारा लूट लिए जाने की शिकायतें आती रहती थी और यह कहा जाता है जितना धन निर्गत किया जाता था उसका एक छोटा सा भाग उन लोगों तक पहुंच पाता था जिनके लिए इसे जारी किया गया होता। कहा जाता था ऐसे ऋणों की वजह से ही बैंकों में एनपीए बढ़ रहे थे। पर यदि हम बाद की स्थिति का जायजा लें तो पता चलता है कि आज बैंकों के एनपीए में जितनी बढ़ोतरी कुछ एक बड़े धनी उद्योगपतियों के डिफॉल्ट के कारण हो चुकी है उतने कभी भी किसानों वाह छोटे उद्यमियों को दिए गए कुल कर्जे के डिफॉल्ट के कारण नहीं हुई थी।  

साथ ही सरकार को ‘सरकार का बिज़नेस, बिज़नेस करना नहीं है’ के कथन से थोड़ा अलग हटते हुए बिहार तथा उत्तर प्रदेश इत्यादि जैसे राज्यों में स्वयं अपने उद्योग लगाने की दोबारा शुरुआत करनी चाहिए जिन में प्राथमिकता के आधार पर लक्ष्य निर्धारित करते हुए घर लौटे प्रवासी श्रमिकों तथा विदेशों से लौटे तकनीकी लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जाए। ऐसा पब्लिक यूटिलिटी सेवाओं का अधिकाधिक विस्तार करके भी किया जा सकता है जैसे जगह-जगह बड़े पैमाने पर आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं तथा शिक्षण संस्थान बनाना।

यदि राहत की राशि ट्रिकल डाउन इफेक्ट की उम्मीद में केवल बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स व पूंजीपतियों तक पहुंचती रही तो इसका लंबे समय में असर उलटा ही पड़ेगा और यह राशि ट्रिकल डाउन के बजाय एक शक्तिशाली धन सक्शन पंप का कार्य करेगी। इसी प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लुभाना तो दुरुस्त है मगर उसके लिए अपने श्रमिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को रद्द कर दिया जाना अच्छा प्रभाव नहीं डालेगा। केंद्रीय तथा राज्य सरकारों को चाहिए कि ऐसे कदम उठाने से पहले इसके होने वाले दूरगामी परिणामों पर पुनः नजर डालें।

देश की आर्थिक उन्नति के लिए बापू ने एक अनमोल मंत्र दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें कोई भी कार्य करने से पहले यह सोचना चाहिए कि हम जो करने जा रहे हैं उसका लाभ भारत के सबसे गरीब नागरिक को क्या हो गा। समय आ गया है कि हम फिर से इस मूलमंत्र को गांठ बांधकर रख ले और अपने प्रत्येक कार्य की कसौटी इसे ही बनाएं।

महात्मा गांधी

पर आज तो हमने बापू के विचारों का आदर करना छोड़ दिया है और इसके विपरीत हम उनके हत्यारे के विचारों को महिमामंडित करने लगे हैं।

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1 मसूद, धन वितरण, बैंक तथा निर्धनता के विषय पर Tightening Noose of Poverty, Promise to Pay (Vol I): Banks, Battles and Bellies व Yes, I Am Guilty; and So Are You नामक पुस्तकों के अलावा अंग्रेजी, हिंदी व उर्दू में अनेकों लेख लिख चुके हैं।

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