चीन ने गलवान में अपने सैनिक मारे जाने की बात मानी

चीन
अनुपम तिवारी, रक्षा मामलों के विशेषज्ञ

15 जून को गलवान घाटी में भारतीय सेना से हुई झड़प में पहली बार आधिकारिक तौर पर चीन ने अपने सैनिकों के मारे जाने की बात स्वीकार की है।

कहा जा रहा है कि पिछले दिनों पूर्वी लद्दाख के मोलडो में हुई कमांडर लेवल की बैठक में चीन की तरफ से यह स्वीकार्यता आयी है। हालांकि हताहत सैनिकों की संख्या बताने के सवाल से वह अभी भी बचते हुए दिख रहा है।

संख्या पूछने पर सिर्फ यह कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपी खबरें, जिनमे कहा गया था कि PLA के एक कमांडिंग अफसर समेत 20 से अधिक जवान इस खूनी झड़प में मारे गए थे, सरासर झूठ है। हताहत सैनिकों की संख्या इसके आधे से भी कम है।

चीन अपने सैनिकों की मृत्यु छिपा रहा है

अब प्रश्न यह है कि चीन के इस आधिकारिक बयान के क्या मायने निकाले जाएं। क्या भारत की सेना झूठ बोल रही थी? जिसने बताया था कि कम से कम 40 चीनी सिपाही इस मुठभेड़ के शिकार हुए थे जिसमे भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 जवानों की शहादत हुई थी। या फिर गत दिनों कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया एजेंसीज में छपी खबरें झूठी हैं जिनमे 20 से ज्यादा चीनी सिपाहियों के मारे जाने की पुख्ता रिपोर्ट दी गयी थी। असल मे PLA का दावा ही खोखला है। वह अपने सैनिकों की मृत्यु के सवालों  पर बचता दिख रहा है और स्पष्ट उत्तर नही दे रहा है।

कमांडर स्तर की बैठक में क्या निकला?

पिछले सप्ताह हुई कमांडर स्तर की 6ठी बैठक के माहौल पर यदि गौर करें तो प्रथम दृष्टया यही लगता है कि बातचीत का एक बार फिर कोई नतीजा नही निकला। दोनों पक्षों की ओर से इस बात पर सहमति जताई गयी है कि अब और अधिक सैनिक सीमा पर नहीं भेजे जाएंगे। किंतु दोनों पक्ष अपनी मांगों पर अडिग हैं और झुकने को राजी नही दिखते।

भारत ने जहां पेंगोंग त्सो के दक्षिणी छोर पर अपनी ताजा बनाई गई सैन्य पोस्टों से हटने से साफ मना कर दिया है, वहीं PLA ने डिस-इंगेजमेंट की कार्रवाई से इनकार कर दिया है जिसपर भारत ने बहुत जोर दिया था।

जमीन पर स्थिति बराबर की है

फिलहाल पूर्वी लद्दाख में स्थिति विस्फोटक है। पेंगोंग त्सो के उत्तरी सिरे पर स्थित फिंगर इलाके पर चीनी सेना काबिज है, वहीं भारतीय सेना ने अति महत्वपूर्ण रेजांग ला और रेचिन ला पर अपना कब्जा जमाया हुआ है। चीन की साफ शर्त है कि वो गोगरा हॉट स्प्रिंग का इलाका भी तभी छोड़ेगा जब भारत हेलमेट टॉप और ब्लैक टॉप जैसी भौगोलिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण चोटियां अपने नियंत्रण से हटाएगा।

कुल मिलाकर स्थिति अभी बराबर की है। दोनों देश दबने को तैयार नही हैं और न ही लड़ने से घबरा रहे हैं। यह तो मानना ही पड़ेगा कि चीनी सेना भारत की ओर से इतने सशक्त उत्तर की उम्मीद नहीं कर रही थी।

भारत को सतर्क रहने की जरूरत

परंतु भारत को भी चीन के कठिन गणित को समझना होगा। पिछले कई वर्षों में अक्साई चिन से ले कर अरुणाचल प्रदेश के तटवर्ती इलाकों तक चीन ने जितनी तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है, वह अपनी सेना को बहुत तेजी से इन इलाकों में पहुचाने में सक्षम हो गया है।

भारत के लिए खतरा अरुणाचल या लद्दाख ही नही सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी है जिसके निकटवर्ती इलाकों में सरहद पार रेलवे ट्रैक बनाये जा चुके हैं। तिब्बत और शिनजियांग के सूबों में हान चीनियों को एक एजेंडा के तहत गत कई वर्षों से बसाया जा रहा था, ताकि भारत वहां के निवासियों का हितैषी होने का लाभ न लेने पाए।

सीमा विवाद से चीन को नुकसान

परंतु चीन के लिए अपनी इच्छा को पूर्ण करने इतना आसान भी नही है। वह अपने ही जाल में फसता दिख रहा है। उसकी मंशा वैश्विक सुपर पावर बनने की थी किंतु वह एक सीधी सी बात नही समझ पाया कि कोई भी सुपर पावर मुल्क अपने पड़ोस में किसी प्रकार का कोई बवाल नही करता। इससे ऊर्जा का अनावश्यक ह्रास होता है। पड़ोसियों के बीच असहमति होना स्वाभाविक है किंतु उनको सुलझाने के प्रयास होने चाहिए।

(लेखक वायु सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)

support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

one − one =

Related Articles

Back to top button