चरण सिंह की राजनीति के केंद्र में किसान ही रहा है

किसानों को समर्पित किसान नेता की जयंती

यशोदा श्रीवरस्तव

आखिर यह क्या हो रहा है जब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री व किसान नेता चौधरी चरण सिंह के जन्म दिन पर आज अपनी मांगो को लेकर दिल्ली बार्डर पर धरनारत किसानों को उपवास करने को विवश होना पड़ रहा है।

किसानों के धरना स्थल से बाहर,कई प्रदेशों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी इस दिन स्व.चरण सिंह को नमन करते हुए किसानों के समर्थन में उपवास व अन्य आयोजनों की घोषणा की है।

चौधरी चरण सिंह की राजनीति के केंद्र में किसान ही रहा है। उनका साफ कहना था कि जिस दिन किसान हमसे रूठ गया उसदिन समझो भगवान रूठ गया।

मात्र 27 साल की उम्र में वे किसान आंदोलन के रास्ते राजनीति में कूदे थे। तब किसानों का “अन्नदाता” जैसा छलकपट से लबरेज नामकरण नहीं हुआ था,वे सीधे सीधे किसान थे।वे क्या खाते हैं, कैसे अच्छे से रहते हैं, वे हट्ठे कट्ठे क्यों है, गाणियां उनके पास कैसे आ गई?

तब समृद्ध और संपन्न किसानों पर ऐसे सवाल नहीं उछाले जाते थे।किसानों की समृद्धि व संपन्नता चौधरी चरण सिंह का सपना था जिसपर आज संदेह किया जा रहा है।

याद होगा,पूर्व पीएम स्व.वीपी सिंह का किसान मंच के नाम से किसानों का बड़ा संगठन था। उनके निधन के बाद इसका नेतृत्व यूपी के विनोद सिंह के हाथ में है।यह संगठन गुमनाम हो गया था।

किसान आंदोलन ने इसे पुनर्जन्म दे दिया। संगठन बहुत तेजी के साथ विस्तारित होकर फिलहाल हिंदी भाषी प्रदेशों तक पंहुच गया।

 1937 में पहली बार विधायक चुने जाने से लेकर सन 67 तक वे यूपी सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री रहे लेकिन जर्बदस्त राजनीतिक सुर्खियों में वे तब आए जब  दल बदल कर तत्कालीन संविद सरकार के मुख्यमंत्री बने।

चौधरी चरण सिंह राजनीति में सिद्धांत के फार्मूले को कभी नहीं मानें।अपने राजनीतिक जीवनकाल में उन्होंने सात बार दल बदल की।उन्हें दलबदुलुओं का सरताज भी कहा जाता था।

हालाकि उनके समर्थक चौधरी के दलबदल को दलबदल नहीं मानते थे।उनका तर्क होता था कि चौधरी साहब ने जब जब दल बदला तब तब नए दल का सृजन किया,वह भी किसानों के हित में।

मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों के लिए किए गए उनके कई काम जनहित के रहे हैं। जैसे जमींदारी उन्मूलन तथा भूमिसुधार के कानूनों को लागू करवाने में उनकी भूमिका हमेशा याद की जाएगी। किसानों के मुद्दे पर वे समर्थन देना व समर्थन वापस लेने की प्रथा को वे बिलकुल गलत नहीं मानते थे।

23 दिसंबर 1902 को गाजियाबाद जिले के नूरपुर गांव में जन्में चौधरी चरण सिंह को एक तानाशाह राजनीतिक के रूप में भी देखा गया।

आज जो राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की बात होती है, चौधरी के लिए यह सब बहुत मायने नहीं रखते थे।उनकी पार्टी मेें वही होता था जो वह चाहते थे।

चौधरी की इच्छा के खिलाफ बोलने की पार्टी के नेताओं को इजाजत नहीं थी।पार्टी में किसी भी विषय पर उनके द्वारा दी गई राय अंतिम होती थी। उस पर बहस की कोई गुंजाइस नही थी।

यही वजह रही है कि उनके संपूर्ण राजनीतिक जीवन में उतार कम बुलंदियां ही ज्यादा रही है।उनकी इस कामयाबी के पीछे शायद एक बात यह रहीं हो कि उन्हें कुछ पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार करने आता था।

1967में यूपी में जब चंद्रभान गुप्त की सरकार बनी तब चौधरी उसमें शामिल नहीं हुए। उन्होंने ऐसी शर्त रखी जिसे  मानना आसान नहीं था। वे अपने तीन समर्थकों को मंत्रिमंडल में शामिल कराना चाहते थे।

चंद्रभान गुप्त ने इसे मानने से इनकार कर दिया। नतीजा गुप्त सरकार के गठन के ठीक 18 दिन बाद ही चैधरी ने अपने 16 विधायक और समाजवादी तथा जनसंघ के विधायकों को मिलाकर संयुक्त विधायक दल की स्थापना कर मुख्यमंत्री बन गए।

हालांकि समाजवादी तथा जनसंघ घटक के संयुक्त विधायकों के सहयोग से बनी विरोधियों की पहली सरकार मात्र 11 महीने में ही गिर तो गई , लेकिन चौधरी के मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा हो गया।ऐसी ही गणित के आधार पर वे प्रधान मंत्री भी बनें थे।

1977 में जब विधानसभा चुनाव के बाद राज्यों में सरकार गठन की बात आई तो चौधरी जनसंघ घटक के नेताओं से गुपचुप मिलकर तीन राज्यों में अपने मुख्यमंत्री बनवा लिए।

जनता पार्टी के केंद्र में बनने वाली सरकार में चौधरी की नजर गृहमंत्री के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी हुई थी। यहां  भी वे जनसंघ घटक के नेताओं को मिलाकर प्रधानमंत्री का ख्वाब देख रहे थे लेकिन जब बात नहीं बनी तो आरएसएस को सांप्रदायिक कराकर कर जनता पार्टी से अलग हो गए।

नतीजा मोरार जी की सरकार गिर गई। इधर मोरार जी की सरकार गिरी नहीं कि उधर इंदिरा जी के सर्मर्थन से चौधरी का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पूरा हो गया।हालांकि बतौर प्रधानमंत्री वे संसद का मुंह नहीं देख सके लेकिन उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पूरा हुआ।

चौधरी साहब अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे लेकिन उन्हें अंग्रेजियत से सख्त नफरत थी। उनकी खास आदत यह थी कि वे दुनिया भर के पत्र पत्रिकाओं में कृषि पर आधाररित लेख को बहुत चाव से पढ़ते थे।

कृषि अर्थव्यस्था पर उन्हें चुनौती देना संभव नही था।शायद यह भी एक वजह है जिसके नाते उन्हें किसान नेता के रूप में भी याद किया जाता है।

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