“चीन के उत्पादों” का देश में”बहिष्कार” :पर हम “चीनी-जहर”का सेवन क्यों कर रहे हैं?

—डा० राम श्रीवास्तव  

आजकल देश में चीन से बने उत्पादों के विरोध में चारों तरफ हो हल्ला हो रहा है । चीनी उत्पादों ने भारत के घर घर में इतरी गहरी पैठ करली है कि आज यह पहिचानना कठिन है ,कि कौनसी चीज चीन में बनी है , कौन सी भारत में बनी है । आज देश में ८०% सजाबटी फर्नीचर चीन से आता है ।भारतीय कम्पनियॉ उस पर अपना ठप्पा लगाकर ‘मेड इन इन्डिया’ करके बैंच रही हैं । गणेश उत्सव के समय गणेश जी की मूर्तियॉ हों या भगवान की आरती करते समय जलाने वाली अगरबत्ती हो ,आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि यह सब चीन से बन कर आ रही है ।और तो और सुई धागे तक खुले आम बाजार में चीन से बन कर आरहे हैं ।

पर दुख की पराकाष्टा तो उस समय होती है जब सरकार और प्रशासन की नाक के नीचे आम ,केले पपीता को जल्दी पकाने वाला जहरीला रसायन “इथीलीन-रायपर” के नाम से बिक रहा है , और आज हम सब लोग इसी “चीनी-जहर”से पके आम स्वाद ले लेकर चूस रहे हैं, केले छील छील कर खा रहे हैं । हम यह भूल जाते हैं कि जिस चीनी जहर से इन फलों को पकाया गया है, उसका जहर धीरे धीरे हमारे और हमारे बच्चों के खून में जमा होकर कुछ साल बाद लीवर और किड़नी को खराब कर देगा । खुद चीन में अगर इस “इथीलीन रायपर “ से कोई फलपकायेगा तो उसके फॉसी की सजा तक हो जाती है ।चीन के बाजारों में जो फल मिलते हैं वह बाकायदा फेक्टरियों मे वाश होकर स्वचालित और कम्प्यूटर नियन्त्रित मशीनों से केलकुलेटेड “इथीलीन”गैस में पकाये जा रहे हैं । भारत के बाजारों में फल पकाने के पाऊड़र के नाम से “जहरीला रसायन “ बैच रहा है ।

जबकि यही केला , जब सन १९७० में , मैंने नाश्ते के साथ , असीलामार केलीफोर्निया में पहिली बार देखा था ; तब मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि केला इतना भी बडा और स्वादिष्ट हो सकता है । वह केला हमारे देश में मिल रहे बडे केले से भी आकार में ढाई तीन गुना बडा होता है । क्यूबा देश का ,बडे आकार का , सिर्फ एक केला खा लीजिये ,आप को दिन भर भूंख नहीं लगेगी । आजकल जो केले अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया में मिल रहे हैं उन केलों को खेतों से सीधे बैंचने को नहीं भेजा जाता है । सबसे पहिले केले सहित , सभी फलों को “फेक्टरियों “ में भेजा जाता है । बहॉ पर इनको साफ पानी से धोया जाता है, जिससे उनके छिलके पर चिपके कीटनाशक दबाईयों के सूक्ष्म कण निकल जाये । फिर “पराबैगनी किरणों “ या “गामा रे “ के चेम्बरों से गुजारा जाता है । इन चेम्बर से निकलने के बाद ‘केला ‘ और सभी ‘फलों’ के भीतर छुपे बेक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं । जो केला दो दिन बाद ही काले छिटके पडकर गिलगिले होने लगते हैं , उनमें बेक्टीरिया होता है और इस कारण वह जल्दी ही सड़ जाते हैं । जबकि विदेशों से आयातित केले को खुला में रखने के बाद एक ढेड सप्ताह तक फल ताजा रहता है ।वह गिल गिला नहीं होता ,क्योंकि वह केला “बेक्टीरिया “ रहित होता है । सड़े गले केलों और दूसरे फलों पर छोटी छोटी मक्ख्खियॉ जिन्है “भिन भिनी” या “ फ्रूट फ्लाय “ कहते हैं, दूषित केलों और फलों के ऊपर उडने लगती हैं । यह हानिकारक होती हैं , इनसे कई बीमारियॉ फैलती हैं ।

हमारे प्यारे देश भारत में , सरकारी कानून तो एक से बढकर एक उम्दा किस्म के मौजूद हैं । पर यह कानून महज कानूनी किताबों की शोभा मात्र बढाते हैं । खाद्य अधिकारी या निरींक्षक महोदय सड़े गले फलों के ठेले पर जाकर , उन्है नष्ट करने के बजाय , दस बीस पचास रूपयों का नोट ठेलेवाले से लेकर आगे चले जाना बेहतर समझते हैं ।
की ।

यदि वैज्ञानिक नजर से देखा जाय तो हमें कौनसा केला या फल खाना चाहिये । इसका निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि अगर आप डायबिटीज यानि मधुमेह के मरीज हैं , तो आपको ज्यादा पकाहुआ केला या फल सावधानी पूर्वक खाना चाहिये । थोडा अधकच्चा फ्रूट खाना ज्यादा बेहतर रहेगा । क्योंकि केले जैसे फलों के गूदे में मौजूद “स्टार्च “ के ८०-९० % भाग में “कारबोहाइड्रेट “ होता है । जो प्राकृतिक रूप से पकने पर पेडों में मौजूद “प्लॉट हारमोन” अर्थात नेचरल “ईथीलीन “ नामक बायो कार्बनिक पदार्थ के कारण , फलों को पका कर , पूरे कारबोहाईड्रेट को “ फ्री शुगर “ में बदलकर , फलों को रसदार और मीठा कर देता है । इस कारण यदि आपको शुगर की बीमारी है तो अध कच्चा या कम पका केला या फल खाना चाहिये । यदि आपको खाना ठीक से हजम नहीं होता है, तथा आपको कुपच की बीमारी हो ,यानि गैस ज्यादा बनती हो , तो आपको पूरा पका हुआ केला या फल खाना चाहिये । यह बिना तकलीफ दिये आसानी से हजम हो जावेगा , आपको गैस से निजात पाने के लिये ‘पवन मुक्तासन ‘ नहीं करना पडेगा , और आपके पास बैठे किसी आदमी को अपनी नाक सिकोडकर आपकी ओर देखते हुए दूर जाने की आवंश्यकता भी नहीं होगी ।

हमारे देश में केला जैसे अन्य फलों को खाने के पहिले उसे खरीदते समय जरूरत से ज्यादा साबधानी बापरने की आवश्यकता महसूस नहीं की जाती है ।

हमारे भारत में तीन तरह के “केले “ और दूसरे पके हुए फल मिलते हैं –

1) “इथीलीन “ (कारबाईड )चेम्बर में पकाये गये फल।
2) “एसीटिलीन “गैस से पकाये गए फल ।
3) चीनी (जहर की पुडिया ) ईथीलिन-डाय-अमीन से पकाये गए फल।

भारत में सबसे ज्यादा फल तेलंगाना और महाराष्ट्र से हमारे यहॉ आरहे हैं । अकेले तेलंगाना मे तकरीबन ‘पचास लाख टन ‘ फलों का व्यापार एक साल में होता है । तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की हाईकोर्ट ने अपने एक ताजा निर्णय में चीनी-जहर की पुडिया “एसीटिलीन” गैस से फलों को पकाने के काम को खतरनाक आतंकी “WORSE THAN TERRORISTS” की संज्ञा दी है । सरकार को निर्देश दिये हैं कि उसे फलों को पकाने के लिये आधुनिकतम “इथीलिन” चेम्बर बनाने चाहिये । क्योंकि तीन साल पहिले तक हमारे देश में और छोटे शहरों में आज भी केले पकाने के लिये एक बन्द कोठरी में या बडी लोहे की सन्दूक में डाल से टूटे कच्चे केले और फल रख दिये जाते रहे हैं । उसमें थोडे से पानी मे “केल्शियम कारबाईड” नामक रसायन के दो तीन टुकडे डाल देते हैं । पानी से क्रिया करके केल्शियम कारबाईड पारदर्शी एसीटिलीन गैस बनाता है जिससे केले और दूसरे फल पक जाते हैं ।पर इस क्रिया को गैर कानूनी मानकर कानून में तीन साल की सजा और एक हजार रूपये का जुर्माना निर्धारित किया गया है । पर इस कानून के अन्तर्गत पूरे देश में १९५४ से लेकर आज तक एक भी अपराध दर्ज नहीं हुआ है ।

कारबाईड से एसीटिलीन गैस के साथ साथ “केल्शियम सायनामाइड” नामक जहरीला पदार्थ भी बनता है । कारबाईड पद्यति से पके फलों में केल्शियम सायनामाईड के अलाबा , सूक्ष्म मात्रा में शंखिया यानि ‘आर्सेनिक’ और ‘फास्फोरस ‘ की मौजूगगी भी पाई जाती है । यह सभी रासायनिक पदार्थ मानव शरीर पर “धीमे जहर” का काम करते हैं । कारबाईड से पके केबल दो केले या आधा सेवफल रोज अगर कोई खाता रहे तो छ: महिनों के भीतर ही सबसे पहिले उसके मुंह में छाले हो जावेंगे, चमडी पर ददोरे पडने लगेंगे, फिर चाहे जब पेचिस होने लगेगी, गैस बहुत बनने लगेगी।दो साल तक लगातार नियमित रूप से यदि कारबाईड से पके फलों को कोई खाता रहेगा, तो उसे कई प्रकार की एलर्जी, गठिया रोग, याददास्त की कमी, सुस्ती बने रहना, हृदय रोग, पक्षाघात ,केन्सर, मिर्गी आदि की बीमारी हो सकती है ।

फूड सेफ्टी (प्रोहिविजन एण्ड रेस्ट्रिक्सन आन सेल) रेग्युलेशन एक्ट 2011 में स्पष्ट लिखा है –
“No person shall sale or offer or expose for sale or have in his premises for the purpose of sale under any description fruits which has artificially ripenned by use of acetylene gas commonly known as calcium carbide.”

इस कानून के आधार पर तेलंगाना -आंध्रा हाईकोर्ट ने स्वंयभू चिन्ता व्यक्त करके केन्द्र और राज्य सरकारों को निर्दश दिये हैं , कि तत्काल कारबाईड से पकाये जाने फलों पर सख्त रोक लगाई जाये तथा तुरन्त “ईथीलीन चेम्बरों “का निर्माण करके सुरक्षित तरीकों से फल पकाने का इन्तजाम किया जाए !

पर सरकारों को तो हाईकोर्ट के आदेशों की कहॉ परबाह होती है ? जन हित के मामलों में सरकारें तो “ढाई दिनों में चलें अढाई कोस” के फार्मूले पर काम करने की आदि हैं ।लोग जहरीले फलों के कारण तडफ तडफ कर मरें या न मरें इनसे उनके चुनावी गणित में कोई फर्क नहीं पडता । म०प्र० में एक भी जगह एैसीटिलीन गैस चेम्बर से फलों को पकाने की व्यवस्था नहीं है । यही कारण है कि यदि सर्वेक्षण कराया जाए तो पता लग जायेगा केन्सर,हृदयरोग और लकबा के पीडित लोगों में ८० फीसदी से ज्यादा उन अभागे मरीजों की संख्या है, जो नियमित स्वस्थ रहने के लिये उपयोगी समझकर “कारबाईड” से पके हुए फल केला, आम,पपीता सेवफल ,तरबूज आदि फलों को पिछले कई सालों से सेवन कर रहे थे ।

कारबाईड से पकने वाले फलों का समाधान अभी निकला ही नहीं था कि ,चीन ने एक नई मुसीबत खडी करदी । इसकी बजह है ,चीन की कम्पनी FYK XIANFENG व्दारा मात्र दस डालर प्रति किलो के हिसाब से पूरी दुनिया में प्रतिबन्धित रसायन ETHYLENEDIAMINE नामक केमीकल को द्रव रूप में तथा सिलिकान जेली में इसे डुबोकर “पाऊच” बनाकर “Ethylene Fruits Riper के नाम से गैर कानूनी तरीके से भारत में बैंचना ।

अब जो पीले जर्द दिखने बाले केले या आम आपको बाजार में पूरे भारत में दिख रहे हैं उन सब फलों को मीठा और पीले अच्छे पके दिखाने के लिये एक प्लास्टिक की बाल्टी में भरे पानी में डुबोया जाता है । उस बाल्टी के पानी में एक चम्मच “ईथीलीनडायअमीन “ नामक रसायन का द्रव डाल दिया जाता है । बस कच्चे फलों को बाल्टी में डालिये हरे कच्चे केले बाहर निकलते ही पीले जर्द और अच्छे दिखने लगेगे । पर अगर आप इनके सूखने पर सूंघेंगे तो आपको हल्की अमोनिया जैसी गँध मिलेगी ।

इस लिये मेरी आप सबसे विनम्र प्रार्थना है कि केला हो पपीता सेवफल या कोई भी फल हो आप उसे सूंघकर जरूर देखें । अगर उसमें अमोनिया से मिलती जुलती कोई गंध आये तो गलती से न खरीदें । यह चीनी जहर या जहर के “पॉच “ से पकाया हुआ फल है ।

हम सबको सरकार से भी प्रार्थना करना चाहिये कि जन हित में “कारबाईड “ और “चीनी जहर” से पके फलों से हमें मुक्ति दिलाये ।

 

(The most commonly used chemical is called ethephon (2-chloroethyl phosphonic acid). It penetrates the fruit and decomposes ethylene. Another compound that is used regularly is calcium carbide, which produces acetylene, which is an analogue of ethylene. It is, however, fraught with several problems. It is explosive and studies have shown that it breaks down the organic composition of vitamins and other micronutrients. Besides, it changes only the skin colour: the fruit remains raw inside. Also, industrial-grade calcium carbide is often found contaminated with trace amounts of arsenic and phosphorus, which are toxic chemicals.
The symptoms of arsenic and phosphorous poisoning include vomiting, diarrhoea with/without blood, weakness, burning sensation in the chest and abdomen, thirst, the problem in swallowing, burning of eyes, permanent eye damage, ulcers on the skin, mouth, nose and throat.
Other symptoms include throat sores, cough, wheezing and shortness of breath. Consumption of artificially ripened mangoes can upset stomach. It damages the mucosal tissue in the stomach and disrupts the intestinal function. If a person is exposed to the chemicals for a long time, they can cause peptic ulcers.
According to studies, calcium carbide can also affect the neurological system by inducing prolonged hypoxia. It causes symptoms like headache, dizziness, high sleepiness, memory loss, cerebral oedema, numbness in the legs and hands, general weakness, cold and damp skin, low blood pressure and seizure. Pregnant women particularly need to be very careful and should not consume such fruits and vegetables.
The Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) has banned calcium carbide under the Prevention of Food Adulteration (PFA) Act, 1954. Anyone using it can be imprisoned for three years along with a fine of ₹ 1,000. However, no effective action plan has been devised to implement it.)

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