सब्जी बेचकर जीने को मजबूर है झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा की पड़पोती

भगवान ​कहने मात्र से नहीं होता, भगवान को उनका सम्मान भी देना होता है. भगवान बिरसा मुंडा को यह सम्मान तभी मिल पायेगा, जब हम उनके ​वंशजों को उनका उचित सम्मान दे पायेंगे.

उन्हें धरती ‘आबा’ कहें या झारखंड के भगवान, जो भी कहें, समझने वाले सहज ही समझ जाएंगे कि आप भगवान बिरसा मुंडा की बात कर रहे हैं. उस पर अगर आप झारखंड में ही हों, फिर तो किसी के साथ आपको उनकी बातें करने से पहले सोचना भी न पड़े शायद! लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनके ही परिवार से जुड़ीं उनकी पड़पोती खुद को उनका वंशज बताते हुए शर्म महसूस करती हैं! जी हां, वाकई यह हम सभी के लिये शर्मनाक है और दुखद भी कि जिस महान इंसान ने अपनी जान की फिक्र किये बगैर जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, उनके वंशज आज दो वक्त की रोटी कमाने के लिए भी जगह जगह भटक रहे हैं, पर उनकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं है.

मीडिया स्वराज डेस्क

उलिहातू. झारखंड के भगवान का घर. भगवान बिरसा मुंडा का अपना गांव. यहां से कुछ ही दूर स्थित अपने खेत से सब्जी तोड़कर नजदीक की सब्जी मंडी में उसे बेचकर लौटकर आती वह युवती कोई और नहीं, धरती आबा बिरसा मुंडा की पड़पोती जानी मुंडा है.

सब्जी बेचकर घर परिवार और अपना पेट पालने वाली इस युवती जानी मुंडा के करीब पहुंचकर जब आप उनसे पूछेंगे कि क्या वे बिरसा मुंडा की वंशज हैं? तो गर्व के बजाय उनकी आंखों में शर्म देख आप खुद नतमस्तक हो जाएंगे. और हों भी क्यों न, भगवान के बच्चे भी अगर दाने दाने को मजबूर हों तो फिर और लोग अपना पेट कैसे भर पाते होंगे भला! कैसे उन्हें नींद आती होगी, जब उन्हें अपने भगवना के बच्चे ही भूखे दिख जाते होंगे! बेशक यह बात हमें सोचने को मजबूर करती है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं!!

बिरसा मुंडा की जन्मस्थली से मात्र 200 मीटर की दूरी पर रहती हैं बिरसा मुंडा की परपोती जानी मुंडा. वे और उनकी भाभी गांगी मुंडा अपने खेत में सब्जियां उगाती हैं. जानी मुंडा बताती हैं कि जीवनयापन के लिए हमलोग सब्जी की फसल लगाते हैं, ताकि इतनी आमदनी हो जाए, जिससे हमारी पढ़ाई के खर्च के साथ-साथ घर का खर्च भी निकल सके.

खेत से निकलकर उनके घर के रास्ते में पड़ता है वो कुंआ, जहां से वे खाना पकाने और पीने के लिए पानी ले जाती हैं. बरसात में कुंअे का पानी ऊपर आ जाता है और यह पानी साफ भी नहीं है. मजबूरी में वे इसी कुंअे का पानी पीने को विवश हैं. कई बार गंदा पानी ​पीने की वजह से उनकी तबीयत भी खराब हो जाती है.

खेत से निकलकर उनके घर के रास्ते में पड़ता है वो कुंआ, जहां से वे खाना पकाने और पीने के लिए पानी ले जाती हैं. बरसात में कुंअे का पानी ऊपर आ जाता है और यह पानी साफ भी नहीं है. मजबूरी में वे इसी कुंअे का पानी पीने को विवश हैं. कई बार गंदा पानी ​पीने की वजह से उनकी तबीयत भी खराब हो जाती है.

बीते 15 नवंबर को भगवान बिरसा का जन्मदिन था. देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते हुए महज साढ़े चौबीस साल की उम्र में भगवान बिरसा ने रांची जेल में अपनी जान दे दी थी. अंग्रेजों ने उन्हें जहर देकर मार दिया गया था. ऐसे वीर सपूत के परिजन आज सम्मानजनक जिंदगी जीने की जंग लड़ रहे हैं. खुद भगवान बिरसा को भी केवल उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर या फिर चुनाव के वक्त याद किया जाता है, फिर सभी उन्हें भुला देते हैं. ऐसे में अगर उनके वंशजों की हालत आज दयनीय है तो भला इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है?

सच ही तो है. झारखंड के लोगों के बीच बिरसा मुंडा का नाम बड़े आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है. झारखंड के तमाम नेता, चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हों, बिरसा मुंडा के नाम को नजरअंदाज कर झारखंड की राजनीति में अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते. बिरसा मुंडा के नाम पर झारखंड में लोगों की मदद के लिए या झारखंड के विकास के लिए कई योजनाएं हैं. लेकिन यह बेहद आश्चर्य की बात है कि इन योजनाओं का लाभ आज तक बिरसा मुंडा के परिवार तक नहीं पहुंच पाया. बिरसा मुंडा का परिवार आज भी महज जीवन बसर के लिए संघर्ष कर रहा है.

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दुख इस बात का है कि बिरसा मुंडा की परपोती ने कुछ महीनों पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुला खत लिखकर मदद की गुहार भी लगाई थी ताकि उन्हें कम से कम कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ तो नसीब हो सके. लेकिन यह बता पाना मुश्किल है कि उन्हें अब तक एक भी सरकारी योजना का लाभ मिल पाया या नहीं?

दुख इस बात का है कि बिरसा मुंडा की परपोती ने कुछ महीनों पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुला खत लिखकर मदद की गुहार भी लगाई थी ताकि उन्हें कम से कम कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ तो नसीब हो सके. लेकिन यह बता पाना मुश्किल है कि उन्हें अब तक एक भी सरकारी योजना का लाभ मिल पाया या नहीं?

बता दें कि राज्य के जनजातियाें काे घर देने के लिए पीएम आवास याेजना की तर्ज पर झारखंड सरकार की ओर से बिरसा आवास याेजना चलाई जा रही है, लेकिन दुख की बात यह है कि झारखंड के भगवान बिरसा के परिवार काे ही इसका लाभ नहीं मिल रहा. यही नहीं, ​​​​​​​एससी-एसटी बच्चाें की पढ़ाई के लिए केंद्र और राज्य सरकार छात्रवृत्ति याेजना भी चला रही है, लेकिन बिरसा की पड़पोती को ही उस छात्रवृत्ति का लाभ नहीं मिल पाया है, जिससे उसे आगे की पढ़ाई करने में सहूलियत हो पाती.

इसके अलावा बिरसा हरित ग्राम याेजना ​​के तहत एससी-एसटी अपनी जमीन पर पाैधे लगा सकते हैं, जिससे उन्हें राेजगार मिलता है. इसमें उन परिवारों को चुना जाता है, जिनकी आजीविका खेती पर आश्रित है. हालांकि, बिरसा के परिवार की जमीन पर पौधे भी नहीं लग पाए हैं. अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि ​भगवान सिर्फ कहने के लिए नहीं कहा जाता, भगवान मानकर उन्हें वैसा ही सम्मान भी देना होता है. वरना उसका कोई फायदा नहीं.

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