रॉ प्रमुख के बाद थलसेना प्रमुख के काठमांडू दौरे का बड़ा संदेश

रॉ प्रमुख
यशोदा श्रीवास्तव, नेपाल मामलों के विशेषज्ञ

काठमांडू। काठमांडू मे रॉ प्रमुख के बाद सेना प्रमुख के आगमन के पीछे बड़ा संदेश है। सेना प्रमुख तीन नवंबर को काठमांडू आ सकते हैं।

रॉ प्रमुख सामंत कुमार गोयल का नौ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ चार्टेड विमान से आने का मकसद केवल पीएम ओली से मिलना भर नहीं था।

जिस आनन-फानन में नेपाल विदेश विभाग को इस कूटनीतिक मीटिंग के लिए हवाई यात्रा का विशेष इंतजाम करना पड़ा था उसका निहितार्थ और संदेश निस्संदेह बड़ा था।

रॉ प्रमुख सामंत कुमार गोयल 21 अक्टूबर को काठमांडू आए थे। शाम को वे पीएम ओली से उनके सरकारी आवास पर मिलने गए। दोनों की मुलाकात में लिंपियाधुरा,  लिपुलेख और कालापानी मुद्दे पर बात हुई।

रॉ प्रमुख ने ओली से साफ कहा कि भारत नेपाल संबंधों के बीच किसी तीसरे देश का हस्तक्षेप मान्य नहीं है। भारत हमेशा किसी भी विवादित मुद्दे पर नेपाल से वार्ता का पक्षधर रहा है। हम अपने इस वसूल पर कायम है।

भारतीय रॉ प्रमुख और पीएम ओली के बीच यह बातचीत आन द रिकार्ड है।

आफ द रिकार्ड रॉ प्रमुख की तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों प्रचंड, नेपाली कांग्रेस के शेरबहादुर देउबा और माधव कुमार नेपाल से मुलाकात की भी खबर है।

लेकिन शुक्रवार को नेपाल मीडिया में आई इस खबर का तीनों पूर्व प्रधानमंत्रियों ने खंडन करते हुए इसे भ्रामक बता दिया है।

मुलाकात नहीं हुई या यह गोपनीय मुलाकात थी,काठमांडू के राजनीतिक गलियारों में यह अलग से चर्चा का विषय बन गया।

नेपाल इस समय चीन के नजदीक इतना है कि पीएम ओली पर नेपाल के चीनीकरण का आरोप भी लगने लगा है। इसी के साथ नेपाल में भारत विरोध को भी सरकार के स्तर पर शह मिल रहा है।

पहले दोनों देशों के बीच सरकार सरकार के बीच मतभेदों का असर एक दूसरे देश के नागरिकों पर नही दिखता था लेकिन इधर नेपाल में भारतीयों के साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार जैसी घटना चरम पर है।

यह तब है जब रोजगार के लिए नेपाल के पहाड़ी युवक व युवतियों की भारत पहली पसंद है। वे भारतीय फिल्मों और भारतीय गीतों के दीवाने हैं।

कहना न होगा कि ओली के पीएम बनने के बाद नेपाल में भारतीयों के प्रति नफरत की धार और तेज हुई है।

हैरत है पूर्व पीएम प्रचंड की छवि कट्टर भारत विरोध की रही है।राजशाही खत्म होने के बाद हुए पहले चुनाव में पीएम बनते ही प्रचंड ने अपनी पहली विदेश यात्रा में चीन को तरजीह देकर भारत को चौंकाया था।

लेकिन भारत को लेकर इधर उनकी छवि बेहद संतुलित है।वे चीन के विरोधी नही हैं लेकिन भारत को इग्नोर कर चीन को जरूरत से ज्यादा तरजीह के पक्ष में भी नहीं हैं। हाल में कई मौकों पर उनके बयानों से ऐसा पता चलता है।

काठमांडू में रॉ के अपने मजबूत सूत्र हैं। जाहिर है रॉ प्रमुख को नेपाल में चीनी प्रभाव ओर उसकी गतिविधियों की जानकारी जुटाना भी मकसद था। दुनिया के कई देशों ने अपने यहां चीनी प्रचार प्रसार के लिए चल रहे केंद्रों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है जबकि नेपाल में काठमांडू से लेकर तराई तक फैले चीनी भाषा के लर्निंग सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं।

रॉ प्रमुख ने इसकी भी नोटिस ली होगी। रॉ प्रमुख ने इसके पहले जुलाई 2019 में भी काठमांडू आकर उच्चस्तरीय बैठक की थी।

रॉ प्रमुख के जाने के कुछ ही अंतराल में सेना थल प्रमुख एम एम नरावणे का काठमांडू की प्रस्तावित यात्रा का मकसद भी दोनों देशों के बीच गलतफहमियां दूर करना है।

साथ ही भारत नेपाल सीमा पर नेपाल द्वारा सुरक्षा चौकियों के विस्तार का भी एक मुद्दा है। खुली नेपाल सीमा की सुरक्षा दोनों देशों की जरूरत है।

नेपाल सीमा पर भारत की ओर से सेना की तैनाती का प्रस्ताव भी है। मुमकिन है दोनों देशों के सेनाध्यक्षों के बीच इस पर भी चर्चा हो। भारतीय थल सेनाध्यक्ष की पीएम ओली से भी मुलाकात तय है।

नेपाल सरकार भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा मनोकामना मार्ग के उद्घाटन को लेकर नाराज है। भारतीय थलसेना प्रमुख का भी प्रयास नेपाल द्वारा पाले गए इस गलतफहमी को दूर करना होगा।

दोनों देशों के सेनाध्यक्षों के बीच सुरक्षा को लेकर अन्य भी कई विषयों पर बातचीत संभव है। नेपाल सरकार की ओर से भारतीय थलसेना प्रमुख को महारथी सम्मान से नवाजा जाएगा।

भारत नेपाल संबंधो पर नजर रखने वाले नेपाली टीकाकार कहते हैं कि भारत की ओर से दो प्रमुख स्तंभो के प्रमुखों को काठमांडू भेजा जाना, दोनों देशों के बीच हर स्तर की गलतफहमियां को दूरकर संबंधों की मधुरता बनाए रखने के लिए यह सराहनीय प्रयास है।

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