शादी : ज़मीन-आसमान का अंतर

सात फेरों की सात विषमतायें - भाग 2

महेश चंद्र द्विवेदी,

पूर्व पुलिस महा निदेशक, उत्तर प्रदेश 

2. मुझे दूध के ऊपर पड़ी मलाई का स्वाद बहुत पसंद है, जब कि मेरी पत्नी दूध ही बहुत कम पीतीं हैं और मलाई तो जैसे उनकी जीभ को काटती है। गांव में रात्रि भोजन के उपरांत जब उन्हें मलाईदार दूध पीने को दिया गया था, तो दांतों को पूरी तरह बंद कर थोड़ा-थोड़ा मलाईरहित दूध ही पी सकी थीं। प्याज़ व घी में भुने लहसुन से मेरी क्षुधा में वृद्धि होती है और पत्नी को उनकी महक बरदाश्त नहीं है। मुझे खटमिट्ठे फल और पेय स्वादिष्ट लगते हैं, जब कि पत्नी को ज़रा भी खट्टी चीज़ बहुत ज़्यादा खट्टी लगती है। 

            घर में शाकाहारी रहते हुए भी मैं बाहर उपलब्ध होने पर मांसाहार कर लेता हूं, जब कि पत्नी को मांस देखने भर से जी मिचलाने लगता है। प्रारम्भ में तो उनको मांस से इतनी अरुचि थी कि कभी-कभी मुझे खाते देखकर वह कांप जातीं थीं और घबराहट में कह बैठतीं थीं कि यदि विवाह पूर्व उन्हें मेरे मांसाहारी होने का पता होता, तो वह कदापि मुझसे विवाह न करतीं। तब मैं हंसकर उत्तर दे देता था कि अपने को कुंवारा रह जाने से बचाने के लिये ही मैने यह बात ज़ाहिर नहीं होने दी थी। मैं स्मोकर नहीं हूं, परंतु मित्रमंडली में एक-दो सिगरेट फूंक जाता हूं। पत्नी को सिगरेट के धुयें की महक बिलकुल बरदाश्त नहीं है। यही हालत मद्यपान के विषय में है। मुझे यदाकदा पीकर मज़ा आता है और मेरी पत्नी को मेरे मज़े के अनुपात में चिढ़ होती है। विवाह के बाद वर्षों तक उनका अडिग मत रहा था कि पीने वाले छटे गुंडे होते हैं (नहीं तो भविष्य में हो जाते हैं)।   

           3. मेरी पत्नी के छींक लेने और मेरे छींक लेने में भी बड़ा अंतर  है। वह अपने को इतना नियंत्रित कर के छींक लेती हैं कि पास में बैठा आदमी मुश्किल से समझ पाता है कि उन्होंने छींक ली है या हल्के से एक बार भर्त्सिका प्राणायाम कर लिया है। और मुझे तो सिंगिल छींक कभी आती ही नहीं है, हमेशा डबल आती है; और जब छींक आती है, तब इतनी ज़ोर से आती है कि पास में बैठा व्यक्ति अक्सर उछल पड़ता है। मेरे छींकने के बाद पत्नी अक्सर मुस्कराते हुए छत को देखते हुए कहतीं हैं, “देखती हूं दरार कहां आई है”। अन्य समस्त प्रकार के उत्सर्जनों की ध्वनि की बुलंदी में भी हम दोनो में ज़मीन-आसमान का अंतर रहता है। यह अंतर उत्सर्जन तक ही सीमित नहीं है। प्रातः मैं पत्नी से पहले उठकर वाश-रूम में मंजन-कुल्ला करता हूं और पत्नी मेरे निकलने के बाद मंजन-कुल्ला, आदि को जातीं हैं। मैं जब बाश-रूम से बाहर आता हूं तब तक उसमें इतना पानी फैल चुका होता है कि वह अक्सर तंज़ कस देती हैं- “बना दिया स्विमिंग-पूल?”। उनका तंज़ अकारण नहीं होता है क्योंकि उनके मंजन-कुल्ला करने के बाद मुश्किल से दो-चार बूंद पानी ही छितराया मिलता है। जब मैं अपने किसी विदेशी मित्र के यहां होता हूं, तो पानी फैलाने की मेरी इस आदत पर मेरे मेज़बान भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं, परंतु सौजन्यवश चुप रह जाते हैं। तब मेरी पत्नी चुपचाप वाश-रूम में घुसकर पानी के ‘पूल’ को साफ़ कर देती हैं।

 4. मेरी पत्नी सदैव बहुत सादा कपड़े पहिनती हैं और शादी-विवाह तक में ज़ेवर नहीं पहिनती हैं। एक बार हम दोनो अपने एक व्यापारी मित्र के यहां विवाह में गये थे। विवाह समारोह में जाने को तैयार मेरी पत्नी को ज़ेवर के नाम पर केवल एक ज़ंजीर पहने देखकर मेरे मित्र की पत्नी को शौक लगा था और वह तुरंत ढेर सारा ज़ेवर मेरी पत्नी को पहिनाने हेतु निकाल लाईं थीं। परंतु उन्हें तब बड़ी निराशा हुई थी, जब मेरी पत्नी ने उनमें से एक भी नहीं पहिना था। यद्यपि मेरी पत्नी मंहगे और फैशनेबिल कपड़े पहिनती नहीं हैं परंतु उनको अच्छे और मैचिंग कपड़ों का अच्छा ज्ञान है और ग़लत रंगों के कपड़े पहिनने पर वह मुझे टोककर सही मैचिंग कपड़ा पहिना देतीं हैं। मुझे मैचिंग कपड़े पहिचानना तो दूर की बात है, रंगों तक की सही पहचान नहीं है। मैं अक्सर हरे को नीला और नीले को हरा बता देता हूं और वह मेरे इस रंग-अज्ञान पर खूब हंसतीं हैं। 

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