स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव : आत्म चिंतन समय का आह्वान

Hridaynarayan dikshit
हृदयनारायण दीक्षित

संप्रति भारत ब्रिटिश सत्ता से स्वतंत्र होने के 75 वर्ष का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह 75 वर्ष महत्वपूर्ण है। स्वाधीनता प्राप्ति के पहले का इतिहास पौरूष पराक्रम स्मरणीय है। इसके बीज भारत की सनातन संस्कृति में है। पूर्वजों ने इस बीज का सतत् पोषण किया है। बीज से पौध और पौध से फल तक श्रम कौशल वरेण्य है। इसी पौरूष पराक्रम का अमृतफल है स्वाधीनता।

भारत एक सतत् उत्सव हैं। दिव्य अनुभूति, यथार्थ प्रतीति। सो आनन्ददायी महोत्सव।

भारत आनन्द क्षेत्र है, लेकिन यहां एक के बाद एक विदेशी आक्रमण होते रहे। कुछेक विद्वतजन प्रश्न करते रहे हैं कि भारत बार-बार पराधीन क्यों हो जाता है। यूरोप और यूरोपीय विचार के समर्थक कहते रहे कि भारत के लोग स्वतंत्रप्रिय नहीं हैं, इसलिए विदेशी हमलो के सामने पराजित होते रहे हैं। लेकिन यह धारणा सही नहीं है। बंकिमचन्द्र ने भी इस धारणा का प्रतिकार किया है। उनका प्रश्न है कि अंग्रेजों ने भारत पर अपना राज्य कैसे कायम किया। भारतवासियों के एक वर्ग ने अंग्रेजों की मदद की, अंग्रेजो की देशी सेना में भारतवासी भी थे। यहां होने वाले सभी विदेशी हमलो के प्रतिरोध का भी इतिहास है। अमृत महोत्सव इतिहास के प्रश्नों पर आत्म विवेचना का समय है।
यूरोपीय दृष्टिकोण वाले इतिहास लेखकों ने भारतीय जनता की स्वतंत्रप्रिय होने की अभिलाषा की भी उपेक्षा की है। सही बात यह है कि भारत ने प्रत्येक आक्रमण का प्रतिकार किया। ग्रीक लोग शर्त्द्रुह का अतिक्रमण करने में सफल नहीं हुए। चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा इन्हें भारत भूमि से खदेड़ा गया था। सिकन्दर ने अनेक देश जीते थे, लेकिन यूनानी लेखकों ने भारतीय पराक्रम की प्रशंसा की है।

अरबों, तुर्को और पठानों के हमलो के बाद लगभग 600 वर्ष की स्वाधीनता प्रश्नवाचक रही। 15वीं सदी तक आर्यों ने सभी आक्रमणकारियों का लगातार मुकाबला किया। यह आत्म गौरव का तथ्य है। ऐसे दीर्घकालीन जनप्रतिरोधों की ओर भी ध्यान देना चाहिए।

बंकिमचन्द्र ने लिखा है, “अरब लोग एक प्रकार के दिग्विजयी रहें। जिस देश पर उन्होंने आक्रमण किया, उस देश पर तत्काल विजय प्राप्त की। वे केवल दो देशों से पराजित होकर वापस लौटे हैं-पश्चिम में फ्रांस से और पूर्व में भारतवर्ष से।

मोहम्मद की मृत्यु के 6 वर्षों के भीतर उन्होंने मिस्र और सीरिया को, 10 वर्षों के भीतर परसिया (अर्थात् ईरान), को एक वर्ष के भीतर, अफ्रीका और स्पेन को, 80 वर्षों के भीतर काबुल को, 8 वर्षों के भीतर तुर्किस्तान को सम्पूर्ण रूप से अधिकृत कर लिया था।

लेकिन 300 वर्षों तक भरत विजय के लिए यत्न करने के बावजूद वे भारत को हस्तगत नहीं कर पाये। मोहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध को अधिकृत अवश्य किया था लेकिन राजपूतों के हाथों पराजित होकर वह खदेड़ दिया गया था और उसकी मृत्यु के कुछ ही दिन बाद सिन्ध पर राजपूतो ने पुनः अपना अधिकार जमा लिया था। अरबों द्वारा भारत विजय संभव न हुई थी।” यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है।


भारत को एक राष्ट्र न मानने वाले कहते रहे कि भारत को अंग्रेजों ने राष्ट्र बनाया। सच यह है कि भारत दुनिया का प्राचीनतम राष्ट्र है। अथर्ववेद (12.1.45) में तत्कालीन समाज व राष्ट्र का सुंदर वर्णन है, ’’अनेक आस्थाओं व भाषाओं वाले लोग एक परिवार की तरह यहां रहते हैं।’’ महाभारत (भीष्म पर्व) में कहते हैं, ’’भारत में आर्य, किरात सिद्ध, वैदेह, ताम्र लिप्तक म्लेच्छ, द्रविण केरल मूषिक वनवासिक आदि रहते हैं। वे विशाल गंगा सिंधु सरस्वती नदियों का जल पीते हैं।’’ यहां जनसमूहो के नाम अलग हैं। लेकिन अन्न जल एक है। मार्क्सवादी चिंतक डॉ0 रामविलास शर्मा ने ‘भारतीय नवजागरण और यूरोप’ में लिखा है। “अथर्ववेद और महाभारत में अनेक जातियों के राष्ट्र का जैसा वर्णन है, वैसा अन्यत्र नहीं है। इसलिए राष्ट्र निर्माण के लिए भारत को विश्व का मार्गदर्शक मानना चाहिए।’’ यहां प्रकृति के प्रपंचों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासा थी। सो विविध आयामी दर्शन का जन्म हुआ।
भारत सनातन है। सदा से है। दुनिया के अन्य देशों को राष्ट्र राज्य कहने का चलन यूरोप के पुनर्जागरणकाल में हुआ। लेकिन भारत हजारों साल प्राचीन अनुभूति है। यहां राष्ट्र की अनुभूति ऋग्वेद के रचनाकाल से भी पुरानी है। 1942 का आन्दोलन ब्रिटिश सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बना था। इसके पूर्व गांधी जी के नेतृत्व में लगातार अन अभियान चले थे। अन्य तमाम संगठन भी सक्रिय थे।

1920-30 के मध्य तमाम क्रांतिकारी गतिविधियां थी। भारत का वातावरण अग्नि धर्मा था। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि का पराक्रम स्तुत्य है और नेताजी सुभाष चन्द्र का भी। लाखो लोग प्राणों की आहुति देने के लिए तत्पर थे। भारत स्वाधीन हुआ। कुछ विदेशी विद्वान 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सिपाहीवार कहते रहे हैं। 1857 का संग्राम भारतीय इतिहास का स्मणीय अध्याय है।

जनरल हे मैक्डोवल ने 1857 के संग्राम के पहले भारतीय जनता की मनोदशा के बारे में लिखा था कि ’’विदेशी आक्रमण और आंतरिक विद्रोह से ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश आम जनता की बातचीत का चर्चित विषय है।’’ तमाम अंग्रेज विद्वानों ने उस समय की स्वाधीनता की मनोदशा का विवरण दिया है। 1855-56 में संथालों का विद्रोह राष्ट्रव्यापी चर्चा में आया था। 1820 में विद्रोह हुआ था, 1839 में कोली लोगों ने विद्रोह किया। अवध मे ंवजीर अली का विद्रोह हुआ था। इस तरह 1857 का स्वाधीनता संग्राम भारत के मन में स्वाधीनता की अलख जगाने में कामयाब हुआ।
भारत प्राचीन काल से ही स्वतंत्रता प्रिय है। यहां प्राचीन काल से ही दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण साथ साथ विकसित हुए हैं। भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। अजेय राष्ट्र हमारा प्रिय है। आजादी का अमृत महोत्सव आनंददाता है। भारत का मन सांस्कृतिक है। विवेकानन्द ने भारतीय दर्शन को सारी दुनिया में पहुंचाया था। दयानन्द लोक जागरण में लगे थे। प्राचीन साहित्य में उपनिषद दर्शन की अपनी भूमिका रही है। महाकाव्य काल में महाभारत और रामायण में भारत का मन गढ़ा।

कंबन सुब्रम्णय भारती आदि दक्षिण भारतीय विद्वानों ने सांस्कृतिक तत्व को मजबूत किया था। भारत सांस्कृतिक राष्ट्र है। भक्ति आंदोलन भी निराशा से आशा में ले जाने वाला सांस्कृतिक कर्म था। अमृत महोत्सव के अवसर पर बहुत कुछ गर्व करने लायक है। दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। दर्शन और ज्ञान विज्ञान में भी उपलब्धियां है। जीवन के सभी आयामों में भी भारत की प्रतिष्ठा है। योग और ऋग्वेद को यूनेस्को ने मान्यता दी है। गरीबी से निर्णायक संघर्ष है।

हम सबको भारत के दीर्घकालिक इतिहास पर ध्यान देना चाहिए। इतिहास बोध जरूरी है। यह इतिहास बोध ही भारत को प्रत्येक स्तर पर अपराजय और रिद्धि सिद्धि से परिपूर्ण राष्ट्र बना सकता है। आत्म चिंतन समय का आह्वान है। सचेत जागरण से भारत प्रसादपूर्ण होगा।

श्री हृदयनारायण दीक्षित उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष हैं.

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