अमृत जीवन

आज का विनोबा विचार ब्रह्दारण्योपनिषद अंश पुरानी कथा है

आज का विनोबा विचार ब्रह्दारण्योपनिषद अंश पुरानी कथा है ।

याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं। एक थी सामान्य, संसार में आसक्त और दूसरी थी विवेकशील। उसका नाम मैत्रेयी था । याज्ञवल्क्य को लगा, अब घर छोड़कर आत्मचिंतन के लिए बाहर निकलना चाहिए। जाने के पहले उन्होंने दोनों पत्नियों को बुलाया और कहा , अब मैं घर छोड़कर बाहर जा रहा हूं । जाने के पहले जो कुछ भी संपत्ति है वह आप दोनों के बीच बांट देता हूं।

तब मैत्रेयी ने पूछा क्या उस संपत्ति से अमृत जीवन प्राप्त होगा? याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया नहीं वित्तबल से अमृतत्व की आशा रखना व्यर्थ है ।

अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन उससे तो मात्र श्रीमंतों के जैसा जीवन होगा। वह तो मृत जीवन है। अमृत जीवन की इच्छा है तो आत्मा के व्यापकता की अनुभूति लो। सबसे एक हो जाओ।

लोग पैसा संग्रह करते हैं, तो अंदर की चीजें नहीं देख पाते। अंदर जितना आनंद है, वह नहीं पहचानते । बाहरी चीजों पर ही ध्यान देते हैं ।रातभर रेडियो का गाना सुनते हैं, हृदय के अंदर जो श्वासोच्छवास का सुंदर गायन चल रहा है, वह नहीं सुनते। एक श्वांस अंदर आता है, दूसरा बाहर जाता है, यह तो वीणा चल रही है। अंदर का ध्यान करेंगे, तो उत्तम से उत्तम संगीत सुनने को मिलेगा।

आगे मैत्रेयी को उपदेश देते हुए याज्ञवल्क्य ऋषि कहते हैं आत्मा वा अरे दृष्टव्य: श्रोतव्यो मंतव्यो निदिधयासितव्य: आत्मा का ही दर्शन , श्रवण, मनन, निदिध्यासन करें।

इनमें से श्रोतव्यादि तीन दृष्टव्य के साधन माने जाते हैं। लेकिन दृष्टव्यादि तीनों को निदिध्यासितव्य के साधन भी माना जा सकता है।

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