अमरीकी अश्वेत आंदोलन का भटकाव और महात्मा गांधी

 

शिव कांत, बीबीसी हिंदी रेडियो के पूर्व सम्पादक, लंदन से

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा सुधार हो जो किसी विरोध या आंदोलन के बिना हुआ हो. अफ़्रीकावंशी काले नागरिकों के साथ होने वाले भेदभाव के विरोध में हो रहे Black Lives Matter या BLM आंदोलन को लेकर जब राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भन्ना रहे थे, तब पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने एक छात्रसभा में कहा था, अमरीकी लोकतंत्र भी विरोध आंदोलनों की ही देन है. लेकिन आंदोलनों को जब किसी प्रभावशाली नेता या लक्ष्य से दिशा नहीं मिलती तब वे दिशाहीन हो सकते हैं और अराजकता में बदल जाते हैं. शनिवार को अमरीकी राज्य जॉर्जिया की राजधानी एटलांटा में गिरफ़्तारी से भागने की कोशिश कर रहे काले युवक रेशार्ड ब्रुक्स की गोरे पुलिस अफ़सर गैरेट रॉल्फ़ की गोलियों से मौत हो गई. गैरेट रॉल्फ़ को बर्ख़ास्त कर दिया गया है और पुलिस प्रमुख ने इस्तीफ़ा दे दिया. लेकिन रोष में आए प्रदर्शनकारियों ने एक रेस्तराँ को आग लगा दी जिससे लगता है BLM आंदोलन भी भटकने लगा है और कुछ अराजक तत्व उसे हाइजैक करने की कोशिश कर रहे हैं.

काले नागरिकों पर पुलिस की बर्बरता को रोकने और कालों के साथ होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिए पहले पुलिस विभागों और न्याय व्यवस्था में सुधार की माँग उठी थी. जो प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता की घटनाओं की वजह से पुलिस विभागों को भंग करने और सामुदायिक पुलिस के गठन की माँग में बदल गई. ऐसे पुलिस विभाग जिनका गठन समुदाय की रज़ामंदी से हो और जो समुदाय के जातीय स्वरूप और अनुपात पर आधारित हों. ट्रंप प्रशासन के विरोध के बावजूद मिनियापोलिस समेत कई राज्यों के ज़िलों में सामुदायिक पुलिस के गठन की प्रक्रिया शुरू भी हुई. इस बीच आंदोलन कारियों की नज़र ऐसी प्रतिमाओं और झंडों पर गई जिनका इतिहास नस्लवादी था और दास-व्यापार से जुड़ा था. ट्रंप प्रशासन के विरोध के बावजूद कई राज्यों के ज़िला प्रशासन इस माँग पर भी विचार करने को तैयार हो गए.

गांधी प्रतिमा पर निशाना 

लेकिन इसी बीच आंदोलनकारियों ने ऐसे लोगों की प्रतिमाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया जो दासता के समर्थक रहे, नस्लवादी विचारधारा के थे और दास-व्यापार से जुड़े थे. इसी जुनून में कुछ लोगों ने अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास के सामने लगी महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर भी हमला बोल दिया. चेहरे से लेकर पाँवों तक रंग फेंक कर प्रतिमा को रंग दिया गया और प्रतिमा की आधारशिला पर नस्लवादी लिख दिया गया. भारत स्थित अमरीकी राजदूत ने घटना पर माफ़ी माँगते हुए घटना की छानबीन का वादा किया है. लेकिन गाँधी जी प्रतिमाओं पर हमले की यह पहली घटना नहीं है. दो साल पहले उनकी प्रतिमा को घाना विश्वविद्यालय के परिसर से हटा दिया गया था. उससे पहले जोहनेसबर्ग में अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस के एक समर्थक ने महात्मा गाँधी की प्रतिमा और शिलापट्ट पर सफ़ेद रंग फेंक दिया था.

पिछले सप्ताह BLM आंदोलन के समर्थन में यहाँ लंदन में चल रहे प्रदर्शनों के बीच वेस्टमिंस्टर संसद भवन के सामने लगी महात्मा गाँधी की प्रतिमा की आधारशिला के सामने किसी ने काले रंग से नस्लवादी लिख दिया.

पिछले कुछ दिनों से इंगलैंड के उत्तरी शहर लेस्टर से महात्मा गाँधी की प्रतिमा के ख़िलाफ़ हस्ताक्षर अभियान चल रहा है. पिछले शनिवार को लंदन में हुए BLM प्रदर्शनों के दौरान अति दक्षिणपंथी प्रदर्शनकारियों का भी एक गिरोह प्रदर्शन करने उतरा था. उनका उद्देश्य चर्चिल और नेल्सन की प्रतिमाओं को BLM आंदोलनकारियों के हमलों से बचाना था. हैरत की बात है कि नस्लवादी विचारधारा वाले चर्चिल और नेल्सन की प्रतिमाओं की रक्षा के लिए तो लोग आए लेकिन महात्मा गाँधी की प्रतिमा को नस्लवादी नारा लिखने वाले से बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया. आप कह सकते हैं कि जिन्हें चर्चिल, नेल्सन और गाँधी जी के बीच फ़र्क नज़र न आता हो उनसे ऐसी उम्मीद रखना ही भूल है. 

गाँधी जी की प्रतिमाओं पर हमले करने का चलन अफ़्रीका, अमरीका और यहाँ लंदन में ही नहीं भारत में भी बढ़ा है. लोगों को अब अम्बेडकर और लोहिया ज़्यादा बड़े नेता नज़र आने लगे हैं. अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला को और अमरीका में मार्टिन लूथर किंग को आदर्श मानने वाले लोगों को गाँधी जी के बयानों में और पत्रों में नस्लवादी विचार नज़र आते हैं. हर नेता की अपनी ख़ूबियाँ हैं और कमियाँ भी. लेकिन एक बात निर्विवाद है. अपनी कथनी, करनी और विचारों को जीवन में ढाल कर दिखाने वाला नेता दुनिया में गाँधी जी के सिवा कोई नहीं हुआ है.

गांधी  जननेता होने के साथ-साथ, मँजे हुए राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, विचारक, पत्रकार और सत्याग्रही सभी कुछ थे. इंसान की बराबरी की बातें करना आसान है, लेनिन, माओ, चर्चिल, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग, अंबेडकर और लोहिया में से एक नेता में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि दूसरे इंसान से अपना मैला साफ़ न कराए. अब इसके बावजूद यदि लोगों को गाँधी जी नस्लवादी नज़र आते हैं तो यह उनकी समझ है.

गांधी  जननेता होने के साथ-साथ, मँजे हुए राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, विचारक, पत्रकार और सत्याग्रही सभी कुछ थे. इंसान की बराबरी की बातें करना आसान है, लेनिन, माओ, चर्चिल, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग, अंबेडकर और लोहिया में से एक नेता में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि दूसरे इंसान से अपना मैला साफ़ न कराए. अब इसके बावजूद यदि लोगों को गाँधी जी नस्लवादी नज़र आते हैं तो यह उनकी समझ है.

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