इलाहाबाद की पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास

इन अखबारों ने कभी पूरे देश में तहलका मचा दिया

वीरेंद्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, प्रयागराज 

पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास  इलाहाबाद वर्तमान में प्रयागराज में मिलता है। “प्रयाग प्रदीप” उर्दू का “स्वराज” और अंग्रेजी का “पायनियर” वह मील के पत्थर हैं, जिनकी सानी कोई दूसरा अखबार नहीं कर पाया। इनके संपादक पत्रकारिता के सूर्य की तरह है।

यहां की पत्रकारिता का उल्लेख करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि यहां से समाचार पत्र ही नहीं छापे जा रहे थे। बल्कि क्रांति के लिए नरम दल और गरम दल दोनों के कार्यकर्ता तैयार किये जा रहे थे। जब आप “पंडित बालकृष्ण भट्ट” को पढ़ते हैं तो आपको समझ में आता है कि “प्रयाग प्रदीप” ने क्रांति की मशाल कैसे जलाये रखा।  जब आप “स्वराज” को देखते हैं तो आपको समझ में आता है कि इसके संपादकों ने कितना बड़ा बलिदान करके एक इतिहास रच दिया। अंग्रेजी का  “पायनियर”  अखबार  लंदन तक जाता था।  इसके बराबर भारतीयों की आवाज बनाकर “लीडर” को उतारा गया। जिसने पायनियर को बराबर की टक्कर दी।

2 जनवरी 18 65 वह तारीख है जब प्रयागराज / इलाहाबाद में “पायनियर” पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। इतिहास में यह तारीख स्वर्ण अक्षरों में अंकित है । यह समाचार पत्र पहले सप्ताह में तीन बार  प्रकाशित होता था। और इसका मूल्य उस समय “एक रुपए” था ।आप समझ सकते हैं कि 18 65 में जिस अखबार का मूल्य एक रुपए होगा वह समाज में कैसी प्रतिष्ठा रखता होगा।

 1868 में यह दैनिक हो गया और इसका दाम अब 3 आना हो गया । 

1927 में इसका दाम 2 आना प्रति अंक हो गया।

पायनियर अखबार के पहले संपादक “सर जार्ज  एलन ” थे। इन्हीं के नाम से पायनियर प्रेस के पास एलन गंज बस गया । यह अखबार लंदन तक जाता था। खासतौर से कोलकाता से दिल्ली जाने वाली ट्रेनों में सब्सक्राइब किया जाता था। एक तरह से यह सरकारी मुखपत्र था।  अंग्रेज इसे अपनी नीतियों के प्रसारित करने के लिए इस्तेमाल करते थे।

 1927 में मिस्टर f.w. विल्सन इसके संपादक होकर आए तब इस की नीतियों में परिवर्तन आया । रूडयार्ड किप्लिंग जैसे महान लेखक इसमें कार्य करते थे । पायनियर की प्रतियां अभी भी आपको सेंट्रल लाइब्रेरी में देखने को मिल जाएंगी। बाद में यह लखनऊ से प्रसारित होने लगा।

हिंदी प्रदीप

इलाहाबाद  में सबसे पहले 1877 में पंडित बालकृष्ण भट्ट ने “प्रयाग प्रदीप” नामक अखबार का प्रकाशन शुरू किया। विजया दशमी के दिन इस प्रकाशन को शुरू किया गया। पंडित बालकृष्ण मालवीय नगर में रहते थे। ” प्रयाग प्रदीप” के माध्यम से आजादी की अलख जला कर रखी। पंडित बालकृष्ण भट्ट ने अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर इस समाचार पत्र का प्रकाशन किया। 

पंडित बालकृष्ण भट्ट जब 13 वर्ष के थे उस समय चौक स्थित नीम के पेड़ पर उन्होंने बहुत सारे निर्दोष भारतीयों को फांसी पर लटकते देखा था । बाल मन में अंग्रेजो के जुल्म और क्रूरता के खिलाफ खिलाफ आक्रोश था जिसे उन्होंने समाचार पत्र प्रयाग प्रदीप के जरिए प्रकाशित किया।

1875 में कुछ जागरूक विद्यार्थियों ने “हिंदी वर्धनी सभा” का गठन किया था और इसी में 5-5 रुपए प्रति माह का सहयोग देकर एक अखबार निकालने का निर्णय किया गया था। कुछ लोग पीछे हट गए लेकिन बालकृष्ण भट्ट ने इसकी अगुवाई की और “प्रयाग प्रदीप” का जन्म हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस अखबार के प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली पद्य बध्य पंक्तियां लिखी थी।

 भारतेंदु हरिश्चंद्र व बालकृष्ण भट्ट के मित्र थे । हरिश्चंद्र ने जब कवि वचन सुधा का प्रकाशन शुरू किया तब बालकृष्ण भट्ट उसमें लिखा करते थे। इन्होंने कुछ समय सीएवी में और कायस्थ पाठशाला में पढ़ाया भी।

 एक कहानी इनके बारे में जरूर उल्लेख करना चाहूंगा जिससे आप समझ सकेंगे की “बालकृष्ण भट्ट” कितने साहसी थे । क्रांति की मशाल जलाने में इन जैसे महान लोगों का इतना बड़ा योगदान था जिन्हें आज हम विस्मित कर बैठे हैं ।

बात 21 अक्टूबर 1905 की है। बंगाल विभाजन के लिए जगह-जगह विरोध हो रहा था। ऐसे में यमुना किनारे एक सभा आयोजित की गई थी। विरोध की सभा में लगभग ढाई सौ लोग थे, और मंच से बालकृष्ण भट्ट लोगों को संबोधित कर रहे थे। उनके शब्द अंग्रेजो के खिलाफ कठोर से कठोर होते जा रहे थे। ऐसे में मंच पर बैठे व्यक्ति ने उनका अंगरखा खींचा और इशारा किया , संयमित रहे। लेकिन पंडित बालकृष्ण भट्टमहान लोगों में से थे । उन्होंने मंच से ही कहा “हमारे अंगरखे का पल्ला खींचत हुआ, चाहत हो हम बोली ना।

हिए में लगी है आग , कही काहे ना।”

यानी मेरे दिल में आग लगी है मैं क्यों ना बोलूं।

हिए में लगी है आग , कही काहे ना।”

यानी मेरे दिल में आग लगी है मैं क्यों ना बोलूं।

उस समय क्रांति और विरोध की इस तरह से आयोजित होने वाली सभा में सीआईडी के लोग भी मौजूद होते थे । दूसरे दिन उन्हें स्कूल इंस्पेक्टर ने बुलाया और चेतावनी दी लेकिन बालकृष्ण भट्ट तो बालकृष्ण भट्ट ही थे । उन्होंने कायस्थ पाठशाला त्यागपत्र देकर नौकरी के बंधन से मुक्त हो गये।

पंडित बालकृष्ण भट्ट  पाठशाला में नौकरी करते थे । पाठशाला से उन्हें ₹50 वेतन के मिलते थे। यह सारा पैसा समाचार पत्र के प्रकाशन पर खर्च हो जाता था। डाक व अन्य के लिए उन्हें अपने मित्रों से सहायता लेनी पड़ती थी। 

पहले प्रयाग प्रेस में  मुद्रित होता था । बाद में 1894 में यह सरस्वती यंत्रालय में छपने लगा। यूनियन प्रेस में मुद्रक रघुनाथ सहाय पाठक की देखरेख में छपा ।अंग्रेजों के दबाव के कारण बार-बार ,अलग-अलग प्रेसों में छपता रहा । एक बार तो मुंशी कामता प्रसाद ने पंडित बालकृष्ण भट्ट से यह कह दिया कि “पंडित जी आप हमारे यहां ना आया करें आपके यहां आने से हमारी छवि खराब होती है ।”

अखबार के बंद होने के पीछे भी पंडित बालकृष्ण भट्ट का बगावती तेवर था । जिसके कारण अखबार को बंद करना पड़ा। इन्होंने माधव शुक्ला की एक रचना छाप दी “बम क्या है”।  इसी रचना के चलते अंग्रेजों ने इसे खतरनाक और अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह माना तथा प्रेस को बंद कर दिया गया। वह रचना इस प्रकार थी।

“कुछ डरो न केवल इसमें बुद्धि भरम है। सोचो यह क्या है जो कहलाता बम है ।

यह नहीं स्वदेशी आंदोलन का फल है। नहीं वायकाट या स्वराज की कल है ।।

इस रचना को माधव शुक्ल जी ने लिखा था। 1910 में इसके बाद अंग्रेजों ने इस अखबार को बंद कर दिया। इस तरह से पहला हिंदी समाचार पत्र जिसने क्रांति की मशाल लोगों के दिल में पंडित बाल कृष्ण भट्ट कृष्णकांत मालवीय माधव शुक्ला जैसे साहित्य और क्रांति प्रेमियों के जरिये जलायी। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि बंगला का प्रदीप समाचार पत्र का प्रेरणास्रोत प्रयाग प्रदीप ही था।

1880 में पंडित देवकी नंदन त्रिपाठी ने प्रयाग समाचार निकाला इसी समय पंडित जगन्नाथ शर्मा राज वैद्य ने प्रयाग मित्र नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया । एक समाचार पत्र “आरोग्य दर्पण” भी निकाला गया 1911 तक इनका प्रकाशन हुआ।

उन्नीस सौ में इंडियन प्रेस वाले चिंतामणि घोष ने “सरस्वती” पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका के प्रकाशन के पीछे एक कहानी है। काशी के राधा कृष्ण दास और बाबू श्याम सुंदर दास प्रयागराज आए थे ।उन्होंने इंडियन प्रेस में बाबू रसिकलाल की खिलौना पुस्तक का हिंदी संस्करण देखा । तब उन्होंने बातचीत में इच्छा जाहिर की कि एक अच्छी पत्रिका का प्रकाशन आप करें बाबू चिंतामणि घोष दूरदर्शी थे ।  उन्होंने इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया । प्रारंभ में इसका संपादन नागरी प्रचारिणी सभा के 5 सदस्य करते थे । 2 वर्ष बाद इसका प्रबंधन बाबू श्याम सुंदर दास करने लगे। 190 4 से 20 तक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका संपादन किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने संपादन किया । देवी दत्त शुक्ल श्री नाथ सिंह जैसे विद्वानों ने इसका संपादन किया। उस समय के लेखकों के लिए यह बड़ी बात होती थी कि उनका लेख या रचना सरस्वती में छप जाए।

(प्रयाग से प्रयागराज तक – वीरेन्द्र पाठक ) अंश । पुस्तक से साभार -1

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