आक्रामक चीन के खिलाफ कितना तैयार है भारत

अनुपम तिवारी

Anupam Tiwari
Anupam Tiwari

पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर जारी तनाव के बीच गत 11 अक्टूबर को भारत और चीन 13 वीं बार बातचीत की मेज पर बैठे. सीमा पर शांति बहाली की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए चीन ने स्पष्ट कर दिया कि वह डेपसोंग, डेमचोक और हॉट स्प्रिंग से अपने सैनिकों को वापस नहीं हटाएगा.इस बार चीन ने उन सभी स्थानों को अपना बता दिया जहां उसके सैनिक पिछले वर्ष आ कर अवैध रूप से बैठ गए थे. साथ ही वह भारत पर ही आरोप लगा रहा कि वह एलएसी का सम्मान नही कर रहा. बीते कुछ हफ्तों में कई बार चीन ने स्पष्ट रूप से यह जताया है कि वह भारत पर आक्रामक है. इसके विपरीत आश्चर्यजनक रूप से भारत का रुख लचर ही रहा है.

भारत के खिलाफ आक्रामक है चीन

31 अगस्त को 100 से अधिक चीनी घुड़सवार सैनिकों ने उत्तराखंड के बाराहोटी इलाके में भारतीय सीमा में घुस कर तोड़ फोड़ मचाई थी. इसके अलावा 28 सितंबर को 200 से ज्यादा पीएलए के सैनिक अरुणाचल प्रदेश के यांगत्से के उस इलाके में देखे गए जिसे भारत अपना कहता है और चीन जिस पर दावा करता है.

सिर्फ सीमा पर ही नही बल्कि सामरिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से भी भारत पर हावी हो जाना चाहता है. वह अपनी मीडिया का इस्तेमाल भी भारत के खिलाफ माहोल बनाने में करता रहा है. 9 अक्टूबर को चीनी मीडिया हाउस ‘वेइबो’ ने एक खबर चलाई थी जिसमे लगभग 30 भारतीयों को बहुत ही दयनीय स्थिति में चीनी सैनिकों के कब्जे में बताया गया था. हालांकि इसकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है.

आधुनिक गावों से भारत को घेरने की कोशिश

भारत से लगी सीमा पर चीन ने स्थाई ढांचे बनाने में पिछले दिनों बड़ी तेजी दिखाई है. उसकी पश्चिमी सीमा पर सिरजोप–मोल्दो–रनतोक तक निर्माण कार्य बहुत तेजी से चालू है. समूचे तिब्बत में चीन ने 628 आधुनिक गांवों को बसाने की जो कोशिशें शुरू की हैं उनमें से करीब 200 नए गांव एलएसी से ही सटे हुए हैं. 

अरुणाचल के लोहित जिले के बेहद करीब से ले कर समूचे हिमालय क्षेत्रों में ऐसे गांव विकसित किए जा रहे हैं जो अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ ही सैन्य क्षमताओं से भी लैस होंगे. यह गांव सिर्फ भारत ही नहीं, नेपाल और भूटान की सीमाओं पर भी बनाए जा रहे हैं. इनमें चीन के ‘हन’ वंशियों के अलावा सेना के रिटायर्ड जवानों और अधिकारियों को बसाया जा रहा है जिससे तिब्बत की जनसांख्यिकी में स्थाई रूप से बदलाव किया जा सके.

कैलाश रेंज से सैनिकों को हटाना भारत की भूल?

यह मानना गलत न होगा कि चीन की चाल में फंस कर भारत ने रणनीतिक बढ़त भी अब गंवा दी है. कैलाश रेंज में पिछले साल भारत ने सामरिक रूप से अति महत्वपूर्ण चोटियों पर अपनी सैनिक पोस्टें बना ली थीं. मोल्डो गैरिसन समेत चीनी सेना के कई संवेदनशील ठिकाने हमारी बंदूकों की जद में थे.

पिछली वार्ता के बाद भारत ने जिस तेजी से कैलाश रेंज की अपनी बढ़त त्याग दी और सैनिकों को वहां से नीचे बुला लिया वह चौंकाता है. हालांकि इसकी एवज में चीन ने भी पेंगोंग झील के किनारे से अपना सैन्य जमावड़ा हटा लिया था. परंतु डेमचोक, डेपसोंग और हॉट स्प्रिंग इलाकों पर वह अभी तक जमा हुआ है. मतलब साफ है सामरिक सौदेबाजी में हम पिछड़ गए हैं और फिलहाल हमारे पास चीन के ऊपर दबाव बढ़ाने और उसे विवश कर सकने के लिए कोई भी महत्वपूर्ण इलाका नहीं है.

लंबे संघर्ष के लिए तैयारी कर रहा है चीन

चीनी सेना के अंदर सांगठनिक बदलाव भी देखा जा रहा है. तिब्बत और शिंजियांग वह इलाके हैं जो भारत से सीमा साझा करते हैं और पीएलए के पश्चिमी थिएटर कमांड के अंतर्गत आते हैं. रणनीतिक बदलाव करते हुए इस कमांड को अधिक संवेदनशील पूर्वी थिएटर कमांड के समकक्ष का दर्जा दे दिया गया है. मतलब अब पश्चिमी कमांड को भी वह सब सुविधाएं, खुफिया सूचनाएं, हथियार, आर्थिक प्रबंधन और सैन्य बल मिल सकेगा जो हाल ही तक दक्षिण चीन सागर, ताइवान, हांगकांग इत्यादि की सीमा पर तैनात पूर्वी थिएटर कमांड को मिला करता था.

इशारा साफ है, चीन पूरी तरह से भारत को लंबे संघर्ष की ओर ले चल पड़ा है. भारत को भी अब इक्का दुक्का विजयों से इतर लंबी लड़ाई के लिए तैयार होना पड़ेगा. चीन की रणनीति स्पष्ट है वह भारत से पारंपरिक युद्ध बिलकुल नहीं चाहेगा किंतु युद्ध जैसी स्थिति लंबे समय तक बना कर रखना चाहेगा. 

चीन के विरुद्ध आक्रामकता जरूरी

थल सेना अध्यक्ष जनरल मुकुंद नरवाने के बयानों से यह तो पता चलता है कि भारतीय सेनाएं चीन की हर चाल पर नजर बनाए रखे हैं और बराबर अनुपात में सैनिकों और हथियारों की तैनाती कर रही है. किंतु आवश्यकता है कि अब सेना के बल के साथ साथ कूटनीतिक मंचों पर भी हमलावर रुख अपनाया जाए.

यह सही है कि पिछले कुछ सालों में एलएसी के इस पार भारत ने भी ढांचागत निर्माण तेज किए हैं. दुर्गम जगहों पर बीआरओ ने सड़कें पुल इत्यादि बनाने का कार्य प्राथमिकता से किया है. किंतु इतने वर्षों से शिथिल रहे बॉर्डर पर चीन के अनुपात में इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर पाना बेहद दुष्कर कार्य है. 

माउंटेन स्ट्राइक कोर का एक बार फिर से गठन स्वागतयोग्य है. अब सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों पर उसकी तैनाती समय की जरूरत है. तिब्बत से सटी सीमा की सुरक्षा का भार जिस आईटीबीपी पर है उसकी भी चेकपोस्टों में इजाफा किया जा रहा है. 

लाल आंखें दिखानी ही होंगी

किंतु प्रश्न फिर भी यही है कि यह सभी कदम सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से ही तो उठाए जा रहे हैं. चीन पर इसका प्रभाव तभी दिखाई देगा जब हम आक्रामक होते दिखेंगे. कैलाश रेंज का उदाहरण सटीक है, चीन को जब उसी की भाषा में जवाब मिलता है तो वह ठिठकता जरूर है.

चीन के विरुद्ध आक्रामकता सिर्फ राजनैतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं होनी चाहिए. लाल आंखें दिखाने के कई स्तर हैं वैश्विक स्तरों पर भारत को ‘चीन का नाम लिए बिना’ उस पर हमला करने की नीति छोड़नी होगी. युद्ध विकल्प नहीं है, परंतु युद्ध जैसी स्थिति बनी रहना भी कई बार फायदेमंद हो जाता है. 

भारत कई स्तरों पर आक्रामक हो सकता है

चीन की कई कमजोर नसें हैं. तिब्बत, शिनजियांग में  अल्पसंख्यकों के दमन की बातें हों, या कम्युनिस्ट चीन के भीतर मानवाधिकार संबंधित समस्याएं. इन पर वैश्विक मंचों पर अन्य साझीदारों के साथ मिल कर हमलावर हुआ जा सकता है. कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जिम्मेदारी से बचने का चीन भरसक प्रयास कर रहा है इस पर भी भारत विश्व समुदाय का नेतृत्व कर सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान प्रकरण के बाद बदले वैश्विक समीकरणों में भारत की भूमिका नगण्य होती जा रही है. आवश्यकता है अपनी छवि और विश्व की जरूरतों को अच्छी तरह से लामबंद करने की. दक्षिण चीन सागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरने के लिए कई बड़ी शक्तियां आतुर हैं. भारत को इनके साथ अपनी भूमिका स्थापित करनी होगी. दूरदर्शी सोच के साथ चीन के अन्य पड़ोसियों, चाहे वह आसियान देश हों या मध्य एशिया के मुल्क, भारत को कई नए गठबंधन बना कर साथ में काम करना होगा.

संक्षेप में कहें तो चीन ने भारत को घेरने का पूरा बंदोबस्त किया हुआ है. वह अपने पड़ोस में भारत के बढ़ते कद को पसंद नही करेगा. यहां भारत की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह चीन के प्रति आवश्यक सजगता के साथ साथ विभिन्न स्तरों पर आक्रामकता भी दिखाए वरना देर हो जायेगी.

(लेखक वायु सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। मीडिया स्वराज समेत तमाम चैनलों पर रक्षा एवं सामरिक मामलों पर अपनी राय रखते हैं।)

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