आचार्य नरेंद्र देव: समाजवाद और नैतिक राजनीति का आदर्श
— प्रो. राजकुमार जैन
19 फरवरी 2026 सोशलिस्टों के पितामह आचार्य नरेंद्र देव की 70वीं पुण्यतिथि है। आचार्य जी की शख्सियत को किसी एक लेख, पुस्तक या भाषण में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है। उन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाता रहेगा। फिर भी कुछ प्रसंग ऐसे हैं, जिनसे उनके विराट व्यक्तित्व और वैचारिक ऊँचाई का आभास सहज ही हो जाता है।
17 मई 1934 को पटना में ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में हुई। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर समाजवादी विचारधारा को संगठित स्वर देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। जब श्रीप्रकाश ने उनकी पहली भेंट महात्मा गांधी से कराई तो गांधीजी अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने कहा— “ऐसे रत्न सरीखे व्यक्ति को कहाँ छिपा रखा था?” यह टिप्पणी आचार्य जी की बौद्धिक गंभीरता और नैतिक आभा का प्रमाण है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आचार्य नरेंद्र देव ने अनेक वर्ष जेल में बिताए। जब वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर किले में बंद थे, उसी समय नेहरू अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिख रहे थे। नेहरू ने प्रस्तावना में स्वीकार किया कि यह पुस्तक आचार्य नरेंद्र देव और मौलाना आज़ाद की बौद्धिक सहायता के बिना संभव नहीं थी। उन्होंने आचार्य जी को अपने लिए एक ‘एनसाइक्लोपीडिया’ कहा। यह उनके गहन अध्ययन, इतिहास-बोध और व्यापक दृष्टि का प्रमाण है।
1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के समय सुभाषचंद्र बोस ने प्रस्ताव रखा था कि यदि आचार्य नरेंद्र देव को अध्यक्ष बनाया जाए तो वे अपना नाम वापस ले लेंगे। गांधीजी भी इस विचार से सहमत थे, किन्तु अन्य नेताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया। यह प्रसंग दर्शाता है कि आचार्य जी सभी धाराओं में समान रूप से सम्मानित थे और उनका व्यक्तित्व किसी एक खेमे तक सीमित नहीं था।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने नैतिक राजनीति का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह आज भी स्मरणीय है। वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। बाद में जब उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी का मार्ग अपनाया और कांग्रेस से अलग हुए, तो नैतिक आधार पर उन्होंने तथा उनके 11 साथियों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
30 मार्च 1948 को विधानसभा में अपने त्यागपत्र की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस से पृथक होने का यह निर्णय उनके जीवन का सबसे कठिन निर्णय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे चाहें तो बिना त्यागपत्र दिए केवल स्थान परिवर्तन कर सकते थे, जैसा अन्य व्यवस्थापिकाओं में होता रहा है, परंतु उन्होंने इसे उचित नहीं समझा। उनका उद्देश्य राजनीतिक जीवन को स्वस्थ, नीतिपूर्ण और रचनात्मक बनाना था। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कदम किसी विद्वेष या कटुता से प्रेरित नहीं है, और वे व्यक्तिगत आक्षेपों से बचते हुए विचार आधारित आलोचना का मार्ग अपनाएँगे।
आज जब राजनीति में दल-बदल सामान्य बात हो गई है और सिद्धांतों की अपेक्षा अवसरवादिता अधिक दिखाई देती है, तब आचार्य नरेंद्र देव का यह आचरण विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। उनका जीवन यह सिखाता है कि राजनीति में नैतिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि व्यवहारिक संकल्प भी हो सकते हैं।
आचार्य नरेंद्र देव स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी, समाजवादी सिद्धांतों और कार्यक्रमों के प्रमुख प्रवर्तक तथा भारतीय संस्कृति, प्राचीन साहित्य, इतिहास और बौद्ध दर्शन के गहन अध्येता थे। उनका समाजवाद भारतीय बौद्धिक परंपरा से संवाद करता हुआ समाजवाद था, जिसमें नैतिकता, मानवीयता और बौद्धिक ईमानदारी का केंद्रीय स्थान था।
ऐसे प्रकांड विद्वान, विचारक और सिद्धांतनिष्ठ राजनेता के प्रति हम श्रद्धा से नतमस्तक हैं। उनकी 70वीं पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।



