एकल शिक्षक स्कूल : भारत की सरकारी प्राथमिक शिक्षा का मौन संकट

एकल शिक्षक स्कूल : भारत की प्राथमिक शिक्षा का मौन संकट,जहाँ एक ही शिक्षक पढ़ाता है, खाना बनवाता है, रजिस्टर भरता है और कभी-कभी वोट भी गिनता है.

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में लाखों बच्चे अब भी ऐसे सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं, जहाँ केवल एक ही शिक्षक है।

शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई प्लस (UDISE+) 2023–24 के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार देश में एक लाख से ज़्यादा सरकारी प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जिनमें सिर्फ़ एक शिक्षक कार्यरत है। इन स्कूलों में लगभग 33 लाख बच्चे पढ़ते हैं।

यह स्थिति शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून, 2009 का सीधा उल्लंघन है, जो हर बच्चे को निश्चित शिक्षक-छात्र अनुपात की गारंटी देता है। फिर भी यह समस्या ख़ासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सबसे गंभीर है।

शिक्षा का अधिकार (RTE) क्या कहता है

कानून के अनुसार हर सरकारी प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 1 से 5) में न्यूनतम शिक्षकों की संख्या इस प्रकार होनी चाहिए —

विद्यार्थियों की संख्या न्यूनतम शिक्षकों की संख्या

1 से 60 तक 2 शिक्षक

61–90 3 शिक्षक

91–120 4 शिक्षक

121–200 5 शिक्षक + प्रधानाध्यापक

200 से ऊपर हर 40 बच्चों पर एक अतिरिक्त शिक्षक

यानि किसी भी सरकारी स्कूल में केवल एक शिक्षक होना गैरक़ानूनी है।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हज़ारों स्कूलों में या तो एक ही शिक्षक है या फिर शिक्षकों की रिक्तियाँ वर्षों से भरी नहीं गईं।

गाँवों और पहाड़ी इलाक़ों के कई स्कूलों में एक ही शिक्षक पाँचों कक्षाएँ पढ़ाता है, वही मिड डे मील देखता है, हाज़िरी भरता है, और प्रशासनिक रजिस्टर तैयार करता है।

अगर वह शिक्षक किसी कारण से अनुपस्थित हो जाए — तो पूरा स्कूल बंद हो जाता है।

आँकड़े बताते हैं:

• देश के लगभग 10 प्रतिशत सरकारी प्राथमिक विद्यालय सिंगलटीचरस्कूल हैं।

तीन लाख से अधिक विद्यालयों में केवल दो शिक्षक हैं।

• कई राज्यों में हज़ारों पद रिक्त पड़े हैं।

गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ

सरकारी स्कूलों के शिक्षक सिर्फ़ पढ़ाने का काम नहीं करते — उन्हें कई गैर-शैक्षणिक ज़िम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती हैं। जैसे :

1. मिड डे मील (प्रधानमंत्री पोषण योजना): रोज़ाना खाना पकवाना, गुणवत्ता देखना, राशन का लेखा-जोखा रखना।

2. रजिस्टर और आँकड़े: उपस्थिति रजिस्टर, वित्तीय अभिलेख, यूडीआईएसई+ डेटा भरना, सर्वे फॉर्म।

3. चुनाव और जनगणना ड्यूटी: चुनावों में बूथ लेवल अधिकारी या गणनाकर्मी के रूप में हफ़्तों तक तैनाती।

4. सरकारी अभियान: स्वच्छ भारत, टीकाकरण, पोषण सप्ताह, मतदाता जागरूकता आदि।

5. सांस्कृतिक और खेल गतिविधियाँ: वार्षिकोत्सव, खेलकूद, परेड, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन।

राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (NIEPA) के एक अध्ययन में पाया गया कि शिक्षक अपने कार्यकाल का केवल लगभग 60% समय ही पढ़ाने में लगाते हैं, बाकी समय प्रशासनिक काम में चला जाता है।

एकल शिक्षक विद्यालय में इसका अर्थ है कि कक्षा में वास्तविक शिक्षण लगभग दो घंटे से भी कम होता है।

 अच्छी शिक्षा के लिए कितने शिक्षक ज़रूरी

शिक्षाशास्त्रियों का मानना है कि प्रभावी शिक्षा के लिए हर कक्षा का अलग शिक्षक होना चाहिए।

यानि एक प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 1 से 5) में —

• कक्षा 1–5 के लिए 5 शिक्षक

1 प्रधानाध्यापक

1 विशेष शिक्षक या सहायक शिक्षक

1 कला/खेल/पुस्तकालय शिक्षक

इस तरह एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में कम से कम 6–7 शिक्षकों की आवश्यकता होती है ताकि हर बच्चे को ध्यान मिल सके।

प्राथमिक शिक्षा पर कितना बजट खर्च होता है

भारत में शिक्षा पर कुल सरकारी व्यय केवल लगभग 2.9% GDP है — जबकि नई शिक्षा नीति (NEP 2020) ने 6% का लक्ष्य तय किया था।

इसमें से स्कूल शिक्षा को लगभग 65–70% हिस्सा मिलता है, और प्राथमिक शिक्षा को मात्र 40–45%, यानी कुल GDP का लगभग 1.2% ही प्राथमिक शिक्षा पर खर्च होता है।

राज्य कुल राज्य बजट में शिक्षा का हिस्सा प्राथमिक शिक्षा पर अनुमानित खर्च

बिहार 18.3 % लगभग 8 %

छत्तीसगढ़ 18.8 % 8–9 %

उत्तर प्रदेश 13–14 % 5–6 %

राजस्थान 14 % 6 %

कर्नाटक 11 % 4–5 %

तेलंगाना 6.5 % 3 %

स्पष्ट है कि अधिकांश राज्य प्राथमिक शिक्षा पर पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे हैं।

 सरकारें शिक्षक क्यों नहीं नियुक्त कर रहीं

1. वित्तीय सीमाएँ: शिक्षा बजट का 80% हिस्सा पहले से ही वेतन पर खर्च होता है।

2. भर्ती में देरी: आरक्षण, अदालतों में मामले और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ भर्ती रोक देती हैं।

3. स्कूल एकीकरण (रैशनलाइजेशन): छोटे स्कूलों को बंद या मिलाया जा रहा है।

4. संविदा शिक्षक नीति: स्थायी पदों की जगह अस्थायी शिक्षकों से काम लिया जा रहा है।

5. राजनीतिक प्राथमिकताएँ: भवन और योजनाओं के शिलान्यास पर अधिक ध्यान, शिक्षक नियुक्ति पर कम।

इसका असर क्या पड़ता है

ASER और राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) दोनों ने पाया है कि जिन राज्यों में सिंगल टीचर या दो टीचर वाले स्कूल अधिक हैं, वहाँ के बच्चों की पढ़ने और गिनने की क्षमता बहुत कम है।

एक शिक्षक पाँच कक्षाओं में एक साथ पढ़ा नहीं सकता।

इसलिए बच्चों की मूलभूत साक्षरता और गणनात्मक क्षमता (Foundational Literacy and Numeracy) सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है।

समाधान क्या हो सकता है

1. शिक्षक भर्ती समयबद्ध हो।

2. हर स्कूल में कम से कम दो शिक्षक हों — जैसा RTE में प्रावधान है।

3. मिड डे मील और डेटा एंट्री के लिए अलग सहायक स्टाफ नियुक्त किया जाए।

4. GIS आधारित तैनाती प्रणाली से हर स्कूल में संतुलित स्टाफिंग हो।

5. राज्य बजट में प्राथमिक शिक्षा के लिए अलग मद रखा जाए।

6. स्कूल प्रबंधन समितियों (SMCs) को सशक्त किया जाए।

 निष्कर्ष

एक अकेला शिक्षक न तो पाँच कक्षाएँ पढ़ा सकता है, न ही बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकता है।

अगर भारत को “सबको शिक्षा – अच्छी शिक्षा” का सपना साकार करना है, तो हर सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक सुनिश्चित करने होंगे।

शिक्षक पर निवेश केवल खर्च नहीं है — यह देश के भविष्य में निवेश है।

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