धर्म की राजनीति और चुनाव आयोग: क्या संविधान को बचाने की इच्छाशक्ति है?

पूर्व बीबीसी संवाददाता राम दत्त त्रिपाठी और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुनील कुमार के बीच हुई चर्चा पर आधारित।

भारत का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित करता है। लेकिन हर चुनाव के साथ यह सवाल और तीखा होता जा रहा है कि क्या चुनावी प्रक्रिया में धर्म और जाति का बढ़ता हस्तक्षेप उस संवैधानिक वचन को खोखला नहीं कर रहा?

यह सवाल हाल ही में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुनील कुमार के साथ हुई एक विस्तृत चर्चा में केंद्र में रहा। विषय था — धर्म की राजनीति और चुनाव आयोग।

संविधान की नींव और आज का यथार्थ

1947 में विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। इसके बावजूद भारत ने सोच-समझकर एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का रास्ता चुना। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के ज़रिये ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द प्रस्तावना में जोड़े गये।

लेकिन आज देश एक वैचारिक संघर्ष के दौर में है — एक तरफ ‘हिंदू राष्ट्र’ की विचारधारा, दूसरी तरफ ‘धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक राज्य’ का आदर्श।

संस्थाओं का क्षरण

राज्य और धर्म का घुलना-मिलना: एक समय था जब प्रधानमंत्री धार्मिक आयोजनों से औपचारिक दूरी बनाए रखते थे। अब राज्य और धर्म के बीच की विभाजन-रेखा धुंधली होती जा रही है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक गणतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है।

चुनाव आयोग की साख: पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। जब आयोग स्पष्ट संकेत नहीं देता, तो प्रशासनिक मशीनरी नियम-पालन की जगह ‘सुरक्षित खेल’ खेलने लगती है। नतीजा — निष्पक्षता की जगह सुविधाजनक चुप्पी।

न्यायपालिका पर सवाल: राम जन्मभूमि जैसे संवेदनशील मामलों के कुछ फ़ैसलों ने आम नागरिकों के मन में यह सवाल पैदा किया है कि क्या न्यायपालिका न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर काम कर रही है, या किसी और दबाव में। संविधान के संरक्षक की यह छवि कमज़ोर होना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं।

राजनीतिक दलों की भूमिका

सत्ताधारी दल पर आरोप है कि वह अल्पसंख्यकों को “दूसरे दर्जे के नागरिक” की तरह पेश करता है — जो न केवल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचाता है।

विपक्षी दल भी इस मामले में बेदाग नहीं। वे अक्सर वैचारिक स्पष्टता की जगह ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की शरण लेते हैं — तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए, दीर्घकालिक संवैधानिक जिम्मेदारी से मुँह मोड़कर।

चुनाव आयोग की शक्ति: क्या कानून में रास्ता है?

इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था — चुनाव आयोग की वास्तविक शक्तियों का विश्लेषण।

पंजीकरण का अधिकार: 1989 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में धारा 29A जोड़ी गई, जो चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों को पंजीकृत करने का अधिकार देती है। पंजीकरण के समय दलों को धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और राष्ट्रीय एकता के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा करनी होती है।

पंजीकरण रद्द करने पर आयोग का पक्ष: आयोग का आधिकारिक रुख यह है कि कानून में स्पष्ट प्रावधान न होने के कारण वह दलों का पंजीकरण रद्द नहीं कर सकता।

सुनील कुमार का तर्क: यहीं वे असहमत होते हैं। उनका कहना है कि यह एक ‘ग्रे एरिया’ है, कोई बंद गली नहीं। यदि आयोग के पास पंजीकरण देने का अधिकार है, तो शर्तों के उल्लंघन पर पंजीकरण रद्द करने का अधिकार भी तार्किक रूप से उसी में निहित है। जो अधिकार दे सकता है, वह वापस भी ले सकता है।

‘प्लेनरी पावर्स’ — संविधान-प्रदत्त असीमित शक्तियाँ

सुनील कुमार का तर्क केवल कानूनी बारीकियों तक सीमित नहीं। वे चुनाव आयोग की उन संवैधानिक ‘प्लेनरी पावर्स’ की बात करते हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में मान्यता दी है।

टी.एन. शेषन का उदाहरण: जब शेषन ने बिहार में चुनाव स्थगित किये, तो यह किसी लिखित कानूनी प्रावधान से नहीं, बल्कि संवैधानिक शक्ति की साहसिक व्याख्या से हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही ठहराया।

एम एस सिंह गिल मामला: इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग की व्यापक संवैधानिक शक्तियों को स्वीकार किया।

इन्हीं मिसालों के आधार पर सुनील कुमार सुझाते हैं कि आयोग को चाहिए कि वह:

• धर्म के नाम पर वोट माँगने को ‘भ्रष्टाचरण’ (Corrupt Practice) के रूप में वर्गीकृत करे और संबंधित दल को जिम्मेदार ठहराए

• पहले चेतावनी दे, सुधार न होने पर पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई शुरू करे

• इस कदम से मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचेगा और ‘ग्रे एरिया’ में कानूनी स्पष्टता आएगी

• पूरी प्रशासनिक मशीनरी को स्पष्ट संकेत दे कि नियम-पालन ‘सुरक्षित खेल’ से ज़्यादा ज़रूरी है

आगे का रास्ता: तीन स्तंभ

चर्चा में तीन स्तरों पर सुधार की बात उभरी:

सुप्रीम कोर्ट: न्यायालय को स्वयं संज्ञान लेना चाहिए और चुनाव आयोग को उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों की याद दिलानी चाहिए।

चुनाव आयोग: केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि कानून में अधिकार नहीं है। संविधान-प्रदत्त शक्तियों का साहसपूर्वक उपयोग करना होगा।

नागरिक समाज: अंततः, लोकतंत्र को नागरिकों की सक्रिय भागीदारी चाहिए। मीडिया, बुद्धिजीवी वर्ग और जागरूक नागरिकों को संगठित होकर आवाज़ उठानी होगी।

निष्कर्ष

धर्म की राजनीति कोई नई बात नहीं। लेकिन जब यह संस्थागत चुप्पी के साये में फलती-फूलती है, तो संविधान का ढाँचा भीतर से खोखला होने लगता है। चुनाव आयोग के पास शक्ति है — सवाल इच्छाशक्ति का है।

जो संस्थाएँ अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करतीं, वे धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देती हैं। और जब संस्थाएँ कमज़ोर होती हैं, तो संविधान कागज़ पर ही रह जाता है।

चुनाव आयोग के पास शक्ति है — सवाल इच्छाशक्ति का है।

धारा 29A, प्लेनरी पावर्स और धर्म की राजनीति पर एक ज़रूरी चर्चा।

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पूरी बातचीत यहाँ सुनें

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