भारतीय दूरसंचार क्रांति के जनक सैम पित्रोदा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। Media Swaraj के संपादक राम दत्त त्रिपाठी से एक साक्षात्कार में पित्रोदा ने आगाह किया कि एआई न केवल रोजगार के लिए खतरा है, बल्कि यह संसाधनों की लूट और ‘डिजिटल गुलामी’ का एक नया जरिया बनता जा रहा है।
सफेदपोश नौकरियों पर मंडराता संकट
पित्रोदा के अनुसार, अब तक माना जाता था कि स्वचालन (Automation) से केवल शारीरिक श्रम वाली नौकरियां प्रभावित होंगी, लेकिन एआई ने इस धारणा को बदल दिया है। उन्होंने कहा, “अब शोध, रिपोर्टिंग और डिजाइनिंग जैसे बौद्धिक कार्य भी एआई के दायरे में हैं। यह ‘व्हाइट कॉलर’ नौकरियों के लिए एक बड़ा संकट है।“
पर्यावरण की भारी कीमत
साक्षात्कार के दौरान उन्होंने एआई के ‘भौतिक स्वरूप’ पर ध्यान आकर्षित किया। पित्रोदा ने बताया कि एआई को चलाने वाले डेटा सेंटर्स शहरों जितनी जमीन घेर रहे हैं। इन केंद्रों को ठंडा रखने के लिए करोड़ों गैलन पानी और चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली की खपत हो रही है, जो सीधे तौर पर हमारे पर्यावरण को प्रभावित कर रही है।
डिजिटल गुलामी’ का खतरा
डेटा एकाधिकार पर तीखा प्रहार करते हुए पित्रोदा ने कहा कि दुनिया की मुट्ठी भर कंपनियां डेटा पर कब्जा कर चुकी हैं। वे विज्ञापन और मुनाफे के लिए हर व्यक्ति के व्यवहार को ट्रैक कर रही हैं। उन्होंने इसे **’डिजिटल गुलामी’** करार देते हुए कहा कि मुनाफे की इस अंधी दौड़ में ‘एल्गोरिदम’ नशे की तरह काम कर रहे हैं, जो फर्जी खबरों और नफरत को बढ़ावा देकर समाज को बांट रहे हैं।
समाधान: गांधीवादी विकेंद्रीकरण
इस वैश्विक समस्या का समाधान पित्रोदा **विकेंद्रीकरण** में देखते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि:
* डेटा और गवर्नेंस को जिला स्तर पर लाया जाए।
* स्थानीय डेटा का लाभ स्थानीय लोगों को ही मिले।
* विकास का मॉडल “सत्ता और मुनाफे” के बजाय **”लोग और ग्रह” (People and the Planet)** पर आधारित हो।
भारत का वैश्विक संदेश
पित्रोदा का मानना है कि इस तकनीकी युग में भारत अपने पारंपरिक मूल्यों—विविधता, संयुक्त परिवार और सादा जीवन—के जरिए दुनिया को सही राह दिखा सकता है। उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर चेतावनी दी कि एआई मानवता को अगले स्तर पर ले जा सकता है, लेकिन यदि संभलकर इस्तेमाल नहीं किया गया, तो यह विनाशकारी भी साबित हो सकता है।



