बेतिया, पश्चिमी चंपारण. आज़ादी के आंदोलन की विरासत, सद्भावना, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा तथा उन्हें मजबूत करने के उद्देश्य से पटना से चंपारण तक “जहां पड़े कदम गांधी के — एक कदम गांधी के साथ” पटना से चंपारण यात्रा : 10 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026 निकाली गई ।
यात्रा के नौवें दिन की शुरुआत विवेकानंद रामकृष्ण विद्या मंदिर में सर्वधर्म प्रार्थना से हुई। प्रातः नौ बजे स्कूली बच्चों के साथ यात्रा दल के सदस्यों ने गांधी-दर्शन और उनके मूल्यों पर संवाद किया।
गोष्ठी : चंपारण सत्याग्रह, भूदान आंदोलन और भूमि समस्या
सर्व सेवा संघ, सर्वोदय मंडल बिहार तथा लोक संघर्ष समिति, पश्चिमी चंपारण के संयुक्त तत्वावधान में एक विचार गोष्ठी आयोजित हुई।
पहला सत्र : चंपारण सत्याग्रह एवं भूदान आंदोलन
संचालन : अशोक भारत | अध्यक्षता : ऊषा बहन
मुख्य वक्ता ज्योति बहन ने महात्मा गांधी और विनोबा भावे की विरासत का स्मरण करते हुए बताया कि यह यात्रा चंपारण सत्याग्रह के 110 वर्ष और भूदान आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित की जा रही है। उन्होंने कहा कि इसी चंपारण की धरती पर गांधी जी को अहिंसा का वास्तविक अनुभव हुआ था।
ज्योति बहन ने बताया कि 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली में विनोबा भावे को पहला भूदान मिला था, जब रामचंद्र रेड्डी ने उनके आह्वान पर 100 एकड़ भूमि दान में दी। देशभर की पदयात्रा में विनोबा को लाखों एकड़ भूमि प्राप्त हुई। उन्होंने कहा, “गांधी और विनोबा ने सिद्ध किया कि सत्य, अहिंसा और प्रेम से किसी भी चुनौती का समाधान संभव है।”
वर्तमान संकट की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि चंपारण में अनेक लोगों को वर्षों पूर्व भूमि के पर्चे तो मिल गए, किंतु कब्ज़ा आज तक नहीं मिला। इसके पीछे जटिल सरकारी प्रक्रियाएं और जमींदारों का भय मुख्य कारण हैं। उन्होंने शांतिपूर्ण सत्याग्रह का आह्वान करते हुए कहा कि जिस प्रकार विनोबा ने 14 वर्षों में 48 लाख एकड़ भूमि भूमिहीनों के लिए प्राप्त की, उसी प्रेम और अहिंसा के मार्ग से चंपारण की भूमि समस्या का भी समाधान हो सकता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में ऊषा बहन ने कहा कि भूदान आंदोलन केवल भूमि वितरण का माध्यम नहीं था, बल्कि समाज में प्रेम, करुणा और हृदय परिवर्तन का अभियान था। उन्होंने विनोबा भावे को उद्धृत किया — समाज में जो भी सकारात्मक कार्य हो रहे हैं, उनमें गांधी विचार की चेतना व्याप्त है।
दूसरा सत्र : भूमि समस्या और समाधान
अध्यक्षता : अरविंद अंजुम, सचिव, सर्व सेवा संघ | संचालन : पंकज
सामाजिक कार्यकर्ता पंकज ने भूमिहीनों और पर्चाधारियों के संघर्ष में चार प्रमुख बाधाओं को रेखांकित किया :
पहली बाधा — धारा 353 का दुरुपयोग : न्याय की मांग करने वालों पर ही मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं।
दूसरी बाधा — “अभियान दखल” की विफलता : भूमि मिलने के बाद भी लोगों को पुनः बेदखल कर दिया जाता है।
तीसरी बाधा — कानूनी प्रक्रिया में अत्यधिक देरी : कानून के अनुसार 90 दिनों में निर्णय होना चाहिए, किंतु वर्षों तक कब्ज़ा नहीं मिल पाता। चंपारण में भूमि विवाद से जुड़े लगभग 94 मामले पिछले 40 वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं और लगभग 15,000 एकड़ भूमि विवाद में फंसी है। बिहार में भूमि निस्तारण की प्रक्रिया सात स्तरों पर होती है, जबकि कर्नाटक में यही कार्य मात्र दो स्तरों पर संपन्न हो जाता है।
चौथी बाधा — भ्रष्ट तंत्र का चक्रव्यूह : वकील, प्रशासनिक अधिकारी, सभी राजनीतिक दलों के नेता और मीडिया का एक वर्ग — ये सभी नहीं चाहते कि भूमिहीनों को उनकी भूमि मिले।
सर्व सेवा संघ के सचिव अरविंद अंजुम ने कहा कि विनोबा भावे का भूदान आंदोलन किसी प्रतिक्रिया या पूर्व-नियोजित योजना के तहत नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से उपजा था — और यही क्रमशः भूदान से ग्रामदान और राज्यदान तक विस्तृत हुआ।
उन्होंने कहा कि एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व ने भारत की सबसे बड़ी भौतिक समस्या — भूमि असमानता — का समाधान अपने अनूठे ढंग से करने का प्रयास किया। विनोबा ने स्त्रियों को अध्यात्म, संन्यास और ब्रह्मचर्य में पुरुषों के समान अधिकार देकर एक नया आदर्श स्थापित किया।
उन्होंने भूमि समस्या के समाधान के लिए बेहतर दस्तावेज़ीकरण, सुस्पष्ट विमर्श-निर्माण, वास्तविक स्थिति के व्यापक प्रचार-प्रसार और सत्याग्रह के माध्यम से जन-लामबंदी को अनिवार्य बताया।
गोष्ठी को समाजवादी नेता लक्ष्मण गुप्ता, माले नेता बिरेन्द्र गुप्ता, उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज तथा लोक संघर्ष समिति की नेता फूलकली देवी ने भी संबोधित किया। वक्ताओं ने पर्चाधारियों, दून क्षेत्र में 1990 से वन भूमि पर खेती करने वालों तथा बेतिया राज की भूमि पर वर्षों से निवास कर रहे लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए जिले में सघन अभियान और व्यापक सत्याग्रह चलाने का आह्वान किया।
बेतिया हजारीमल धर्मशाला : विरासत की उपेक्षा
सायंकाल यात्रा दल बेतिया की ऐतिहासिक हजारीमल धर्मशाला पहुंचा। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी इसी धर्मशाला में ठहरे थे। ब्रिटिश दबाव के बावजूद हजारीमल झुंझुनवाला ने यह आश्रय उपलब्ध कराया था। यहीं किसान अपने अत्याचारों की गाथा सुनाते थे और राजेंद्र प्रसाद तथा आचार्य कृपलानी जैसे नेताओं की टीम उनके बयान दर्ज करती थी।

आज यह ऐतिहासिक इमारत जर्जर अवस्था में है। दीवारों पर पेड़ उग आए हैं, परिसर में कचरे का अंबार है और यह धरोहर एक शॉपिंग मॉल की छाया में उपेक्षित पड़ी है। बिहार सरकार इसे गांधी सर्किट का हिस्सा मानती है, किंतु प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह स्थल तेज़ी से नष्ट हो रहा है।
इसके बाद यात्रा दल चनपटिया पहुंचा, जहां स्वतंत्रता सेनानी गुलाब चंद्र गुप्ता की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पदयात्रा के माध्यम से जन-संदेश फैलाया गया।
यात्रा दल के सदस्य
यात्रा संयोजक अशोक भारत, सर्व सेवा संघ के सचिव अरविंद अंजुम, उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज, सिस्टर फ्लोरिन, हिमालय विजेता कीर्ति, वैज्ञानिक चेतना कार्यकर्ता विकास कुमार, उमेश तूरी, मयूर साखरे, पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप कुमार, अशोक कुमार सिंह, विष्णु कुमार, एस. श्रीनिवासन (तमिलनाडु), सुनील कुमार शर्मा (पंजाब), सिराज अहमद, ज्योति बहन (ब्रह्म विद्या मंदिर विनोबा आश्रम, पवनार), जम्मू बहन (गुजरात), जीतेन नंदी (बंगाल), चंद्रमा (कस्तूरबा ट्रस्ट) तथा प्राची बहन (महाराष्ट्र)।
#Champaran #LandRights #Bhoodan #Gandhi #Ahimsa #भूमि_अधिकार #BiharNews #SocialJustice
कृपया इसे भी पढ़ें



