विश्वकठपुतली दिवस 2025 : काठ की कठपुतलियाँ हाड़-माँस के इंसान को इंसानियत सिखाती हैं

एक काठ का टुकड़ा, कुछ रंग, कुछ धागे — और एक जादुई कलाकार की उँगलियाँ। बस इतने से ही मंच पर जीवन उग आता है। कठपुतली बोलती है, नाचती है, हँसती है और कभी-कभी ऐसी बात कह जाती है जो हाड़-माँस का इंसान कहने से डरता है। यही है कठपुतली नाट्यकला की शक्ति — जो सदियों से हमारे समाज को मनोरंजन के साथ-साथ नैतिकता और मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाती आई है। हर वर्ष 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस इसी कला को सम्मान देने और उसे विस्मृति से बचाने के संकल्प के साथ मनाया जाता है।

आदिम काल से लेकर आज तक मनुष्य अपने अवकाश के समय में किसी न किसी मनोरंजन के साधन की तलाश करता रहा है। परन्तु आधुनिक दौर में तकनीक, प्रौद्योगिकी और मशीनीकरण ने हस्तकला आधारित मनोरंजन को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है। तेजी से फैलती उपभोक्तावादी संस्कृति — टीवी, फिल्म, वेबसीरीज, रील्स और कानफोड़ू डीजे कल्चर — के शोर में कठपुतली नाट्यकला हाशिये पर चली गई। मोबाइल और लैपटॉप के गेमों ने इस प्राचीन कला को लगभग विलुप्ति के कगार पर ला खड़ा किया है।

संयोग से विश्व कठपुतली दिवस उस दिन मनाया जाता है जब पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध पर दिन और रात बराबर होते हैं — जिसे विषुव (Equinox) कहते हैं। पुनर्जागरण काल के खगोलशास्त्री कोपरनिकस ने बताया था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365 दिन और 6 घंटे में पूरी करती है। भूगोलवेत्ताओं के अनुसार इसी परिक्रमा के नियम से प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को दिन और रात बराबर होते हैं।

कठपुतली नाट्यकला के सिद्धहस्त कलाकार परदे के पीछे से धागे के सहारे मंच पर जब अपनी जादुई उँगलियाँ फेरते हैं, तो कठपुतलियाँ जीते-जागते इंसानों की तरह बोल उठती हैं। मंच पर उनका मनमोहक नृत्य और अभिनय दर्शकों का मन बरबस मोह लेता है। कालक्रम में यह कला ज्ञान-विज्ञान का बोध कराने, शिक्षा और सूचना के सम्प्रेषण का माध्यम बनी तथा इससे जुड़े कलाकारों की आजीविका का साधन भी।

विश्व कठपुतली दिवस मनाने का विचार सर्वप्रथम ईरान के कठपुतली विशेषज्ञ जावेद जोलपाघरी ने प्रस्तुत किया। वर्ष 2000 में मैगडेबर्ग में आयोजित UNIMA (Union Internationale de la Marionnette) के 18वें सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया। जून 2002 में अटलांटा में UNIMA की काउंसिल ने इसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया। सर्वप्रथम फ्रांस में वर्ष 2003 में विश्व कठपुतली दिवस मनाया गया और तब से यह परम्परा सम्पूर्ण विश्व में फैल गई।

कठपुतली नाट्यकला की जड़ें भारत में अत्यंत प्राचीन हैं। ईसापूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनि कृत अष्टाध्यायी के नटसूत्र में इसका उल्लेख मिलता है। सिंहासन बत्तीसी में विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का वर्णन है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती जी का मन बहलाया था। वर्द्धन वंश के शासकों ने इस कला को संरक्षण और प्रश्रय दिया, जिसके फलस्वरूप यह भारत से इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यान्मार, जावा और श्रीलंका तक फैली।

पारम्परिक भारतीय कठपुतली नाट्यकला में अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, लैला-मजनूँ, शीरी-फरहाद जैसी प्रेम कथाओं के साथ-साथ राजा हरिश्चंद्र, भक्त पूरनमल, श्रवण कुमार, भर्तृहरि, सती सावित्री जैसे पौराणिक चरित्रों का मंचन किया जाता था। आज इसका उपयोग प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन, नारी सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण जैसे समसामयिक विषयों में भी हो रहा है। उत्तर भारत में राजस्थान में यह कला आज भी जीवंत है।

लोक जागरण के इस सशक्त माध्यम को पुनः व्यापक और लोकप्रिय बनाने में कुछ समर्पित कलाकार जुटे हुए हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंगकर्मी मिथिलेश दुबे अपनी संस्था ‘क्रिएटिव पपेट थिएटर’ के माध्यम से ‘मोहन से महात्मा’ शीर्षक कठपुतली नाट्य का देश के विभिन्न शहरों में मंचन करते रहे हैं। विगत आठ वर्षों से वे स्वाधीनता आंदोलन के नायकों के व्यक्तित्व पर आधारित कथानक तैयार कर सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं को जनमानस तक पहुँचाने का सार्थक काम कर रहे हैं।

राजस्थानी लोक कला कठपुतली की प्रस्तुति. विश्व कठपुतली दिवस पर विशेष
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कठपुतली नाट्यकला को ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम से जोड़ा गया है ताकि कला-प्रेमी युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें। नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत के समन्वय से बनी यह कला आज भी समाज में व्याप्त कुरीतियों, कुप्रथाओं और असंगत रूढ़ियों को दूर करने का सशक्त माध्यम बन सकती है। विश्व कठपुतली दिवस पर यह संकल्प लेना जरूरी है कि इस अमूल्य विरासत को विलुप्त होने से बचाएँगे — क्योंकि जब काठ की कठपुतली बोलती है, तो वह सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, वह इंसान को इंसानियत का पाठ पढ़ाती है।

— मनोज कुमार सिंह

जिला अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच, मऊ | उप सम्पादक, कर्मश्री मासिक पत्रिका

घोसी, जनपद मऊ (उ.प्र.)

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