भारत में नल का पानी सुरक्षित क्यों नहीं? प्लास्टिक बोतल, भरोसा और शहरों की जवाबदेही का सवाल

( राम दत्त त्रिपाठी )

रामदत्त त्रिपाठी,पूर्व संवाददाता बीबीसी
राम दत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

कुछ वर्ष पहले यूरोप की यात्रा का एक छोटा-सा अनुभव आज भी मेरे मन में सवाल बनकर खड़ा है।मैं Geneva में था। सोचा होटल में पानी की बोतल महंगी मिलेगी, इसलिए बाहर से खरीद लूँ . एक दुकान पर पानी की बोतल माँगी तो दुकानदार ने मुस्कुराकर कहा —

“बोतल क्यों खरीद रहे हैं? हमारा नल का पानी, यहाँ तक कि पब्लिक टॉयलेट का भी, पीने लायक है।” दुकानदार का इशारा था ख़रीदना है तो मिनरल वॉटर या कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह ख़रीदूँ , सादा पानी क्यों जब नल से मुफ्त मिलता है. 

कुछ ही दिनों बाद Rome में मैंने देखा — सड़कों के किनारे, ऐतिहासिक इमारतों के पास, छोटे-छोटे फव्वारों से लोग अपनी बोतलें भर रहे थे। कोई हिचक नहीं, कोई डर नहीं। पानी पर भरोसा था।

और तभी अपने देश की तस्वीर आँखों के सामने आ गई।

भारत में हम घर पर भी  भी नल का पानी सीधे पीने से डरते हैं। घर में आरओ लगाते हैं। सफर में प्लास्टिक की बोतल खरीदते हैं। यानी पानी पर दोहरी नहीं, तिहरी कीमत चुकाते हैं।

लेकिन क्या बोतलबंद पानी स्वास्थ्य के लिए सचमुच सुरक्षित है?

प्लास्टिक की बोतल: सुरक्षा या भ्रम?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर की वैज्ञानिक स्टडीज़ में बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं। ये वही बेहद छोटे प्लास्टिक कण हैं जो बोतल की प्लास्टिक से निकलते हैं। खासकर तब, जब बोतल गर्मी में रखी हो या धूप में पड़ी हो।

भारत जैसे गर्म देश में यह आम दृश्य है — सड़क किनारे धूप में सजी पानी की बोतलें। गर्मी प्लास्टिक को कमजोर करती है और कुछ रसायन, जैसे एंटिमनी या फ्थैलेट्स, पानी में घुल सकते हैं।

ये असर तुरंत बीमारी नहीं लाते। लेकिन लंबे समय तक रोज़ाना ऐसा पानी पीने से शरीर में सूजन, हार्मोन असंतुलन और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है — ऐसा शुरुआती शोध संकेत दे रहा है।

यानी जिस बोतल को हम सुरक्षित मानकर खरीदते हैं, वही धीरे-धीरे नई चिंता का कारण बन रही है।

फिर नल का पानी क्यों भरोसेमंद नहीं?

भारत में समस्या अक्सर पानी के स्रोत से ज्यादा उसकी वितरण प्रणाली में है। पानी ट्रीटमेंट प्लांट से साफ निकल सकता है, लेकिन:

पुरानी और जर्जर पाइपलाइन, 

लीकेज, सीवर लाइन के पास से गुजरती जल लाइन , अनियमित सप्लाई. 

इन सब कारणों से घर तक पहुँचते-पहुँचते पानी की गुणवत्ता संदिग्ध हो सकती है।

लोगों का भरोसा टूटता है। और जब भरोसा टूटता है, तो बाज़ार समाधान बेंचता  है — आरओ मशीन, केन वॉटर, प्लास्टिक बोतल।

असली फर्क कहाँ है?

जेनेवा और रोम का फर्क सिर्फ अमीरी नहीं है। फर्क है:

लंबी अवधि का इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश.

नियमित पाइपलाइन अपग्रेड.

सख्त गुणवत्ता परीक्षण.

पारदर्शिता और जवाबदेही.

वहाँ पानी सिर्फ सप्लाई नहीं है — एक सार्वजनिक भरोसा है।

भारत में भी योजनाएँ चल रही हैं। घर-घर नल कनेक्शन दिए जा रहे हैं। लेकिन कनेक्शन और कॉन्फिडेंस में फर्क होता है। जब तक पानी की गुणवत्ता का डेटा खुले रूप में साझा नहीं होगा, पाइपलाइन सिस्टम मजबूत नहीं होगा और नगर निकाय जवाबदेह नहीं होंगे, तब तक नागरिक निजी समाधान ढूँढते रहेंगे।

विकास की असली कसौटी

हम एक्सप्रेसवे और मेट्रो से विकास मापते हैं।

लेकिन शायद असली सवाल यह है:

क्या कोई नागरिक सार्वजनिक नल से बिना डर के पानी पी सकता है?

जेनेवा में जवाब हाँ है।

रोम में जवाब हाँ है।

भारत के कई शहरों में जवाब “शायद” है।

और यही “शायद” हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।

जिस दिन भारत के किसी शहर में भी दुकानदार यह कह सके —

“बोतल क्यों खरीद रहे हैं? हमारे नल का पानी बिल्कुल सुरक्षित है” —

उस दिन हम सच में विकसित होने की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा चुके होंगे।

 

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