Ganga vs Indus: गंगा के जलस्तर में कमी और सिंधु में वृद्धि की पूरी कहानी

पिछले एक दशक से गंगा नदी के जलस्तर में लगातार गिरावट एक ऐसी गंभीर वास्तविकता है जिस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है। आंकड़े बताते हैं कि भारत की जीवनरेखा कही जाने वाली गंगा का प्रवाह कम हो रहा है।

दूसरी ओर, चौंकाने वाले रूप से सिंधु (Indus) नदी के जलस्तर में वृद्धि दर्ज की गई है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह जलवायु परिवर्तन का असर है, या भूगर्भीय बदलाव?

राम दत्त त्रिपाठी के साथ समझिए इन दोनों महानदियों की पूरी कहानी, उनके प्रवाह में आ रहे इस अंतर के कारण और इसके भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव।

पिछले दशक में में गंगा जलस्तर में कमी एक ऐसी वास्तविकता बनकर उभरी है, जिस पर अभी तक पर्याप्त सार्वजनिक बहस नहीं हुई। आंकड़े बताते हैं कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा का प्रवाह लगातार घट रहा है, जबकि दूसरी ओर सिंधु (Indus) नदी में कुछ वृद्धि दर्ज की गई है।

यह निष्कर्ष Indian Institute of Technology Gandhinagar के वैज्ञानिकों के अध्ययन से सामने आया, जो अंतरराष्ट्रीय जर्नल Earth’s Future में प्रकाशित हुआ।

1980 से 2021 तक के डेटा के विश्लेषण में पाया गया कि गंगा का औसत प्रवाह लगभग 17 प्रतिशत कम हुआ, जबकि सिंधु में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

लेकिन इन आँकड़ों को केवल संख्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। हमें समझना होगा कि इसके पीछे कौन-से प्राकृतिक और मानवीय कारण काम कर रहे हैं।

गंगा के घटते प्रवाह के पीछे क्या वजहें हैं?

सबसे पहले हिमालय की तरफ देखना होगा। गंगा का जन्म वहीं से होता है। बीते दशकों में हिमालयी क्षेत्र में तापमान लगातार बढ़ा है और बर्फबारी का पैटर्न बदल गया है।

 पहले सर्दियों में जो स्थिर और व्यापक हिमपात होता था, वह अब कम अवधि और असमान रूप में हो रहा है। इसका असर ग्लेशियरों पर पड़ा है।

 जब ग्लेशियरों को पर्याप्त “रीचार्ज” नहीं मिलता, तो गर्मियों में पिघलने वाला पानी भी कम हो जाता है। यही पिघला हुआ पानी गंगा को सूखे मौसम में सहारा देता है।

दूसरी बड़ी वजह मानसून का बदलता स्वभाव है। अब बारिश कम दिनों में बहुत तेज़ी से होती है। इससे बाढ़ तो आती है, लेकिन जमीन के भीतर पानी भरने का समय नहीं मिलता।

 पहले धीमी और लगातार बारिश से भूजल स्तर स्थिर रहता था। अब पानी तेज़ी से बहकर निकल जाता है। नतीजा यह कि सूखे मौसम में नदी को सपोर्ट देने वाला भूजल घट रहा है।

तीसरी और शायद सबसे गंभीर वजह है खेती और भूजल दोहन का मॉडल। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आसपास के इलाकों में गन्ना, धान और गेहूँ जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।

 ये फसलें बहुत पानी मांगती हैं। लाखों ट्यूबवेल लगातार जमीन से पानी खींच रहे हैं। जब भूजल स्तर बहुत नीचे चला जाता है, तो नदी और जमीन के बीच का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। पहले जमीन का पानी नदी में जाता था; अब कई जगह नदी का पानी जमीन में रिस रहा है। यह संकेत है कि नदी कमजोर हो रही है।

सिंधु में बढ़ोतरी क्यों दिख रही है?

अब दूसरी तरफ सिंधु को समझते हैं। सिंधु नदी लद्दाख क्षेत्र से निकलती है और आगे चलकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इसी नदी प्रणाली पर निर्भर है।

Water quantity in Sindhu river is increasing

सिंधु बेसिन मुख्यतः पश्चिमी विक्षोभ से पोषित होता है। पिछले वर्षों में पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की बर्फबारी में कुछ वृद्धि दर्ज की गई है। इससे सिंधु और उसकी सहायक नदियों में पानी बढ़ा।

इसके अलावा, कराकोरम क्षेत्र के कुछ ग्लेशियर अपेक्षाकृत स्थिर पाए गए हैं। तापमान वृद्धि से शुरुआती वर्षों में पिघलन बढ़ सकती है, जिससे अल्पकालिक रूप से नदी प्रवाह बढ़ता है।

साथ ही, भारतीय हिस्से में सिंधु बेसिन पर जनसंख्या का दबाव गंगा की तुलना में कम है। कृषि विस्तार और भूजल दोहन का स्तर भी कम है। इससे नदी पर मानवजनित दबाव अपेक्षाकृत सीमित रहा।

लेकिन वैज्ञानिक यह भी चेतावनी देते हैं कि यह बढ़ोतरी स्थायी होगी, इसकी गारंटी नहीं है। यदि जलवायु परिवर्तन इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में सिंधु भी प्रभावित हो सकती है।

गंगा का महत्व क्यों अलग है?

गंगा केवल एक नदी नहीं है। लगभग 40 करोड़ से अधिक लोग गंगा बेसिन पर निर्भर हैं। भारत की बड़ी कृषि पट्टी, लाखों किसानों की आजीविका, शहरों का पेयजल और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन इसी नदी से जुड़ा है। वाराणसी, हरिद्वार और प्रयागराज जैसे शहरों की पहचान गंगा से है।

यदि गंगा का प्रवाह लगातार घटता रहा, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

क्या गंगा का प्रवाह सुधारा जा सकता है?

यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। केवल गंगा नदी की सफाई से काम नहीं चलेगा; नदी का बहाव भी बनाए रखना होगा।

सबसे पहले पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना होगा। बांधों और बैराजों से इतना पानी छोड़ा जाए कि नदी सूखे मौसम में भी जीवित रहे।

दूसरा, भूजल पुनर्भरण पर गंभीर काम करना होगा। पारंपरिक तालाबों, आर्द्रभूमियों और वर्षा जल संचयन को बड़े पैमाने पर लागू करना जरूरी है।

तीसरा, कृषि नीति पर पुनर्विचार करना होगा। यदि पानी-प्रधान फसलें ही सबसे अधिक लाभकारी रहेंगी, तो किसान बदलाव के लिए प्रेरित नहीं होंगे। फसल विविधीकरण और जल-कुशल सिंचाई तकनीक को आर्थिक प्रोत्साहन के साथ जोड़ना होगा।

क्या सरकार पर्याप्त रूप से जागरूक है?

सरकार ने Namami Gange Programme के तहत सफाई और सीवेज प्रबंधन पर बड़े प्रयास किए हैं। साथ ही Atal Bhujal Yojana और Jal Jeevan Mission जैसे कार्यक्रम भी चल रहे हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी तक ध्यान अधिकतर प्रदूषण नियंत्रण पर रहा है। नदी के दीर्घकालिक प्रवाह प्रबंधन, भूजल नियंत्रण और कृषि सुधार को एकीकृत रूप में लागू करना अभी बाकी है।

गंगा को केवल साफ रखना काफी नहीं है; उसे बहता हुआ और संतुलित रखना भी उतना ही जरूरी है।

निष्कर्ष

गंगा में गिरावट और सिंधु में वृद्धि का यह अंतर हमें यह सिखाता है कि जलवायु परिवर्तन और मानव हस्तक्षेप का असर क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

सवाल यह नहीं कि सिंधु बढ़ रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम गंगा जैसी जीवनरेखा को दीर्घकाल में सुरक्षित रख पाएंगे।

यदि हिमालय, मानसून और भूजल के संतुलन पर गंभीरता से काम नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में यह जल संकट आर्थिक और सामाजिक संकट में बदल सकता है।

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