कर्पूरी ठाकुर: समाजवादी आंदोलन के हरावल दस्ते के नेता और सामाजिक न्याय के प्रतीक
प्रो राजकुमार जैन
17 फरवरी 1988 को दिवंगत हुए कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि भारतीय समाजवादी परंपरा की उस धारा को स्मरण करना है जिसने जाति, गरीबी और असमानता के खिलाफ जमीनी संघर्ष को राजनीति का केंद्र बनाया।
प्रो. राजकुमार जैन लिखते हैं कि जाति की आग में झुलसते हिंदुस्तान में कर्पूरी ठाकुर ने अपने किरदार, सादगी, ईमानदारी और संघर्ष की ताकत से जातिवाद को उसके घर में चुनौती दी। वे इसलिए महान नहीं थे कि वे बिहार के उप-मुख्यमंत्री या दो बार मुख्यमंत्री रहे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने सत्ता को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया।
शुरुआती जीवन: अभाव से आंदोलन तक
गरीबी और कठिनाइयों में पले कर्पूरी ठाकुर का जीवन संघर्षों से शुरू हुआ। 1938 में, मात्र 14 वर्ष की आयु में, वे प्रांतीय किसान सम्मेलन में पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात समाजवाद के शिखर पुरुष आचार्य नरेंद्र देव से हुई। मंच पर उपस्थित स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन और रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे नेताओं ने उनके भाषण से प्रभावित होकर इस उभरते युवा की प्रतिभा को पहचाना।
यहीं से उनका जीवन समाजवादी आंदोलन की दिशा में मुड़ गया।
आज़ादी का आंदोलन और जेल यात्रा
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में, जब महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का आह्वान किया, तब दरभंगा के सी.एम. कॉलेज में छात्रों की सभा में कर्पूरी ठाकुर ने समर्थन में हुंकार भरी। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। जेल में 28 दिन का अनशन किया और लगभग दो वर्ष से अधिक कारावास झेला।
इस दौर में उनका संपर्क जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं से गहरा हुआ। यही संगत उनके राजनीतिक जीवन की वैचारिक नींव बनी।
समाजवादी राजनीति का उभार
1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट धारा अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनी। कर्पूरी ठाकुर बिहार सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री रहे। 1952 में वे बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए और विपक्ष की सशक्त आवाज बने।
1965 में प्रजा समाजवादी पार्टी और समाजवादी पार्टी के एकीकरण में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। डॉ. लोहिया की गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति के तहत बिहार में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव बढ़ा। सत्ता की राजनीति में भी उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
मुख्यमंत्री के रूप में सामाजिक न्याय
कर्पूरी ठाकुर ने सत्ता को सामाजिक न्याय के औजार के रूप में देखा। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की पहल और शिक्षा में सुधार उनके कार्यकाल की पहचान बने। वे सादगी, पारदर्शिता और नैतिक राजनीति के प्रतीक रहे।
उनकी राजनीति का मूल उद्देश्य था—
• भूमिहीनों को अधिकार
• गरीबों को प्रतिनिधित्व
• शिक्षा और रोजगार में अवसर की समानता
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि, स्थानीय प्रतिबद्धता
1952 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी युवा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए वे वियना और युगोस्लाविया गए। 1953 में इज़राइल की कृषि व्यवस्था और कम लागत आवास मॉडल का अध्ययन किया। उन्होंने योजना आयोग को रिपोर्ट भी सौंपी। लेबनान, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया की यात्राओं ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया।
विरासत: सादगी और सिद्धांतों की राजनीति
कर्पूरी ठाकुर की असली पहचान उनके पदों से नहीं, बल्कि उनके आचरण से बनती है। वे जाति और वर्ग की जकड़नों में फंसे समाज में सामाजिक न्याय की ठोस जमीन तैयार करने वाले नेता थे।
आज, जब राजनीति में वैचारिक स्पष्टता और नैतिक साहस की कमी महसूस होती है, कर्पूरी ठाकुर की विरासत हमें याद दिलाती है कि सादगी, संघर्ष और सिद्धांत—ये तीनों मिलकर ही स्थायी नेतृत्व गढ़ते हैं।
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