इंदिरा गांधी केस, जब पहले खबर देने के लिए रिपोर्टर हाईकोर्ट की छत से कूद गया

राम दत्त त्रिपाठी

राम दत्त त्रिपाठी, राजनीतिक विश्लेषक 

12 June 1975 तब आज की तरह टीवी चैनल्स नहीं थे. मोबाइल फ़ोन और इंटर्नेट भी नहीं था. दो प्रमुख समाचार एजेंसियों प्रेस ट्रस्ट ओफ़ इंडिया पी टी आई  और यूनाइटेड न्यूज़ ओफ़ इंडिया यूएनआई  में खबर पहले देने की ज़बरदस्त प्रतियोगिता थी. इंदिरा गांधी ने अपने जासूसों के ज़रिए अपने मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसले की पहले भनक पाने की कोशिश की थी, पर नाकाम रही थीं.  

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत पहली मंज़िल पर थी. पी टी आई का दफ़्तर हाईकोर्ट से सड़क पार करते ही था. यूएनआई का दफ़्तर थोड़ी दूर था.  जजमेंट का आपरेटिव पार्ट कि इंदिरा गाँधी का चुनाव रद्द हो गया है, पता चलते ही यू एन आई के संवाददाता प्रकाश शुक्ल अदालत की पहली मंज़िल से मुँडेर पकड़कर नीचे कूद गए और टेलीप्रिंटर पर एक लाइन की खबर चला दी MRS. GANDHI UNSEATED. यानि इंदिरा गांधी की लोक सभा सदस्यता गयी. 

बड़े राजनीतिक परिवर्तन का प्रारम्भ 

बस इस एक लाइन की खबर से देश भर राजनीतिक बवंडर शुरू हो गया. पूरा जजमेंट तो बाद में आता रहा. भारतीय राजनीति में 12 जून की तारीख़ एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का ट्रिगर प्वाइंट  है. अब से पैंतालीस साल पहले वर्ष 1975 में इस दिन जो घटनाक्रम शुरू हुआ उसके चलते न केवल देश का लोकतंत्र कुछ समय के लिए पटरी से उतर गया, बल्कि उसी के साथ – साथ लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन भी एक तरह से समाप्त हो गया.  

इंदिरा गांधी बेटे संजय के साथ

इलाहाबाद  हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लोक सभा चुनाव भ्रष्ट तरीक़े अपनाने के आरोप में रद्द कर दिया. उससे उठ खड़े राजनीतिक तूफ़ान से बचने के लिए दो हफ़्ते बाद इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर लोकतांत्रिक अधिकार निलम्बित कर दिए. लाखों लोग बिना कारण बताए जेलों में ठूँस  दिये गए. वे भी जो आंदोलन से नहीं  जुड़े थे.

उदाहरण के लिए मैं तो उत्तर प्रदेश में आंदोलन की संचालन समिति का सदस्य था. जेपी ने जो निर्दलीय छात्र युवा संघर्ष वाहिनी बनायी थी, उसकी पाँच सदस्यों वाली संयोजन समिति का सदस्य था. पुलिस ने मेरे ऊपर पहले ही दिन दो मुक़दमे दर्ज कर गिरफ़्तारी की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन हम लोग जब भूमिगत आंदोलन चलाने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस मुझे नहीं  गिरफ़्तार कर पायी, तो मेरे छोटे भाई राम प्रकाश को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया. राम प्रकाश कक्षा नौ का छात्र था और उम्र  मात्र अठारह साल.  

इमर्जेंसी के दौरान ट्रेनें समय से चलने लगीं, लेकिन लोगों के साथ बहुत ज़्यादती हुई. पुलिस निरंकुश थी. सेंशरशिप के कारण शायद सरकार अंधेरे में थी. सरकार  क़रीब पौने दो साल बाद जब मार्च 1977 में चुनाव हुए तो न केवल कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई बल्कि स्वयं इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से लोक सभा चुनाव हार गयीं. आजादी के तीस सालों बाद पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में ग़ैर कांग्रेस सरकार बनी. 

राज नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव याचिका दायर की थी.

इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ 1971 रायबरेली से चुनाव हारने वाले  बनारसी समाजवादी नेता राज नारायण हीरो हो गए.  हालाँकि हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने का समय दिया था, पर विपक्ष तुरंत नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री का त्यागपत्र माँगने लगा और देशव्यापी आंदोलन की तैयारी शुरू हो गयी. 

कांग्रेस नेताओं ने इंदिरा जी के समर्थन में रैलियाँ शुरू कर दी. देश के प्रमुख अख़बार टाइम्स ओफ़ इंडिया ने इंदिरा जी के बचाव में कहा यह फ़ैसला ट्राफ़िक क़ानून के उल्लंघन जैसी  मामूली बात के लिए प्रधानमंत्री को हटाने जैसा है. ( firing the prime minister for traffic ticket.)

जय प्रकाश की दुविधा 

जय प्रकाश नारायण

जय प्रकाश नारायण या जेपी बड़ी दुविधा में फँस गए. उन्होंने एक बयान जारी कर नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी का त्यागपत्र तो माँगा, पर वह इस मुद्दे पर नया देशव्यापी  आंदोलन खड़ा करने के बजाय अपनी सारी ताक़त बिहार में सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन को प्रखंड और गाँव स्तर तक ले जाने के लिए समानांतर सरकार के कार्यक्रम पर लगाना चाहते थे. वास्तव में बिहार के बाहर जेपी आंदोलन का संगठन और ताक़त भी नहीं के बराबर थी, हालाँकि अस्वस्थ जेपी ने सब जगह दौरा किया था.

जजमेंट के दो दिन बाद वह सर्वोदय समाज की एक बैठक के लिए पटना से जबलपुर जाते हुए इलाहाबाद जंक्शन के रिटायरिंग रूम में ट्रेन बदलने और कुछ देर विश्राम के लिए रूके थे. इलाहाबाद में सर्वोदय और जेपी आंदोलन के प्रमुख नेता प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा और मैंने उनसे जानना चाहा था कि अब इस जजमेंट के बाद क्या रणनीति होगी . जे पी का कहना था कि विपक्षी दल उन पर दिल्ली आकर रैली और देश व्यापी बड़ा आंदोलन छेड़ने का दबाव बना रहे हैं. लेकिन आंदोलन की ताक़त देखते हुए वह अपना सारा ध्यान बिहार में सम्पूर्ण  क्रांति के घोषित कार्यक्रम में लगाना चाहते हैं. 

जेपी आंदोलन के एक प्रमुख नेता शिवानंद तिवारी याद करते हैं, ” यह जजमेंट जेपी के साथ ही हम लोगों ने भोजपुर के पीरो मैं सुना था. रेडियो पर. अगले दिन JP की सभा आरा में हुई और उसी सभा में नैतिकता के आधार पर उन्होंने इन्दिरा जी से त्याग पत्र माँगा था. उसी दिन शाम में आरा स्टेशन से ही जबलपुर के लिए उन्होंने प्रस्थान किया था.”

गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष राम चंद्र राही ने मुझे पिछली मुलाक़ात में बताया था कि जबलपुर की बैठक में सर्वोदय समाज के लोगों को भी जेपी ने यही बताया था. सबकी यही राय थी कि व्यवस्था परिवर्तन यानि सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन पर सारा ज़ोर लगाया जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को सशर्त स्टे दिया, यानि वह लोक सभा मेम्बर के नाते मतदान नहीं कर सकतीं, लेकिन संविधान के मुताबिक़ बिना सदस्य रहे भी प्रधानमंत्री रह सकती हैं. संविधान में यह प्रावधान है कि कोई व्यक्ति विधायिका का सदस्य हुए बिना छह महीने मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री रह सकता है. 

जेपी जबलपुर से वापस पटना आए तो उन पर फिर दबाव पड़ना शुरू हुआ. पहले तो जेपी ने दिल्ली जाने से मना किया, लेकिन बताते हैं कि जनसंघ के नेता नाना जी देश मुख ने गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधा कृष्ण के ज़रिए उन्हें किसी तरह राज़ी कर लिया. जेपी दिल्ली आए तो कांग्रेस के कुछ सांसद भी उनसे मिले जिससे इंदिरा गांधी को बड़े पैमाने पर दल बदल की आशंका हो गयी. 

कहते हैं मास्को से कम्युनिस्ट लाबी और संजय गांधी का गुट भी अलग से काम कर रहा था. यह जेपी आंदोलन को कुचलने के लिए अंदर- अंदर आपात काल घोषित करने की तैयारी पहले से कर रहा था. 

25 जून 1975 को राम लीला मैदान में भारी भीड़ जुटी. वहाँ जेपी ने इंदिरा गांधी के त्यागपत्र की माँग तो की ही, प्रधानमंत्री आवास के सामने क्रमिक सत्याग्रह का कार्यक्रम घोषित किया. जैसे इन दिनों अमेरिका की फ़ौज के बड़े अफ़सर कह रहे हैं जेपी ने भी कहा कि पुलिस और फ़ौज के लोग जनता के दमन के लिए  ग़ैर क़ानूनी आदेश न मानें. 

इसी का बहाना बनाकर और देश द्रोह का जुर्म बताकर मुक़दमे दर्ज हो गए. बिना मंत्री मंडल के अनुमोदन रातों रात इमर्जेंसी लगा दी गयी. भोर में कैबिनेट को सूचित करने के बाद इंदिरा जी ने सुबह आकाशवाणी से देश में इमर्जेंसी लागू करने की घोषणा कर दी. अख़बारों  पर सेंसर लगा दिया गया. मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए.

 इंदिरा गांधी ने सारी ताक़त अपने हाथ में ले ली. खुशामदी और चापलूस लोगों का बोलबाला हो गया. इंदिरा जी जनता के दुःख दर्द से दूर हो गयीं. अख़बारों में सब तरफ़ अमन चैन और खुशहाली की खबरें थीं. 

अपनी लोकप्रियता के धोखे में आकर इंदिरा जी ने मार्च 1977 चुनाव करा दिए. जनता का बदला मूड वह भाँप नहीं पायीं. अपने को बंगला देश युद्ध के बाद वाली लोक प्रिय नेता समझती रहीं, जिसे दुर्गा का अवतार भी कहा गया था. जनता ने पौने दो साल की सारी कसर चुनाव में निकाली और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी. 

आज जो लोग सत्ता में हैं वह इंदिरा जी के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल थे. पर आज वे भी सत्ता के रंग में रच बस गए हैं. सत्ता  का  मूल चरित्र वही है जो पहले था. राजनीति के विद्वान तो यह भी कहते हैं कि जब सारी सत्ता एक हाथ में आ जाती है तो नशा कुछ  ज़्यादा ही बढ़ जाता है.

ABSOLUTE POWER CORRUPTS ABSOLUTELY  .

नेता अपने को सर्वज्ञ समझने लगता है और तब सच बोलने वाले अपने मित्र भी दुश्मन लगने लगते हैं. 

बाबा तुलसी दास भी कह गए हैं.

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं, प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं

बाबा तुलसी दास ने एक बात और कही थी :

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास। 

सचिव , वैद्य – डाक्टर और गुरु ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं, तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है।

आदमी और सत्ता  छोटी हो या बड़ी, यह बात सब पर लागू होती है. मुझे लगता है भारत में आपात काल का सबसे बड़ा सबक यही है. 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं. 

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