श्रम को नये समाज के निर्माण में केन्द्र में रखें

कोरोना के सबक

 

 

टिप्पणी 

 प्रो बिमल कुमार

जब लॉक-डाउन लागू किया गया, तो हम सबसे कहा गया कि हम घर में रहें, घर में रहें और घर में ही रहें। फिर दो दिनों बाद पता लगा कि लाखों लोग अपने घरों से हजारों मील दूर मजदूरी करने के लिए गये थे। जहां ये काम करते थे, वहां काम नहीं रहा तो रहने की जगह से भी बेदखल कर दिये गये। उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा, सिवा इसके कि वे अपने घरों की ओर पैदल चल पड़ें। इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी खड़ी हो गयी एक वैश्विक त्रासदी से लड़ते-लड़ते।

जब पूरे देश की जनता के लिए कोई नीति बनायी जा रही हो तो सभी आयामों पर ध्यान देने की जरूरत होती है। कोरोना से लड़ाई ने हमारी जागरूकता, संवेदनशीलता, तैयारी की सीमा एवं सबसे गरीब वर्गों के प्रति हमारी अज्ञानता को उजागर कर दिया है। नीतियों के निर्धारण में टेक्निकल पक्ष इतना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि सामाजिक व मनोवैज्ञानिक पक्ष दृष्टि में ही नहीं आता। अभी भी  शारीरिक दूरीबनाने को  सामाजिक दूरी बनाने के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  आपूर्ति की कड़ियां जोड़े रखने जैसी टेक्निकल भाषा का इस्तेमाल हो रहा है। प्रचार और जन-संवाद के बीच का फर्क  मिट गया है। लोक अभिक्रम की भूमिका क्या हो, यह नीति निर्धारकों की समझ में नहीं आ रहा है।

एक और पक्ष उभर कर सामने आ रहा है। मनुष्य ने जितने कृत्रिम विभाजन पैदा किये, वे सब इस चुनौती का सामना करने में निरर्थक साबित हो रहे हैं। राष्ट्र, धर्म, जाति आदि के दायरे से ऊपर उठकर समस्त मानव जाति को एकजुट होना होगा। पर्यावरण को बचाने की लड़ाई में भी कृत्रिम विभाजन निरर्थक साबित होते रहे हैं। दिक्कत ये है कि नफरत, विरोधी का संहार एवं युद्ध की मानसिकता का निर्माण व्यापक स्तर पर होता रहा है। ऐसे में प्रेम और सहयोग की भावना के आधार पर मानव जाति की एकता का निर्माण, भविष्य में भी ऐसी वैश्विक आपदाओं से लड़ने में नयी सामाजिक शक्ति का निर्माण करेगा। कृत्रिम विभाजन का नुकसान यह भी रहा है कि एक वैश्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अपेक्षा अंधविश्वासों एवं अवैज्ञानिक तर्कों को तरजीह दी जाती है। ये चुनौतियां हमें अवसर प्रदान करती हैं कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक से अधिक बढ़ावा देने का काम करें। हां, संकल्प शक्ति एवं प्रेम का विस्तार करने वाली पद्धतियों को इसके साथ ढूंढ़ना आवश्यक है। अपने आदर्शों का निर्माण करने तथा उन आदर्शों के लिए आत्मशक्ति द्वारा पुरुषार्थ करने के इतिहास ने ही मानव सभ्यता को उन्नति के पथ पर आगे बढ़ाया है।

इस बीच गिरती अर्थव्यवस्था और खस्ताहाल होती जायेगी। असंगठित क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्र में होने वाले नुकसान का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। कॉरपोरेट क्षेत्र में भी बड़े पेâर-बदल होने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर शेयरों की कीमतों के गिरने के फलस्वरूप इन शेयरों को कौन खरीदेगा तथा विश्व भर की कारपोरेट इकाइयों पर किसका नियंत्रण कायम होगा, यह तो समय बतायेगा। लेकिन अभी ऐसा लग रहा है कि योरोप की पकड़ कमजोर होगी। अमेरिका की कंपनियों का क्या हश्र होगा, यह अनिश्चित है। विश्व स्तर पर जो ट्रेडवार (व्यापार युद्ध) चल रहा था, वह भी इस दौरान क्रियाशील है।

युद्ध और तनाव के जो क्षेत्र हैं, वहां की स्थितियां भी विषम हैं। जैसे वैश्विक वित्तीय पूंजी कुछ सीखने को तैयार नहीं है, वैसे ही युद्ध पिपासु भी कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं।

इस प्रकार जहां मानवीय एकता को मजबूत करने की जरूरत बढ़ी है, वहीं वित्तीय पूंजी पर नियंत्रण रखने वाली शक्तियां एवं युद्ध के माध्यम से वर्चस्व स्थापित करने वाली शक्तियां कुछ भी बदलने को तैयार नहीं है। आमजन को कोरोना के खिलाफ ही नहीं, इनके खिलाफ भी जागरूक करना होगा क्योंकि जो सबसे वंचित व शोषित तबके के हैं, उनकी ओर नीति निर्धारकों का ध्यान नहीं जाता।

इस त्रासदी ने हमें अवसर दिया है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को नये सिरे से बनायें। जिस श्रम का राष्ट्र निर्माण में इतना बड़ा हिस्सा है, उस श्रम को नये समाज के निर्माण में केन्द्र में रखें। स्वास्थ्य एवं शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं।

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