शिवसेना के अख़बार “ सामना “ में भाजपा का आलेख

सोनिया गांधी की चिट्ठी का जवाबी हमला

शिवसेना को बिन मांगे सलाह देने की बुरी लत है। और ये सलाह भी दी जाती है अपने मुखपत्र “सामना” के जरिए। ताजा तरीन विचार है — युनाईटेड प्रोग्रेसिव एलायंस ( यूपीए) का नया मुखिया होना चाहिए। इतना पर ही नहीं रूके तो नाम भी बता दिया । कहने लगे कि एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार के हाथों में यूपीए की बागडोर दे दी जाए । क्यों ?  इसलिए कि वो बहुत अनुभवी हैं और प्रधानमंत्री भी उन्हें गंभीरता से लेते हैं।

 बहरहाल , विपक्षी दलों की सियासी बिसात पर शिव सेना ने ये पासा तब फेंका है जब कि वो खुद यूपीए का हिस्सा नहीं है। 

सोनिया गांधी की चिट्ठी का जवाबी हमला 

शिवसेना के मुखपत्र में इस आलेख को सोनिया गांधी और शरद पवार में दरार पैदा करने की कोशिश माना जा रहा है

जानकार कहते हैं कि दरअसल सोनिया गाँधी द्वारा हाल ही में लिखी गई चिट्ठी का ये जवाबी हमला है। गौरतलब है कि सोनिया गाँधी ने बतौर यूपीए अध्यक्ष महाराष्ट्र सरकार से खत लिखकर ये आग्रह किया था कि राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए बने कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में तेजी हो।   

कहने की जरूरत नहीं कि कि ये मशविरा शिवसेना की झल्लाहट है । बहरहाल , अगर हम सामना में लिखे गए आलेख पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि शिवसेना को दुख है कि भाजपा के सामने कोई विपक्षी दल तन कर खड़ा नहीं है या फिर विपक्षी दलों को भाजपा गंभीरता से नहीं लेती है। 

लेकिन ये कहने से पहले शिवसेना को ये स्पष्ट करना चाहिए कि वो स्वयं क्या है – भाजपा के सामने विपक्षी दल है या भाजपा के साथ गलबहियां कर रही है एक पार्टी।

 शिवसेना ने एक ऐसे नेता शरद पवार का नाम लिया है जो निस्संदेह महाराष्ट्र की सियासत का कद्दावर नेता तो हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वो कितना प्रभावी होंगे , ये कहना काफी मुश्किल है।

शरद पवार और राहुल गांधी में फ़र्क़ 

फिर अगर हम अतीत में झांक कर देखें तो पाएंगे कि शरद पवार ने शायद ही कभी भाजपा पर तीखा हमला किया है। इसके उलट वो जब तब प्रधानमंत्री मोदी से मिलने का कोई मौका भी नहीं गंवाते हैं। ईडी , सीबीआई , आईटी के खौफ के साये में जी रहा कौन सा ऐसा नेता होगा जो यूपीए की आक्रामकता को धार दे पाएगा। 

राहुल गांधी और शरद पवार में फ़र्क़

जहाँ तक राहुल गाँधी की बात है तो सारे विपक्षी नेताओं में शायद राहुल गाँधी ही ऐसे हैं जो लगातार सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे हैं। नोट बंदी से लेकर हाथरस और हाथरस से लेकर किसान आंदोलन तक राहुल गाँधी हमेशा ही सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक उतरे हैं।

 राहुल के इस संघर्ष में किस विपक्षी दल ने साथ दिया ??  हाथरस हो या किसान आंदोलन – राहुल गाँधी अकेले ही मैदान में उतरे हैं। तो शिव सेना को ये बताना चाहिए कि क्या यूपीए को एक ऐसे लीडर की आवश्यकता है जो आंदोलन न करे और सत्ता पक्ष की हाँ में हाँ मिलाते रहे। 

एक बात और है कि भले ही राहुल गाँधी का मजाक उड़ाया जाता हो लेकिन सत्ता पक्ष हमेशा ही उन्हें गंभीरता से लेता रहा है। 

राहुल गाँधी का मजाक उड़ाना या उनको नासमझ बताना – ये भाजपा की रणनीति का एक हिस्सा है। इस रणनीति में भाजपा के दिग्गज नेता , भाजपा का आईटी सेल , मीडिया और शिव सेना जैसी तथाकथित विरोधी पार्टी सभी शामिल हैं। 

बीते पाँच – छ:  वर्षों में कई बार ऐसे मौके आए हैं जब हमारे प्रधानमंत्री जी की जुबान फिसली है। कई बार उन्होंने ऐसी बात कही है जो न सिर्फ मूर्खतापूर्ण बल्कि हास्यास्पद भी होती है। लेकिन साथ ही क्या हमने कभी देखा है कि मीडिया ने कभी उस गलती का जिक्र भी किया है ?  

लेकिन अगर गलती से राहुल गाँधी की जुबान फिसल जाती है तो वो प्राईम टाईम के डिबेट का मुद्दा बन जाती है। 

इतना ही नहीं , भाजपा का आई टी सेल भी तरह तरह के विशेषणों के साथ अपनी सुविधा के मुताबिक वीडियो को कांट – छांट कर एक कैंपेन ही चला देता है। 

विपक्ष को कमजोर दिखाने की रणनीति

दरअसल , ये विपक्ष को कमजोर दिखाने की रणनीति है। मजाक उड़ाना मकसद नहीं है। बल्कि सारे नेतृत्व को कमजोर और नासमझ बताने की चाल है। और इसी जाल में आज शिव सेना भी फंस चुकी है।  

अगर ये मान भी लिया जाए कि राहुल  गाँधी का बयान अधकचरा और हास्यास्पद है तो उस बयान के खिलाफ भाजपा की पूरी फौज क्यों लग जाती है ??  विगत छ – सात वर्षों में कई बार ऐसे मौके आए हैं जब राहुल गाँधी के किसी तीक्ष्ण बयान के बचाव में तिलमिलाई सरकार  पूरी कैबिनेट ही उतार देती है। सारे मुख्य-मंत्री बयान देने लग जाते हैं। आई टी सेल का हरेक ट्रोल अपने काम पर लग जाता है। तो इसे हम क्या कहेँ ? क्या राहुल गाँधी या कांग्रेस को सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है।

अगर प्रधानमंत्री कांग्रेस को या यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी को गंभीरता से नहीं ले रहे होते तो उनके हरेक भाषण में कांग्रेस निशाने पर नहीं हो रहा होता।

 क्या कभी प्रधानमंत्री ने शिवसेना या बसपा को अपने तीखे बयानों से निशाने पर लिया है। कभी नहीं। हाँ , ये बात जरूर है कि अगर विपक्षी दल को सत्तासीन भाजपा गंभीरता से नहीं ले रही है तो वो इसलिए कि उन्हें मालूम है कि विपक्षी दोलों के समूह में शिवसेना , बसपा , सपा , तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियाँ हैं जिनकी क्षेत्रीय अभिलाषा अब राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा का रूप लेती जा रही है। भाजपा को ये भी मालूम है कि कांग्रेस के किसी भी आंदोलन या हमले की धार को भाजपा नहीं बल्कि उसके सहयोगी ही कुंद करेंगे।  

सामना में लिखा गया है कि विरोधी दलों को आत्म-चिंतन करने की जरूरत है। सही बात है … लेकिन ये  आत्म चिंतन इस बात पर होनी चाहिए कि कैसे भाजपा और उसके सहयोगी दलों को रोका जाए। 

शिवसेना को आत्मचिंतन की ज़रूरत 

आत्म चिंतन इस मुद्दे पर नहीं होना चाहिए कि कैसे हम विपक्षी दलों में सबसे बड़ी पार्टी को हाशिए पर धकेल दें। विपक्षी दल अगर आपस में ही शह और मात का खेल खेलने लगेगी तो निस्संदेह ये लड़ाई काफी कमजोर होगी। ये वक्त ऐसा नहीं है जब किसी के महात्वाकांक्षा का पोषण किया जाए और किसी के कद को छोटा करने की मूर्खतापूर्ण कोशिश की जाए।  

आज के दौर में अगर शिवसेना इस तरह की  उल- जुलूल बातों को लेकर सामने मीडिया में आती है तो कहीं न कहीं ये सवाल जरूर उठेगा कि इस तरह के बयानों की पटकथा कहीं दिल्ली में भाजपा हेड क्वार्टर में तो नहीं लिखी गई है। औऱ ये शंका निराधार नहीं है । 

कांग्रेस मुक्त भारत का सपना 

साल 2014 से पहले ही कांग्रेस -मुक्त भारत का सपना देखा जा रहा था। लेकिन वो ख्वाब पूरा न हो सका है। आज भी तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस पूरे दम- खम से सदन में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जानी जाती है। 2014 से लेकर अभी तक अगर प्रधानमंत्री के निशाने पर कोई है तो वो निस्संदेह ही गाँधी परिवार रहा है। तो क्या अब भाजपा के साथ शिव सेना के भी निशाने पर कांग्रेस पार्टी ही चुकी है । 

बदले माहौल की ज़रूरत 

आज माहौल बदल चुका है । विपक्षी दलों की बात मीडिया उठा नहीं रही। बड़े- बड़े इंडस्ट्रियल  हाउस साथ नहीं है। नफरत की राजनीति अपने पराकाष्ठा पर है। जिद्द है । मनमानापन है । ईडी है । सीबीआई है ।

 जाहिर है इस बदले हुए सियासी माहौल में ये जरूरी है कि शिव सेना और दूसरी क्षेत्रीय दल भाजपा के जन विरोधी कार्यक्रमों का पुरजोर विरोध करे न कि कांग्रेस का । 

औऱ इस तरह की सलाह देने से बचें जिससे बयानबाजी का दौर शुरू हो जाए । बयानबाजी से तू-तू मैं-मैं की नौबत आ जाए । विपक्ष और भी कमजोर हो जाएगा । और फिर सत्ता पक्ष ताली बजाता रहेगा। और लोग कहेंगे कि देखो शिव सेना के मुखपत्र “ सामना “ में भाजपा का आलेख छपा है ।

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