शहीद -ए -आजम ऊधम सिंह

-बृजेश सिंह 

शहीद ऊधम सिंह को कौन भूल सकता है जिन्होने जलियाँवाला बाग में गोली चलाने का बदला लंदन में सर माइकल ओ’ डायर को गोली से उड़ाकर लिया था । प्रसिद्ध लेखक श्री माता प्रसाद, पूर्व राज्यपाल अरुणाचल प्रदेश की पुस्तक ‘भारत में सामाजिक परिवर्तन के प्रेरणाश्रोत’के अनुसार ऊधम सिंह की माता श्रीमती नारायणी देवी व पिता श्री चूहड़ रामउत्तरप्रदेश राज्य के एटा जिले के पटियाली गाँव के रहने वाले थे तथा 1857 के बाद  पंजाब आकर सुनाम से 3 मील दूर नीलोवर नहर पर सिंचाई विभाग में ओवरसियर सरदार धन्ना सिंह के साथ ठेकेदारी में काम करने लगे थे । पहले से वे रविदासी थे,सरदार धन्ना सिंह के कहने पर उन्होंने सिक्ख धर्म अपना लिया,पिता सरदार टेहल सिंह और माता हरनाम कौर हो गयी,सरदार टेहल सिंहउप्पाली में रेलवे गेटमैन के रूप में नौकरी करने लगे थे । वहीं 26 दिसंबर 1899 ऊधम सिंह का जन्म दूसरे बच्चे के रूप में हुआ जिसका नाम उन्होने शेर सिंह रखा, उनके बड़े बेटे का नाम मुखा सिंह था।शेर सिंह जब 5 वर्ष के थे माता पिता दोनों की मृत्यु एक वर्ष के अंतराल में हो गयी, दोनों बच्चों की परवरिश अनाथालय में हुई वहीं मुखा सिंह को साधु सिंह और शेर सिंह को ऊधम सिंह के रूप में नया नाम मिला । ऊधम सिंह ने मैट्रिक की परीक्षा पास करने औरबड़े भाई साधू सिंह के छोड़ कर चले जाने के बाद अनाथालय छोड़ दिया और एक फर्नीचर की दुकान खोली जोबाद में क्रांतिकारियों लिए गुप्त केंद्र बनी, यहीं ऊधम सिंहमुख्य क्रांतिकारियों सरदार भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव  मिले ।

नवंबर 1919 में ऊधम सिंह दक्षिण अफ्रीका चले गए और ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए आयोजित बैठक में सम्मिलित हुये । यहाँ से वह एक जहाज में बैठकर 1920 में अमेरिका  तक पहुँचे, जहाँ उन्होंने गदर पार्टी प्रमुख लाला हरदयाल से मुलाकात की और शूटिंग में प्रशिक्षण प्राप्त किया। लाला हरदयाल की सलाह पर वे जनरल डायर की हत्या के एकमात्र उद्देश्य के साथ इंग्लैंड गए, लेकिन जनरल डायर 1927 में पक्षाघात से मर गया । जलियाँवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए ऊधम सिंह ने तत्कालीन राज्यपाल पंजाब माइकल ओ’डायर को चुना।       

ऐसा माना जाता है कि लंदन में ऊधम सिंह ने दो बार डॉ भीम राव अम्बेडकर से मुलाकात की थी । लंदन  मेंही ऊधम सिंह की मुलाक़ात जर्मन लेडी मिस मेरी से हुई, जिन्होंने वित्तीय व अन्य मदद का वादा किया। जब डॉ अम्बेडकर संस्कृत का अध्ययन करने के लिए बॉन के लिए रवाना हो गए तो ऊधम सिंह भगत सिंह के आह्वान पर 1923 में भारत लौटे और लाहौर मेंउन्होंने लाला लाजपत राय के नेशनल कॉलेज में बी.ए. करने के लिये प्रवेश लिया, परंतु एक दिन ऊधम सिंह को पिस्तौल के साथ पकड़ागयाऔर पांच साल के लिए जेल भेज दिया गया । लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव ने सैंडर्स को गोली मार दी थी, जिसकी परिणति फांसी की सजा के रूप में हुई ।

 

        जेल से रिहा होने के बाद सन् 1933 में ऊधम सिंह लंदन चले गए और कुछ समय के लिए गुरुद्वारे में रहे तथा टैक्सी ड्राइवर का काम करने लगे । ऊधम सिंह ने डेवोनशायर में सर माइकल ओ’डायर के लिए घरेलू ड्राइवर के रूप में काम किया और डायर की बेटी मिस गोल्डे को कॉलेज ले जाने लगे और विश्वासपात्र बन गए । कुछ समय पश्चात ऊधम सिंह ने सर माइकल ओ’डायर के ड्राइवर की नौकरी को छोड़ दी,परंतु क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा । 12 मार्च 1940 को ऊधम सिंह काक्सटन हॉल में पहुंचे । ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की एक संयुक्त बैठक को काक्सटन हॉल में आयोजित किया गया था, वहाँ वक्ताओं के बीच माइकल ओ’डायर भी था । ऊधम सिंह ने अपने लक्ष्य की पूर्ति हेतु विशेष रूप से काटी गयी एक पुस्तक में अपनी रिवाल्वर छुपाई और काक्सटन हॉल में प्रवेश किया । बैठक के अंत में उन्होने किताब से रिवाल्वर खींची और माइकल ओ’डायर को दो बार गोली मारी जिससे वह वहीं तुरंत मर गया, इसके बाद सिंह ने भारत के विदेश मंत्री लॉर्ड जेटलैंड पर गोली चलाई, जिससे वे घायल हो गए । संयोग से सर लुइस डेन को एक ही गोली लगी, जिसने उसकी एक हड्डी को तोड़ दिया । एक गोली लॉर्ड लामिंगटन को भी लगी, जिसका दाहिना हाथ टूट गया था। ऊधम सिंह का भागने का इरादा बिलकुल नहीं था, उन्हे मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। जहाँ उनकी पहचान मोहम्मद सिंह आजाद के रूप में हुई।

ओल्ड बैले न्यायालय लंदन में, 5 जून 1940 को माइकल ओ’डायर की हत्या के दोषी तथा कैदी के रूप में शहीद ऊधम सिंह में खड़े है । जस्टिस एट्किंसन की अदालत में क्लर्क ने ऊधम सिंह से पूंछा कि क्या आप कुछ कहना चाहते हैं, आपको मौत की सजा क्यों न दी जाये । हालांकि एक दिन पहले 4 जून को ही जूरी द्वारा परीक्षण शुरू हो गया था, पर 5 जून 1940 को शाम 4 बजे के बाद जूरी ने सर्वसम्मति से ऊधम सिंह को पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल फ्रांसिस ओ’डायरकी हत्या का दोषी पाया । यह शायद ओल्ड बैले न्यायालय के जूरी केइतिहास में सबसे जल्दी किये गए परीक्षणों में से एक था ।

        शहीद ऊधम सिंह ने जवाब दिया हां श्रीमान, मेरे पास एक स्टेटमेंट है । मैं भारत में शासन कर रहे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए कहता हूँकि हमें शांति चाहिए । पहले आप अपना इतिहास पढ़ें,यहाँ  कई अमानवीय राक्षस हुए हैं, वैसे हीजालिम आज भारत के शासक हैं…

        उसी समय, जस्टिस एट्किंसन हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं, कि मैं राजनीतिक भाषण नहीं सुनना चाहता। वहपूछते हैं कि वह अपना स्टेटमेंट क्यों पढ़ना चाहता है ।

जस्टिस एट्किंसन: क्या यह अंग्रेजी में लिखा है ।

ऊधम सिंह: हाँ

जस्टिस एट्किंसन: मैं इसे बेहतर तरीके से समझ सकता हूँ,अगर तुम मुझे पढ़ने के लिए दो ।

ऊधम सिंह: नहीं, मैं खुद पढ़ना चाहता हूं,यह तुम्हारे लिए नहीं ।

जस्टिस एट्किंसन: मैं समझ नही पा रहा हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो ।

ऊधम सिंह: फिर कौन पढ़ेगा।

जस्टिस एट्किंसन: मैं पढ़ लूँगा ।

ऊधम सिंह: मैं चाहता हूं जूरी और सभी लोग इसे पढ़ें और सुनें ।

McClure (अभियोजन के लिए वकील): क्या मैं आपको स्मरण करा सकता हूं कि रक्षा अधिनियम की आपात शक्तियों के अंतर्गत ऐसी शक्तियां हैं जो किसी भी स्थिति में आपको कैमरे में सुनने के लिए सक्षम बनाती हैं ।

जस्टिस एट्किंसन: (शहीद ऊधम सिंह से संबोधित होकर) आपको ऐसा क्यों लगता है कि आप जो कहेंगे उसे प्रकाशित किया जाएगा।

ऊधम सिंह: मैं इसे विरोध स्वरूप रखना चाहता हूँ, यही मेरा मतलब है और मैं समझाना चाहता हूं, कि जूरी को अभिभाषण के बारे में गुमराह किया जा रहा है । क्या मैं इसे अब पढ़ूँ ।

जस्टिस एट्किंसन: हां।

ऊधम सिंह: मैं बहुत कुछ कहना चाहता हूँ,यह तो तुम्हें भी पता है ।

जस्टिस एट्किंसन: आपको मृत्यु की सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए, जिसे लेकर आप कहने के हकदार हैं । आप राजनीतिक भाषण देने के हकदार नहीं हैं ।

ऊधम सिंह: मुझे मरने की परवाह नहीं है। क्या अब मैं इसे पढ़ सकता हूं ।

जस्टिस एट्किंसन: तुम अपनी सजा को लेकर कुछ कह सकते हो, तुम्हें अपनी बात कहने के लिए मौका दिया गया है, लेकिन जहां तक मुझे लगता है कि तुम ब्रिटिश सरकार या ब्रिटिश साम्राज्य की निंदा करोगे, यहाँ इस केस में इससे कोई मतलब नहीं है ।

ऊधम सिंह: मैं मरने से डर नहीं रहा हूँ, मुझे मरने पर गर्व है । मैं अपनी मातृभूमि भारत देश की मदद करना चाहता हूँ, जब तक अंतिम सांस है करता रहूँगा,और मुझे आशा है कि जब मैं इस दुनिया से चला जाऊंगा तो मेरी जगह मेरे देशवासी तुम जैसे गंदे कुत्तों को भगा देंगे । तब मेरा देश से आजाद हो जायेगा । यहाँ मैं अंग्रेजी अदालत में अंग्रेजी जूरी के समक्ष खड़ा हूँ । जब तुम लोग भारत जाते हो और जब वापस आते हो, तो तुम्हेंइनाम देकर हाउस ऑफ कॉमन्स में जगह दी जाती है । लेकिन जब हम लोग इंग्लैंड आते हैं तो हमें मृत्यु दंड दिया जाता है,पर इसकी मुझे कुछ भी परवाह नहीं है ।  जब तुम जैसे गंदे कुत्ते भारत आते है …. अपने आपको बुद्धिजीवी कहकर वे खुद को शासक बनाकर …. और बिना हिचक के भारतीय छात्रों, लोगों पर मशीनगन से फायर करने के लिए ऑर्डर देते है … (ठंडी आह लेकर )… हत्या, अंग-भंग करते हो और लोगों को मारते हो । मैं जानता हूँ कि भारत में क्या हो रहा है… सैकड़ों, हजारों लोगों को अँग्रेजों द्वारा मारा जा रहा हैं ।

जस्टिस एट्किंसन: मैं इससे अधिक नहीं सुनना चाहता हूँ, कोई इसके कागज को छीन कर फेंक दें । मैं इसे सजा देने जा रहा हूं ।

ऊधम सिंह: तुम कुछ भी सुनना नहीं चाहते, पर मुझे बहुत कुछ कहना है ।

जस्टिस एट्किंसन: अगर कुछ प्रासंगिक हैतो सुनाओ, बिना मतलब की बात मैं नही सुनना चाहता हूँ ।

ऊधम सिंह: तुम लोग गंदे, नीचहो । तुम हमें सुनना नहीं चाहते कि तुम भारत में क्या-क्या कर रहे हो, जानवरो, जानवरो, जानवरो… ।

(शहीद ऊधम सिंह को शांत रहने को कहा जाता है )

ऊधम सिंह: इंग्लैंड कासाम्राज्यवाद खत्म हो, साम्राज्यवाद खत्म हो ।

इसके साथ ही जस्टिस एट्किंसन द्वारा शहीदऊधम सिंहको मौत की सजा दे दी गयी ।31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को पेंटनविले जेल में फांसी दी गई। अन्य फांसी मिले कैदियों के साथ उन्हे भी उस दोपहर जेल के मैदान के भीतर दफनाया गया।

आजाद भारत में लगभग 22 वर्ष बाद 1962 में प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक दैनिक अखबार को दिए वक्तव्य में शहीद ऊधम सिंह को सराहा : “मैं सलाम करता हूं शहीद-ए-आजम ऊधम सिंह को, उन्होने बड़ी श्रद्धा के साथ फांसी के फंदे को चूमा था ताकि हम आज़ाद हो सकें”।जुलाई 1974 में शहीद-ए-आजम ऊधम सिंह के अवशेषों को भारत वापस मंगाया गया। दिल्ली हवाई अड्डे पर उनके ताबूत को लाने वालों में कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह भी शामिल थे। ऊधम सिंह के अवशेषों का शहीद की तरह स्वागत किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी पुष्पांजलि अर्पित की। बाद में उनका अंतिम संस्कार पंजाब के जन्मस्थान  सुनाम  में किया गया और उनकी राख गंगा नदी में विसर्जित कर दी गई। वर्तमान में उत्तराखंड के एक जिले का नाम भी शहीद ऊधम सिंह रखा गया है। 

 

-बृजेश सिंह 

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