मध्य पूर्व/मध्य एशिया में राम-रामायण के विविध आयाम

 

राम की संस्कृति समस्त मूर्त विधाओं जैसे-स्थापत्य, मूर्त एवं चित्रकलाओं में पूरी दुनिया में पांच हजार वर्ष से अधिक प्रमाणिक रूप में प्राप्त होने लगती है। उससे पूर्व भवन, राजमहल, किले तथा स्थापत्य के समस्त कार्य मूर्ति निर्माण काष्ठ कलाओं में होते थे जो कुछ वर्षों के बाद नष्ट हो जाते हैं तथा फिर से नई लकड़ियों के माध्यम से आवास, राजमहल, किले आदि बनाये गये। इस कारण पकी हुई मिट्टी से पूर्व के कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।

पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) के माध्यम से ‘कलाओं में राम’ सर्वप्रथम मध्य-पूर्व/मध्य एशिया में इराक, ईरान के कुर्द क्षेत्र में प्राप्त होते हैं। सेलवेनिया क्षेत्र में बेलुला की पहाड़ी पर जो आकृति प्राप्त होती है वह मिट्टी के पक्के पहाड़ पर राम और हनुमान की है। प्रमाणिक रूप में जब और साक्ष्य एकत्र किये गये तब ईरान के कुर्द क्षेत्र में जो बेलुला की पहाड़ियों से लगभग 100 किलोमीटर के व्यास में है वहाँ भी शिव तथा देवी की आकृतियां प्राप्त होती हैं। मेसोपोटामिया तथा सुमेर की सभ्यताओं में राम संस्कृति की व्यापक उपलब्धता प्राप्त होती है। लेबनान, सीरिया आदि क्षेत्र में बहुतायत में मूर्तियां प्राप्त होती हैं।

मूर्तियों के अतिरिक्त ईरान और इराक के कुर्द क्षेत्र में स्थान तथा लोगों के नाम पर भी रामायण का व्यापक प्रभाव प्राप्त होता है। यह एक गम्भीर शोध का विषय है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व अर्थात ई0पू0 3000 वर्ष के आसपास पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में रामायण के पदचिन्ह् सुस्पष्ट रूप में प्राप्त हो रहे हैं। अभी दो वर्ष पूर्व मिस्र में हनुमान जैसी बहुत सी आकृतियां एक क्षेत्र में प्राप्त हुई हैं जिसे मिस्र की सरकार ने सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में भी विकसित करने का प्रबन्ध किया जा रहा है।

पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तिब्बत एवं रूस में राम-

भगवान राम के पुत्र लव के नाम से लाहौर तथा कुश के नाम से कशूर एवं भरत के बड़े बेटे तक्ष के नाम से तक्षशिला का नामकरण हुआ है। केवल नामकरण ही नहीं अपितु इस समस्त क्षेत्र में अनेक पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं प्राप्त होती हैं। लाहौर और इस्लामाबाद की पुरानी हवेलियों में ‘राम दरबार’ आज भी सजीव रूप में बने हुए प्राप्त होते हैं। आठ से दस वर्ष पूर्व लाहौर में ‘लव महोत्सव’ भी मनाया जाता था जिसमें लव तथा राम एवं सीता जी की मूर्तियां तथा पेण्टिंग बड़ी संख्या में लोग क्रय कर गिफ्ट् के रूप में प्रदान करते थे। व्यापारी तथा बौद्धिक वर्ग कश्मीर से तिब्बत, मंगोलिया तथा रूस तक की यात्रा में रामायण के अनेक प्रसंगों को अपने साथ ले गया। यहाँ बौद्ध संस्कृति के जो सुस्पष्ट प्रमाण प्राप्त होते हैं उनके सभी संवाहक रामायण संस्कृति के मूल व्यक्ति थे इसलिए समस्त बुद्धिस्ट मठों में अन्दर की दीवारों पर रामायण की अत्यन्त सुन्दर संरचनाएं प्राप्त होती हैं। बुद्ध रामायण के साथ-साथ समस्त स्थानीय बोलियों में भी प्रचुर मात्रा रामायण और उसकी संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं। मंगोलिया से आगे सेंट पीटरबसर्ग रूस का महत्वपूर्ण स्थान है यहाँ बारानिकोह ने तुलसी की रामचरित मानस का लगभग 800 पृष्ठ में रूसी भाषा में अनुवाद किया। इसी सेंट पीटरबसर्ग विश्वविद्यालय बाद में पं0राहुल सांकृत्यायन इण्डोलाॅजी के प्राध्यापक थे। रूसी भाषा के अनेक शब्द संस्कृत और उसमें रामायण शब्दावलियों का ज्यों का त्यों प्रयोग प्राप्त होता है।
अफगानिस्तान से लेकर रूस तक का बड़ा भू-भाग कैकेय क्षेत्र के रूप में है। इन्ही दुर्गम स्थानों में देवासुर संग्राम हुआ जिसमें रावण और दशरथ के युद्ध में कैकेई के सहयोग से दशरथ विजयी हुये और समर क्षेत्र में कैकेई के सहयोग से प्रभावित होकर दो वरदान भी दिये। कैकेई से दशरथ का तीसरा विवाह हुआ। अत्यन्त महत्वपूर्ण बात यह है कि अयोध्या में पूर्व निर्धारित राम के युवराज बनने के अवसर पर भरत और शत्रुध्न अपने ननिहाल अर्थात कैकेय क्षेत्र में थे। यद्यपि वनवास आकस्मिक था परन्तु राम का युवराज बनना निश्चित था। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि भरत और शत्रुध्न अपने ननिहाल में रहकर रावण अथवा रक्षसों से युद्ध करने के लिए बाल्यकाल से ही प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। यह अनुभव बाद में काम आया।

पाताल लोक होण्डुरास में अहिरावण, पाताल भैरवी, हनुमान एवं मकरध्वज-

यद्यपि यूरोपीय इतिहासकारों के कारण हम अपने प्रमाणिक साक्ष्यों को भी मिथक के रूप में अभिव्यक्त करते हैं परन्तु भारत के सभी प्राचीन ग्रन्थों में राम-रावण युद्ध के समय पाताल लोक का वर्णन किया गया है। यह पाताल लोक वर्तमान में मध्य अमेरिका का देश होण्डुरास है। होण्डुरास के पड़ोसी देश ग्वाटेमाला की माया सभ्यता में भी रामायण संस्कृति के अनेक स्थापत्य प्राप्त होते हैं। यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि होण्डुरास के घने जंगलों में एक पूरा शहर गायब हो गया था। 1940 मेें अमेरिका के एयरफोर्स एक विमान द्वारा अचानक कुछ तस्वीरें प्राप्त की गयीं जिससे इस शहर का ज्ञान बाहरी दुनिया को हुआ। किसी भी एक शहर को बसने में हजारों वर्ष लगते हैं फिर उसे समाप्त होने में हजारों वर्ष लगते हैं। ऐसी स्थिति में भारत के पाताल लोक की कथा में हनुमान, मकरध्वज और अहिरावण की कथा ठीक भारत से नीचे 11.30 घण्टे के अन्तर पर एक देश विद्यमान है, इसे हम प्रमाणिक रूप से पाताल लोक मान सकते हैं।

500 ई0पू0 इटली की एट्रक्शन सभ्यता में राम-

इटली में रोमन सभ्यता का उदय चैथी शताब्दी ई0पू0 के आसपास हुआ। इसके पूर्व इटली में एट्रक्शन सभ्यता का विस्तार था। लगभग 700-800 ई0पू0 एट्रक्शन सभ्यता इटली में विकसित हुई जिसका अन्त अचानक 400 ई0पू0 हो गया। आज भी इटली के पूर्वी हिस्से पर बहुत से स्थापत्य के अवशेष प्राप्त होते हैं। इस सभ्यता की महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्मदाता दो ऐसे जुड़वा बच्चे थे जिनके माता-पिता बहुत पवित्र आत्माएं थीं और जिन्हें जंगल में रीछ से पाला था। अगर इसकी व्याख्या की जाये तो राम और सीता जैसी पवित्र आत्माओं के साथ लव और कुश युगल पुत्र की परिकल्पना साकार होती है तथा रीछ ऋषि के रूप में रहे होंगे जिसे वाल्मीकि ऋषि भी माना जा सकता है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े भाई का नाम रोमन था जिसे बाद में विकसित होने वाली रोमन सभ्यता ने यथावत अपने लिए स्वीकार किया। दोनो सभ्यताएं भिन्न थीं। एट्रक्शन सभ्यता में लगभग 40 चित्र आज भी विद्यमान हैं जो क्रमशः रामायण की कथा से जुड़ते हैं जैसे-मध्य में एक स्त्री और आगे पीछे दो पुरूषों का वन गमन। एक वृद्ध पुरूष तीन स्त्रियां तथा चार बेटे बन्दर की आकृति का एक कलात्मक दृश्य जो अपने सिर पर संजीवन पहाड़ जैसे किसी वस्तु को उठाये हुए है। दो बच्चों द्वारा एक घोड़े को पकड़ना अश्वमेघ यज्ञ का प्रतिरूप जान पड़ता है। एट्रक्शन सभ्यता की सुन्दरियों की आज भी लोग भारतीय सुन्दरियों से तुलना करते हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया, वाल्मीकि मंन्दिर, अंकोरवाट, अयोध्या, लवपुरी आदि-

भारतवर्ष के लगभग सभी जनों को यह तथ्य पता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति विशेषतः रामायण संस्कृति प्राप्त होती हैं परन्तु जब इनका गहन अध्ययन किया जाता है तो अत्यन्त रोचक तथ्य भी प्राप्त होते हैं।

कलिंग युद्ध के बाद ई0पू0 200 के आसपास रामायण संस्कृति का विस्थापन ओड़िशा से चारो दिशाओं में हुआ। जो व्यापारी, कलाकार तथा विद्वान सक्षम और समर्थ थे वे जलमार्ग से पलायन कर गये। भारत के पूर्व राज्य ओड़िशा से ठीक दूसरी ओर इण्डोनेशिया, स्याम देश मलेशिया आदि हैं। लगभग दो हजार वर्षों पूर्व रामायण का यह विस्थापन उन्हीं तथ्यों और क्षेत्रों के आधार पर हुआ जो कमोवेश ओड़िशा में मिलते हैं।

 

इनमें सबसे रोचक तथ्य है, राम के हरे रंग के मुखौटे। ओड़िशा के अतिरिक्त पूरी भारतवर्ष में राम और कृष्ण दोनों का रंग नीला है परन्तु वैष्णव क्षेत्र का प्रमुख केन्द्र ओड़िशा राम और कृष्ण को विभेद करने के लिए नीले और हरे रंग में विभाजित करता है। यही विभाजन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में राम में प्राप्त होता है। पट्टचित्र शैली, मुखौटे आदि सभी में इण्डोनेशिया और थाईलैण्ड में हरे रंग के राम भी प्राप्त होते हैं।

इस विस्तार का एक प्रमाण और है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने उन पूर्वजों की याद में जो नाव से सुदूर देश चले गये थे। ओड़िशा में बोइत वंदना के रूप में व्यापक उत्सव मनाया जाता है। इसका एक पक्ष यह है कि बैंकाक में भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने आने वाले पूर्वजों के स्वागत में उत्सव मनाया जाता है। कला और संस्कृति के माध्यम से भारत का पूर्वी किनारा तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के देश पूरी तरह से समान हैं।

विश्व प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर से लगभग 70 किलोमीटर आगे ‘वेन्टर छमार’ का अत्यन्त महत्वपूर्ण मंदिर है जो दूसरी ओर थाईलैण्ड की अयुध्या से भी 70 किलोमीटर है। वेन्टर छमार इसलिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि सातवीं-आठवीं शताब्दी में वाल्मीकि का एक मंदिर जो लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में विकसित हुआ और इस मंदिर के मुख्य द्वार पर वाल्मीक रामायण के प्रथम श्लोक पर आधारित एक पैनल बनाया गया है जिसमें बहेलिया, क्रौंच पक्षी का जोड़ा, ब्रहम्, वाल्मीकि एवं भरद्वाज का अंकन है। रामायण की रचना के पीछे बहेलिया द्वारा क्रौंच पक्षी का वध तथा उससे उपजी करूणा तथा ब्रहम्ा जी द्वारा वाल्मीकि को ‘रामो विग्रहवान धर्मा’ का उपदेश था।

वाल्मीकि जी ने केवल रामायण लिखी थी परन्तु याज्ञवल्क मुनि से भरद्वाज जी ने कथा सुनी जिस कथा को भरद्वाज जी ने आमजन तक पहुँचाया। उस कलाकार और कला मर्मज्ञ को अनेकशः बधाई जिन्होंने रामायण के विस्तृत एवं गूढ़ प्रसंग को मंदिर के मुख्य द्वार पर कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया।

खमेर संस्कृति दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे प्राचीन संस्कृति थी जिसका विस्तार अंकोरवाट के विष्णु मंदिर के रूप में होता है। अंकोरवाट का विष्णु मंदिर राम और कृष्ण के प्रसंगों से युक्त है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही बांई ओर एक विशेष शैली में रामायण के 15 प्रसंग क्रमशः बने हुए हैं। यह आश्चर्य है कि उत्तर-भारत में रामलीलाएं 15 एपीसोड में ही पूर्ण होती हैं।

दक्षिण-पूर्व रामायण की एक विशेषता है कि प्रत्येक देश की एक विशेष रामायण है। उसी रामायण की कथा को पारम्परिक रूप से रामलीला के रूप में मंचन किया जाता है और चित्रकला तथा मुखौटों के रूप में भी अपनी रामायण का अंकन होता है। इसमें जो महत्वपूर्ण बात है कि दक्षिण-पूर्व एशिया का कोई भी देश कोई परिवर्तन या प्रयोग नहीं करता है। परिवर्तन और प्रयोग न करने के कारण प्रतिवर्ष उनकी कला में निखार उत्पन्न हुआ तथा आज सर्वश्रेष्ठ वेशभूषा, मुखौटे, पेंण्टिंग, मूर्तियां आदि रामायण की दक्षिण-पूर्व एशिया में प्राप्त होती हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण सांस्कृतिक पर्यटन का मुख्य आधार है। एक इण्डोनेशिया के मुस्लिम कलाकार से जब मैंने कहा कि आप बड़ी निष्ठा और लगन से भीषण गर्मी में रामायण कठपुतली का मंचन कर रहे हैं, इसका क्या कारण है जबकि आप धर्म मुस्लिम है। उसने कहा कि धर्म हमारा मुस्लिम है परन्तु पूर्वज हमारे राम हैं। यह बात मैंने इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुहार्तो के संदर्भ से सुनी थी परन्तु जब मैंने उस लोक कलाकार से प्रश्न किया कि तुम राम को पूर्वज कैसे मानते हो तब उसने कहा कि किसी के पूर्वज ही उसके रोजी-रोटी का जरिया बनते हैं, मुहैया कराते हैं और राम हमको और हमारे देश को आज रोजी-रोटी उपलब्ध करा रहे हैं उनसे बड़ा अभिभावक और पूर्वज कौन है।

इसी क्रम में मुझे जोग जकार्ता में पुराविसाता संस्था द्वारा स्थापित 43 वर्ष पूर्व एक रामायण सेण्टर जाने का अवसर मिला जिसमें आज भी 365 दिन प्रतिदिन 07-8.30 बजे तक रामलीला की जाती है। इस संस्था के स्थापक दो मुस्लिम मित्र हैं।
कम्युनिस्ट देश लाओस जिसकी सीमाएं चीन से मिलती हैं उसके मनोरम स्थान लुअंग प्रबंग में लाओस के राजा के पैलेस है। 24 वर्ष पूर्व हुए आन्दोलन में कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग सत्ता में आये और राजा को सत्ता से हटाया गया। परन्तु पैलेस में राजा द्वारा स्थापित रामलीला केन्द्र आज भी ज्यों का त्यों संचालित है। वहाँ रविवार को छोड़कर प्रतिदिन रामलीला होती है इसके लिए 360 कलाकार सवेतनिक नियुक्त हैं जिसमें 60 कलाकार प्रतिदिन मंचन करते हैं तथा 200 कलाकार देश के अन्य स्कूलों, पर्यटन केन्द्रों तथा अन्य देशों में रामलीला का मंचन करके आय अर्जित करते हैं।
रामलीला के व्यापक प्रसार-प्रचार के कारण रामलीला के मुकुट, मुखौटे, वेशभूषा एवं वाद्ययंत्र एक इण्डस्ट्री के रूप में विकसित हो रहे हैं। अनेक लोगों के रोजगार का साधन रामलीला से जुड़े वेशभूषा, उपकरण, वाद्य यंत्र आदि के बनाये जाने से प्राप्त हो रहा है तथा प्रत्येक छोटे-छोटे पर्यटन स्थलों में कठपुतलियों तथा अन्य माध्यमों से रोजगार सृजन है।

बैंकाक थाईलैण्ड स्याम देश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसकी पुरानी राजधानी अयुध्या में थी। अयुध्या का निर्माण ओड़िशा के राजा ने कराया था जिसे वर्मा के लोगों ने ध्वस्त कर दिया फलस्वरूप बैंकाक में नई राजधानी बनायी गयी। बैंकाक एक संक्षेप नाम है जो संस्कृत में लगभग डेढ़ पृष्ठ में पूरे नाम के रूप में प्रयुक्त होता है। बुद्ध धर्म के पहले राजा असम से प्रतिस्थापित हुए जिन्होंने अपना नाम रामराज्य की परिकल्पना के रूप में ‘राम-1 रखा। वे अपने देश को रामराज्य की तरह चलाना चाहते हैं।

आज राम-10 का शासन है। इसी तरह मिस्र में 1500 ई0पू0 09 राजाओं ने क्रमशः राम-से नाम रखा जो रामराज्य की परिकल्पना भी थी। देश में आम नागरिकों अथवा राजाओं का धर्म भिन्न था परन्तु आदर्श राजा तथा आदर्श व्यक्ति के रूप में राम ही आदर्श के रूप में मान्य हैं।
थाईलैण्ड में पूरा रामायण सर्किट विद्यमान है। बैंकाक के सभी बौद्ध मंदिरों में उत्कृष्ट रामायण अंकन है। नेशनल म्युजियम बैंकाक के मुख्य द्वार पर राम की अद्भुत प्रतिमा विराजमान है। प्रत्येक चैराहे और इलेक्ट्रिक पोल पर राम की छोटी बड़ी आवश्यकतानुसार प्रतिमा दिखायी पड़ती है। सड़कों और पुलों के नाम राम से जुड़े हैं। कालनेमी का प्रसंग लवपुरी, फीमाई, अयुध्या, संजीवनी प्रसंग की जीवन्त स्थापत्य एक गोल आवृत्त में पूरे थाईलैण्ड में अत्यन्त जीवन्त रूप में आज विद्यमान है। और तो और जो भी बैंकाक के सुवर्ण भूमि एयरपोर्ट से प्रस्थान करता है उसे 100 मीटर की लम्बी 24 फीट ऊँची समुद्र मंथन का प्रसंग जीवन में कभी भूल नहीं पाता है। इस मान्यूमेंट की एक फोटो किसी भी कैमरे से नहीं ली जा सकती। पूरी फोटो खींचने के लिए दो अथवा तीन बार क्लिक करना होगा।

नोट : यह आलेख और फ़ोटो उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग के माध्यम से प्राप्त हुए हैं. लेखक का नाम ज्ञात नहीं  हो सका. 

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